एक छोटा सा प्रयोग कीजिए। अपने आसपास के किसी भी स्कूल जाने वाले बच्चे से, चाहे वह कक्षा पांच में हो या कक्षा बारह में, यह पूछिए कि उसके स्कूल में पिछले हफ्ते किसी एक विषय पर खुली बहस हुई थी या नहीं। किसी ऐसे सवाल पर जिसका कोई एक सही जवाब न हो, बल्कि कई दृष्टिकोण हों।
ज़्यादातर मामलों में जवाब “नहीं” होगा। बच्चा शायद यह भी कहे कि बहस का मतलब क्या है, हमारे यहां तो पाठ पढ़ाया जाता है, सवाल याद कराए जाते हैं, और परीक्षा में वही पूछा जाता है जो किताब में लिखा है।
यह जवाब आम है, और इसी जवाब में हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमज़ोरी छिपी हुई है।
जो प्लेटो और अरस्तू ने कहा था
ढाई हज़ार साल पहले प्लेटो ने अपनी किताब रिपब्लिक में एक बहुत साधारण बात कही थी। उन्होंने कहा कि कोई भी राज्य वैसा ही होगा जैसी उसकी अगली पीढ़ी की शिक्षा होगी। अगर आप यह जानना चाहते हैं कि कोई समाज बीस साल बाद कैसा होगा, तो उसके आज के स्कूलों में जाकर देखिए।
अरस्तू ने इस बात को और आगे बढ़ाया। अपनी किताब राजनीति में उन्होंने लिखा कि कोई शासन व्यवस्था तभी टिकती है जब उसके नागरिक उस व्यवस्था के मूल्यों में शिक्षित हों। यानी अगर समाज लोकतंत्र चाहता है, तो उसे ऐसे लोग तैयार करने होंगे जो लोकतंत्र की भाषा समझते हों। और लोकतंत्र की भाषा का पहला अक्षर है सवाल पूछना। तर्क करना। असहमति को सम्मान देना। अलग दृष्टिकोण को सुनना।
अगर शिक्षा यह सब नहीं सिखाती, तो लोकतंत्र सिर्फ कागज़ पर रहता है। संविधान कुछ भी कहे, ज़मीन पर लोग वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा उन्हें सिखाया गया है। और हमें ज़्यादातर यह सिखाया गया है कि सवाल मत पूछो, बस याद करो।
हमारा स्कूल किसके लिए बना है
ईमानदारी से सोचिए। हमारे यहां स्कूल का मक़सद क्या है। अगर आप किसी भी माता पिता से पूछें, तो जवाब लगभग एक जैसा होगा। बच्चा पढ़ाई करे, अच्छे नंबर लाए, बोर्ड में अच्छा प्रदर्शन करे, अच्छे कॉलेज में दाख़िला ले, और एक स्थिर नौकरी पा ले। यह पूरी श्रृंखला परीक्षा पर टिकी हुई है।
परीक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें हर सवाल का एक सही जवाब होता है। उस जवाब को याद करो, परीक्षा में लिखो, अंक मिलते हैं। जो बच्चा सबसे अच्छा याद कर पाता है, वह अव्वल आता है। जो बच्चा सवाल पूछने में समय बर्बाद करता है, वह पीछे रह जाता है।
यह पूरी व्यवस्था ब्रिटिश राज में एक ख़ास मक़सद से बनाई गई थी। मैकाले ने 1835 में अपने प्रसिद्ध मिनट में यह साफ़ लिखा था कि हमें ऐसे भारतीय चाहिए जो रंग और रक्त में भारतीय हों, लेकिन रुचि, राय, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़। ऐसे लोग जो अंग्रेज़ी प्रशासन के बिचौलिए बनें, ऊपर से आदेश लें, नीचे लागू करें, और बीच में सवाल न पूछें।
यह वह ढांचा है जो आज़ादी के बाद भी, थोड़े बहुत बदलाव के साथ, चलता रहा। बीच में योजनाएं बनीं, समितियां बैठीं, नई शिक्षा नीतियां आईं, लेकिन परीक्षा केंद्रित, याद आधारित, और सवाल विरोधी ढांचा वैसा ही बना रहा।
जब बच्चा सवाल पूछता है, क्या होता है
अब उस बच्चे की कल्पना कीजिए जो कक्षा में सवाल पूछने की कोशिश करता है। नागरिक शास्त्र की कक्षा है, अध्यापक संविधान पढ़ा रहे हैं। पाठ में लिखा है कि भारत एक लोकतंत्र है, जहां हर पांच साल में चुनाव होते हैं, और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है।
बच्चा पूछता है, सर, अगर सरकार जवाबदेह है, तो हमारे इलाके की सड़क पांच साल से क्यों टूटी है। सर थोड़ा रुकते हैं, फिर कहते हैं, बेटा यह पाठ्यक्रम का सवाल नहीं है, ध्यान लगाओ, परीक्षा में यह पूछा जाएगा कि लोकतंत्र की कितनी विशेषताएं हैं, उनमें से पांच लिखो।
यह कहानी पूरे देश में दोहराई जाती है, हर रोज़, हर कक्षा में। बच्चा जो सवाल पूछना सीख रहा था, वह सीख जाता है कि सवाल पूछने में कुछ नहीं रखा। जो किताब में है उसी पर ध्यान दो। फिर वही बच्चा बीस साल बाद वोटर बनता है। उसे लगता है कि किताब और ज़िंदगी अलग चीज़ें हैं। संविधान में चाहे जो लिखा हो, असली ज़िंदगी में सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं।
यह सीख स्कूल से शुरू होती है। फिर कॉलेज में बढ़ती है। फिर नौकरी में पक्की हो जाती है। और एक पूरी पीढ़ी ऐसी तैयार होती है जो शिक्षित तो है, परीक्षित तो है, डिग्री वाली है, लेकिन सवाल पूछने की आदत से उसका रिश्ता ख़त्म हो चुका है।
कोचिंग का दौर और जो उससे बना है
पिछले बीस तीस साल में एक नई चीज़ जुड़ी है। कोचिंग संस्थानों का बड़ा कारोबार। आज लाखों बच्चे स्कूल के बाद कोचिंग जाते हैं, या स्कूल छोड़कर भी कोचिंग पर निर्भर हो जाते हैं। इन कोचिंगों का एक ही मक़सद है, परीक्षा में अंक दिलाना।
यह व्यवस्था अपनी जगह बहुत कुशल है। यह बच्चे को परीक्षा का प्रशिक्षित कर्मचारी बना देती है। टाइम मैनेजमेंट, शॉर्ट कट, मॉक टेस्ट, यह सब। लेकिन इसमें जो छूट जाता है, वह बड़ा है। बहस छूट जाती है। पढ़ने का आनंद छूट जाता है। दूसरे विषयों में रुचि छूट जाती है। नागरिक शिक्षा छूट जाती है। खेल, कला, सामाजिक भागीदारी, सब छूट जाता है।
एक बच्चा जो दिन में बारह घंटे परीक्षा के लिए तैयारी कर रहा है, उसके पास अपने मोहल्ले के बारे में सोचने का समय नहीं है। उसके पास अख़बार पढ़ने का समय नहीं है। उसके पास यह जानने का समय नहीं है कि उसके इलाके का जनप्रतिनिधि कौन है, और वह क्या कर रहा है। बीस साल बाद यही बच्चा बड़ा होकर शिकायत करेगा कि देश में कुछ नहीं हो रहा। तब तक वह सवाल पूछने की भाषा भूल चुका होगा।
मां बाप का रोल, और जो बातचीत नहीं होती
स्कूल और कोचिंग सिर्फ़ अकेले अपराधी नहीं हैं। माता पिता भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं, और शायद सबसे बड़ा हिस्सा।
देश के लाखों घरों में जब बच्चा स्कूल से लौटता है, तो पहला सवाल यह होता है कि आज क्या पढ़ाया गया, या टेस्ट कैसा गया, या होमवर्क हो गया क्या। बहुत कम घरों में पहला सवाल यह होता है कि आज कुछ ऐसा सीखा जो दिलचस्प लगा, या आज कक्षा में कोई बहस हुई, या आज शिक्षक की किसी बात से असहमत हुए।
पीटीएम यानी पैरेंट टीचर मीटिंग में लगभग पूरी बातचीत अंकों के इर्द गिर्द घूमती है। माता पिता पूछते हैं कि बच्चा गणित में पीछे है, कैसे आगे लाएं। बहुत कम पूछा जाता है कि बच्चे की जिज्ञासा कैसी है, क्या वह सवाल पूछता है, क्या वह अपनी राय रखता है।
यह माता पिता का दोष नहीं है, बल्कि एक पूरी संस्कृति का दोष है जिसने अंक को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया है। एक माता पिता जो अपने बच्चे को बहस करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, उन्हें अक्सर रिश्तेदारों से सुनना पड़ता है कि बच्चा बहुत बहस करता है, संस्कार ठीक से नहीं हैं। मानो सवाल पूछना कोई बीमारी हो जिसका इलाज ज़रूरी है।
जहां कुछ अलग हो रहा है
पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है। देश में कुछ ऐसी जगहें हैं जहां शिक्षा को थोड़ा अलग ढंग से देखा जा रहा है।
कुछ राज्यों के सरकारी स्कूलों में गतिविधि आधारित पढ़ाई का प्रयोग हो रहा है, जहां बच्चे केवल किताब से नहीं, बल्कि छोटे प्रयोगों, समूह चर्चा, और स्थानीय परियोजनाओं से सीखते हैं। कुछ निजी स्कूलों ने अंक केंद्रित मूल्यांकन के साथ साथ प्रोजेक्ट वर्क, बहस, और सामुदायिक भागीदारी को भी जगह दी है। कुछ शिक्षक अपने स्तर पर, अपनी कक्षा में, सवाल पूछने वाले बच्चों को डांटने की बजाय प्रोत्साहित करते हैं। कुछ माता पिता अपने बच्चों के साथ अख़बार पढ़ने की आदत बनाते हैं, और हर ख़बर पर “तुम्हें क्या लगता है” वाला सवाल पूछते हैं।
यह सब अभी अल्पसंख्यक है। लेकिन यह दिखाता है कि वैकल्पिक रास्ता संभव है। ज़रूरत यह है कि यह रास्ता अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक की तरफ बढ़े।
इसका सीधा असर हमारे लोकतंत्र पर
जो बच्चा सवाल पूछना सीखकर बड़ा होता है, वह वोटर बनकर भी अपने जनप्रतिनिधि से सवाल पूछता है। जो बच्चा यह सीखकर बड़ा होता है कि असहमति बुरी चीज़ है, वह वोटर बनकर भी अपनी ही पार्टी के अंदर असहमति को धोखा मानता है। जो बच्चा यह सीखकर बड़ा होता है कि किताब में जो लिखा है वही सच है, वह वोटर बनकर भी जो टीवी पर सुनता है वही सच मानता है।
यह कोई कल्पना नहीं है। यह सीधा संबंध है। पिछले लेखों में हमने जिन सवालों पर बात की, काफिले के पीछे दौड़ती भीड़, मध्यवर्ग की चुप्पी, स्थानीय शासन के प्रति उदासीनता, इन सबकी जड़ें कहीं न कहीं स्कूल की उस कक्षा में हैं जहां पहली बार बच्चे को यह सिखाया गया कि सवाल पूछना समय बर्बाद करना है।
लोकतंत्र को मज़बूत करने का सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी तरीका है, बच्चों को सवाल पूछने की आदत डलवाना। यह एक पीढ़ी का काम है, और इसी वजह से शायद कोई सरकार इसे प्राथमिकता नहीं देती। चुनाव हर पांच साल में हैं, पीढ़ी बीस साल में बदलती है। राजनीतिक लाभ छोटा है, सामाजिक लाभ बहुत बड़ा।
अंत में, एक छोटी ज़िम्मेदारी
अगर आप माता पिता हैं, तो एक छोटा प्रयोग कीजिए। आज शाम को जब आपका बच्चा स्कूल या कोचिंग से लौटे, तो पहला सवाल अंकों के बारे में मत पूछिए। पूछिए कि आज क्या ऐसा सीखा जो रोचक लगा, या आज कोई बात समझ नहीं आई जिस पर बात करनी है। पहले दिन शायद बच्चा कोई जवाब न दे। दूसरे दिन भी न दे। लेकिन अगर यह सवाल लगातार पूछा जाए, तो धीरे धीरे बच्चे को यह अहसास होगा कि उसके घर में सवाल पूछना मना नहीं है, बल्कि स्वागत योग्य है।
यह छोटी सी आदत बीस साल बाद एक ऐसा वोटर तैयार करेगी जो अपने जनप्रतिनिधि से बेबाक सवाल पूछेगा। जो टीवी पर देखी हुई बात पर तुरंत यक़ीन नहीं करेगा। जो ग्राम सभा या नगर निगम की बैठक में अपनी आवाज़ रखेगा। जो काफिले के पीछे दौड़ने की बजाय काम का हिसाब मांगेगा।
प्लेटो ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि अगली पीढ़ी की शिक्षा ही अगले समाज की नींव है। अरस्तू ने कहा था कि लोकतंत्र वहीं टिकता है जहां नागरिक लोकतंत्र की भाषा जानते हों। इन दोनों बातों का सीधा मतलब हमारे लिए यही है। अगर हम चाहते हैं कि अगले बीस साल में भारत का लोकतंत्र मज़बूत हो, तो आज की कक्षाओं में सवाल पूछने वाले बच्चे तैयार करने होंगे।
स्कूल बदलना मुश्किल है। नीति बदलने में समय लगेगा। लेकिन घर के अंदर बातचीत बदलना, यह आज से शुरू हो सकता है। शायद यही सबसे सस्ता और सबसे असरदार नागरिक काम है जो कोई भी कर सकता है।
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