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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

आंगनवाड़ी जो हर गांव में है, और जो ज़्यादातर में नाम भर है

एक गांव की एक संकरी गली के अंत में एक छोटी सी ईंट की संरचना है। सामने एक टूटा सा बोर्ड है जिस पर हरा रंग है, और लिखा है “आंगनवाड़ी केंद्र क्रमांक 47, ग्राम पंचायत अमुक।” बोर्ड कब लगा था, इसकी तारीख़ पढ़नी मुश्किल है, क्योंकि अक्षर धुंधले हो चुके हैं।

केंद्र के दरवाज़े पर एक छोटा सा ताला लटक रहा है। पिछले तीन हफ़्तों से वह ताला यहीं है। पास के घरों से पूछिए कि आंगनवाड़ी की कार्यकर्ता आती कब है। एक बूढ़ी कहती है, “महीने में दो चार बार। पंजी में हाज़िरी लगाने आती है। बाक़ी समय वह दूसरा काम करती है, क्योंकि उसका वेतन इतना कम है कि सिर्फ़ इससे घर नहीं चलता।”

एक छोटी बच्ची दौड़कर अपनी माँ के पास आती है। माँ कहती है, “इसका नाम आंगनवाड़ी की पंजी में है, पर इसने अंदर कभी क़दम नहीं रखा। न पोषाहार मिला, न शुरुआती पढ़ाई का कोई कोना, न टीकाकरण का स्थायी रिकॉर्ड। सब काग़ज़ पर है।”

यह दृश्य देश के लाखों गांवों में, किसी न किसी रूप में, हर सुबह होता है। और इस दृश्य के पीछे एक ऐसी व्यवस्था है जिसे दुनिया का सबसे बड़ा बाल पोषण और देखभाल का नेटवर्क कहा जाता है, और जिसकी ज़मीनी स्थिति और उसके आधिकारिक दावे के बीच एक बहुत बड़ी दूरी है।

जो वादा था

आंगनवाड़ी एक छोटी सी इमारत नहीं है, यह एक पूरे विचार का नाम है। समेकित बाल विकास सेवाएं, जिन्हें आईसीडीएस कहते हैं, की शुरुआत पचास साल पहले हुई थी। इसका मूल विचार था कि देश के हर गांव, हर बस्ती के बच्चों को छह साल की उम्र तक एक केंद्र मिले जहां उन्हें पोषाहार, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य जांच, और टीकाकरण मिले। साथ ही गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की माताओं के लिए पोषाहार और परामर्श भी।

यह वादा बहुत बड़ा था। एक देश जिसकी कुपोषण की दर दशकों से दुनिया की सबसे चिंताजनक है, उसके लिए यह व्यवस्था एक नींव बन सकती थी। एक बच्चा जिसे पहले छह साल में अच्छा पोषण और शुरुआती सीखने का अनुभव मिल जाए, वह बीस साल बाद बहुत अलग नागरिक बनता है, यह विज्ञान सिद्ध करता है।

आज देश में लगभग चौदह लाख आंगनवाड़ी केंद्र हैं। काग़ज़ पर। यह संख्या दुनिया के किसी भी समान कार्यक्रम से बड़ी है। पर मात्रा एक बात है, गुणवत्ता दूसरी। और गुणवत्ता पर बात कम होती है।

क्या आज ज़मीन पर है

अगर आप किसी एक ग्रामीण आंगनवाड़ी का दौरा करें, तो आप जो चीज़ें अक्सर देखेंगे, वे ये हैं।

अनियमित पोषाहार। जो भोजन रोज़ बच्चों को मिलना चाहिए, वह कई जगहों पर हफ़्ते में दो तीन बार मिलता है। जो मिलता है, उसकी गुणवत्ता कई बार ख़राब होती है। कई बार पैकेट कम आते हैं, कई बार आते ही नहीं।

अप्रशिक्षित या अधिकारिक प्रशिक्षण से वंचित कार्यकर्ता। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को बाल विकास, बुनियादी पोषण, और शुरुआती शिक्षण की समझ चाहिए। पर इनके प्रशिक्षण कार्यक्रम अक्सर अधूरे हैं, और जो होते हैं, उनकी गुणवत्ता असमान है। बहुत सी कार्यकर्ता अपना काम सीखती हैं अनुभव से, ट्रेनिंग से नहीं।

बुनियादी ढांचे का अभाव। बहुत से केंद्र छोटे, हवादार नहीं, बिजली रहित, और कई बार बिना शौचालय के होते हैं। पीने का पानी अक्सर एक हैंडपंप से लाया जाता है। खिलौने, शिक्षण सामग्री, और प्रारंभिक शिक्षा के बुनियादी संसाधन अक्सर नहीं होते।

बहुत कम वेतन। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका, दोनों बहुत कम वेतन पर काम करती हैं। यह वेतन कानूनी न्यूनतम मज़दूरी से भी कम हो सकता है। ऐसे में, ये स्त्रियां अपने मूल काम को पूरी प्रतिबद्धता से करने की ज़मीनी स्थिति में नहीं होतीं।

कमज़ोर निगरानी। ज़िला स्तर के अधिकारी के पास इतने केंद्र होते हैं कि वह हर केंद्र का नियमित दौरा नहीं कर सकता। नतीजा यह है कि केंद्र की वास्तविक गतिविधि और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज गतिविधि के बीच एक बड़ा अंतर बना रहता है।

मातृ देखभाल का अधूरापन। आंगनवाड़ी का एक बड़ा काम गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की माताओं को पोषाहार, परामर्श, और बुनियादी स्वास्थ्य जांच देना है। यह सेवा अगर ठीक से चले, तो जन्म से पहले की कुपोषण की समस्या को बहुत हद तक रोका जा सकता है, जो आगे चलकर बच्चे की जीवन भर की क्षमता तय करती है। पर यह सेवा अक्सर अधूरी होती है। एक गर्भवती महिला जिसे चार महीने तक पोषाहार नहीं मिला, या जिसकी हीमोग्लोबिन जांच कभी नहीं हुई, उसके बच्चे का वज़न जन्म पर कम होगा, और वह कमज़ोरी अगले बीस साल साथ चलेगी। यह श्रृंखला बेहद महंगी है, और इसी श्रृंखला को तोड़ने का काम आंगनवाड़ी का था।

ये छह चीज़ें मिलकर एक स्थिति बनाती हैं जिसमें आंगनवाड़ी एक पूरी संस्था के रूप में बहुत बड़ी है, पर एक छोटे बच्चे और उसकी माँ के लिए एक ठोस अनुभव के रूप में बहुत छोटी है।

जो नींव दरकती है, उसका असर तीस साल बाद आता है

यह बात बहुत गंभीर है, और इसे बहुत साफ़ समझना ज़रूरी है। मानव विकास का विज्ञान यह बता चुका है कि एक बच्चे के पहले पांच साल उसके पूरे जीवन की नींव हैं। इस उम्र में मस्तिष्क का विकास सबसे तेज़ी से होता है। इस उम्र में जो पोषण, उत्तेजना, और सुरक्षा मिले, वह बच्चे की क्षमता को आगे तय करती है।

जब इन पांच सालों में पोषण अधूरा हो, उत्तेजना न हो, सुरक्षा कम हो, तो जो प्रभाव होता है, वह बच्चे की पूरी ज़िंदगी में दिखता है। उसकी ऊंचाई कम रहती है, उसकी सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, उसकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कमज़ोर होती है, और लंबी दौड़ में उसकी आय की क्षमता भी कम होती है।

इसीलिए आंगनवाड़ी की कमज़ोरी सिर्फ़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, यह एक राष्ट्रीय निवेश की विफलता है। आज हम जो छोटा निवेश एक तीन साल के बच्चे पर नहीं कर रहे, उसकी भारी क़ीमत तीस साल बाद हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे स्वास्थ्य तंत्र, और हमारी कुल मानव पूंजी चुकाएगी।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह छोटा बजट है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। आंगनवाड़ी की दशा किसी एक की लापरवाही नहीं है।

बहुत सी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं जो अपने सीमित संसाधनों के बावजूद बहुत अच्छा काम कर रही हैं। बहुत से ज़िला अधिकारी हैं जो प्रतिबद्ध हैं। समस्या व्यक्तियों में नहीं है, समस्या उस लंबी चली आ रही चुनाव में है जो प्रारंभिक बाल देखभाल को राष्ट्रीय बजट का एक बहुत छोटा हिस्सा रखती है।

जो भी आईसीडीएस का बजट है, वह अगर चौदह लाख केंद्रों में बंटे, और हर केंद्र में बच्चों की वास्तविक संख्या से बांटे, तो जो प्रति बच्चा ख़र्च निकलता है, वह बहुत कम होता है। एक मूल वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त पोषण देने के लिए जो लागत है, उसका एक छोटा सा हिस्सा।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह बजट कमोबेश इसी अनुपात में रहा है। समस्या नीयत में नहीं है, समस्या उस प्राथमिकता में है जो प्रारंभिक बाल देखभाल को “मानव विकास का सबसे ऊंचा रिटर्न देने वाला निवेश” मानते हुए भी, बजट में उसके अनुरूप जगह नहीं देती।

क्या किया जा सकता है

यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल बजट और प्रशासनिक प्राथमिकता बदलने में है। पर एक नागरिक के तौर पर कुछ ठोस बातें ज़रूर हैं।

पहली बात, अपने इलाक़े की आंगनवाड़ी का दौरा कीजिए। एक नागरिक के तौर पर, बिना किसी पद के, बस देखने और सीखने के लिए। यह आपका अधिकार है। आंगनवाड़ी एक सार्वजनिक सेवा है। आप वहां जा सकते हैं, बच्चों को देख सकते हैं, कार्यकर्ता से बात कर सकते हैं, और जो आपने देखा, उसका दस्तावेज़ बना सकते हैं।

दूसरी बात, अपनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को पहचानिए, उसका सम्मान कीजिए, और जब वह अपनी मांग करे, तो उसके साथ खड़े होइए। आज देश भर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने न्यूनतम वेतन, स्थायी कर्मचारी का दर्जा, और बेहतर बुनियादी ढांचे की मांग की है। यह मांग नागरिक के समर्थन के बिना अधूरी रहेगी।

तीसरी बात, अपने जनप्रतिनिधि से पूछिए कि आपके ज़िले में आंगनवाड़ी पर प्रति बच्चा कितना ख़र्च होता है, पिछले साल कितने केंद्र पूर्ण रूप से चले, कितनों में कार्यकर्ता का पद ख़ाली है। यह सूचना सूचना के अधिकार से उपलब्ध है। यह सवाल जिस दिन हर ज़िले में पूछा जाएगा, उस दिन यह आंकड़ा सुधार की प्राथमिकता बनेगा।

चौथी बात, अपने परिवार और पड़ोस की महिलाओं को बताइए कि आंगनवाड़ी से क्या क्या सेवाएं उनका अधिकार हैं। गर्भवती महिला के लिए पोषाहार, छोटे बच्चे का टीकाकरण, बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा, यह सब उनका हक़ है, उपहार नहीं। और जब हक़ की भाषा होगी, तब मांग की भाषा अपने आप बदलेगी।

अंत में

एक देश जो अपने सबसे छोटे नागरिकों के सबसे ज़रूरी सालों में निवेश नहीं करता, वह देश अपनी सबसे बड़ी पूंजी की उपेक्षा कर रहा है। यह उपेक्षा आज दिखाई नहीं देती, क्योंकि बच्चे छोटे हैं, वे शिकायत नहीं करते, और वे ख़ुद को राजनीतिक रूप से संगठित नहीं कर सकते। पर इसका असर पच्चीस साल बाद हमारी कुल राष्ट्रीय क्षमता में दिखेगा।

आंगनवाड़ी की दीवार जो ख़ाली पड़ी है, वह सिर्फ़ एक प्रशासनिक विफलता का चेहरा नहीं है, वह एक भविष्य के नागरिक के साथ हुई एक छुपी हुई बेइंसाफ़ी है। और जो बेइंसाफ़ी बच्चे के साथ हो, उसका कोई सबूत नहीं मांगता, क्योंकि बच्चा शिकायत करना नहीं जानता।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े के आंगनवाड़ी केंद्र का एक दौरा शुरू कीजिए। कब खुलता है, कब बंद होता है, कितने बच्चे आते हैं, क्या उन्हें मिलता है। यह छोटा सा अवलोकन है, पर इसमें हमारी अगली पीढ़ी की असली नींव दिखती है। और जिस दिन यह नींव कई नागरिकों को दिखेगी, उस दिन उसकी मरम्मत की मांग एक सामूहिक आवाज़ बनेगी।

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