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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

“छोड़ो भी” वाला देश: न्याय जब इतना दूर हो जाए कि लोग मांगना बंद कर दें

हमारे देश में एक छोटा सा वाक्य बहुत बड़ी कहानी कहता है। “छोड़ो भी।”

किसी ने आपका सामान चुराया, और आप थाने जाने की सोच रहे हैं। कोई कहता है, छोड़ो भी, थाने में बैठ कर पूरा दिन ख़राब हो जाएगा। किसी ने आपके साथ धोखाधड़ी की, और आप वकील के पास जाने की सोच रहे हैं। कोई कहता है, छोड़ो भी, मुकदमा सालों चलेगा। किसी अधिकारी ने आपका काम नहीं किया, और आप शिकायत करने की सोच रहे हैं। कोई कहता है, छोड़ो भी, बेकार में दुश्मनी मोल लोगे।

यह “छोड़ो भी” कोई व्यक्तिगत आलस नहीं है। यह एक सामूहिक हार है। एक पूरी सभ्यता ने तय कर लिया है कि न्याय मांगने का खर्च, समय, और परेशानी इतनी बड़ी है कि उसके बजाय अन्याय सह लेना बेहतर है।

और जिस समाज में लोग न्याय मांगना बंद कर देते हैं, वहां लोकतंत्र की एक बहुत बुनियादी रीढ़ टूट जाती है।

अरस्तू ने जो कहा था

अरस्तू ने अपनी किताब राजनीति में न्याय को राज्य की सबसे ज़रूरी विशेषता बताया था। उन्होंने यह नहीं कहा कि न्याय आदर्श चीज़ है। उन्होंने इससे आगे जाकर यह कहा कि न्याय ही वह चीज़ है जो राज्य को राज्य बनाती है। अगर न्याय व्यवस्था नहीं चल रही, तो राज्य का होना ही सवालों के घेरे में है।

उनकी एक छोटी सी बात थी, जो आज भी क़ानून की हर पाठ्यपुस्तक में लिखी जाती है। न्याय में देरी न्याय से इनकार है। यानी अगर किसी को सही फैसला मिलता है, लेकिन इतनी देर से मिलता है कि उसकी ज़िंदगी ही बदल चुकी हो, तो वह फैसला असली न्याय नहीं है। यह तकनीकी न्याय है, असली नहीं।

प्लेटो ने भी इसी से जुड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जब आम नागरिक यह समझने लगे कि न्याय व्यवस्था सिर्फ ताक़तवर लोगों के लिए है, तो वह नागरिक धीरे धीरे राज्य से दूर हट जाता है। वह अपनी समस्याओं को निजी तरीकों से सुलझाने लगता है। कभी रिश्तेदारों से, कभी पंचायतों से, कभी ताक़तवर लोगों से, और कभी सीधे चुप्पी से।

दोनों यूनानी विचारक इस एक बात पर सहमत थे। न्याय व्यवस्था अगर ठीक से नहीं चल रही, तो बाक़ी सब कुछ कागज़ी है। संविधान कुछ भी कहे, कानून कुछ भी लिखें, अगर अदालत तक पहुंचना मुश्किल है, और पहुंच भी जाओ तो फ़ैसला आने में दशकों लग जाते हैं, तो वह व्यवस्था असली नहीं है।

अब इसी कसौटी पर अपने देश की न्याय व्यवस्था को रखकर देखिए।

आंकड़ों में जो लिखा है

देश की अदालतों में आज लगभग पांच करोड़ मामले लंबित हैं। यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे समझना मुश्किल है। अगर आज एक भी नया मामला दर्ज न हो, और अदालतें मौजूदा रफ्तार से चलें, तो सिर्फ इन लंबित मामलों को निपटाने में दशकों लगेंगे।

ज़िला अदालत में एक मामला औसतन कई साल लेता है। हाई कोर्ट में जाने पर और कई साल। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने पर एक मामला अक्सर पंद्रह से बीस साल का सफ़र हो चुका होता है। यानी जिस अन्याय के खिलाफ कोई पैंतीस साल की उम्र में खड़ा हुआ था, उसका फैसला उसे साठ साल की उम्र में मिलता है। ज़िंदगी निकल चुकी होती है, मुकदमा चल रहा होता है।

इस देरी का बोझ सबसे ज़्यादा गरीब पर पड़ता है। एक साधन सम्पन्न आदमी मुकदमा खींच सकता है, अच्छे वकील रख सकता है, और लंबी लड़ाई का खर्च उठा सकता है। एक मज़दूर, एक छोटा किसान, एक रिक्शा चालक, उनके पास यह सहूलियत नहीं है। उनके लिए तीन साल अदालत आना जाना ही असली सज़ा बन जाती है, चाहे वे सही हों या ग़लत।

विचाराधीन क़ैदियों की हालत और भी कठोर है। देश की जेलों में बंद लोगों का बड़ा हिस्सा वे लोग हैं जिनके मुक़दमे अभी चल रहे हैं, और जो दोषी सिद्ध नहीं हुए हैं। यानी कानून के मुताबिक वे निर्दोष हैं, लेकिन सालों जेल में बैठे हैं। कई लोग इतने साल विचाराधीन क़ैदी के रूप में बिता देते हैं कि अगर वे दोषी भी पाए जाते, तो भी इतनी सज़ा नहीं होती।

यह विसंगति किसी एक पार्टी या एक सरकार की वजह से नहीं है। यह दशकों से चल रही व्यवस्थागत बीमारी है। हर सरकार ने इस पर थोड़ा बहुत बोला है, हर अदालत ने अपनी ही चिंता ज़ाहिर की है, लेकिन समस्या जस की तस है।

जब लोग न्याय मांगना बंद कर दें, तब क्या होता है

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। अरस्तू और प्लेटो दोनों इसी पर ज़ोर देते थे।

जब एक समाज में आम आदमी यह मान लेता है कि अदालत से कुछ हासिल नहीं होगा, तो वह दो में से एक रास्ता चुनता है।

पहला रास्ता है, चुप रहना। अन्याय सहना। यह सबसे आम है। एक मकान मालिक किरायेदार को कानूनी रूप से बेदखल नहीं कर पाता क्योंकि अदालत में पांच साल लगेंगे, तो वह क्या करता है। या तो किरायेदार के साथ समझौता करता है, अपने नुकसान पर, या किसी और तरीक़े से दबाव डालता है। एक उपभोक्ता जिसे ख़राब सामान बेचा गया है, वह अदालत नहीं जाता, क्योंकि कीमत से ज़्यादा वकील की फीस होगी। वह बस अगली बार ज़्यादा सतर्क रहेगा, और कहानी ख़त्म।

दूसरा रास्ता है, अदालत के बाहर के रास्ते अपनाना। यहां से समस्या ख़तरनाक होने लगती है। जब लोग कानूनी रास्ते से न्याय नहीं पा सकते, तो वे ताक़तवर लोगों के पास जाते हैं। मोहल्ले का नेता, इलाक़े का दबंग, अपनी जाति या समुदाय का पंच। ये लोग कोई कानूनी संस्था नहीं हैं, लेकिन वे फैसले देते हैं, और लोग मानते भी हैं।

यह वह बिंदु है जहां न्याय व्यवस्था का खाली पन भरने के लिए असंवैधानिक ढांचे खड़े होने लगते हैं। ख़ाप पंचायतें, सामुदायिक फ़ैसले, सड़क का इंसाफ। अगर अदालत समय पर काम करती, तो इनकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। अदालत समय पर काम नहीं करती, इसलिए ये पनपते हैं।

प्लेटो ने इसी बात की चेतावनी दी थी। जब राज्य अपना सबसे बुनियादी काम नहीं करता, तो उस खाली जगह में कोई और आ जाता है। और जो कोई और आता है, वह आम तौर पर वह नहीं होता जिसे आप वहां देखना चाहते।

और जब भीड़ खुद न्याय करने लगे

यह सबसे ख़तरनाक मोड़ है। जब अदालत बहुत दूर लगती है, और सामुदायिक पंचायतें भी हर समस्या नहीं सुलझा पातीं, तो कभी कभी भीड़ खुद न्याय करने निकल पड़ती है। किसी पर शक हुआ, और भीड़ ने तुरंत पीट दिया। बाद में पता चलता है कि शक ग़लत था, या आरोप किसी ने जानबूझकर लगाया था। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

इस तरह की घटनाएं किसी एक राज्य की समस्या नहीं हैं। पूरे देश में हर कुछ महीनों में ऐसी ख़बरें आती हैं। और हर ख़बर के पीछे एक ही तर्क छुपा होता है। “अगर हम अदालत भेजते, तो वह बच कर निकल जाता।” यह तर्क पूरी न्याय व्यवस्था पर लगाया गया अविश्वास का सबसे कड़वा रूप है।

जब नागरिक यह मान लेता है कि अदालत से वही व्यक्ति बच निकलेगा जो दोषी है, तो वह कानून हाथ में लेने को सही ठहराने लगता है। यह लोकतंत्र की मौत का पहला लक्षण है, और अरस्तू ने इसका ज़िक्र किया था। उन्होंने कहा था कि जिस समाज में नागरिक यह भरोसा खो दे कि कानून समान रूप से लागू होगा, वह समाज धीरे धीरे ताक़त की तरफ झुक जाता है, न्याय की तरफ नहीं।

जो ढांचा हमें ब्रिटिश राज से मिला, और जो हमने उसके साथ किया

यह कहना ज़रूरी है कि हमारी मौजूदा न्याय व्यवस्था बहुत हद तक ब्रिटिश ढांचे की ही उत्तराधिकारी है। 1860 की भारतीय दंड संहिता, 1861 की दंड प्रक्रिया संहिता, 1872 का साक्ष्य अधिनियम, यह तीनों उपनिवेशी दौर के क़ानून थे जो आज़ादी के बाद भी दशकों तक चलते रहे। अब उनकी जगह नई संहिताएं आ चुकी हैं, भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम। लेकिन क़ानून बदलना एक चीज़ है, और उसे लागू करने वाला ढांचा बदलना दूसरी।

अदालतों की संख्या कम है। न्यायाधीशों के पद बड़े पैमाने पर खाली पड़े हैं। निचली अदालतों में बुनियादी संसाधनों की कमी है। कई जगह अदालतें टूटी इमारतों में चल रही हैं, बिना पंखों के, बिना कंप्यूटर के। जजों पर हज़ारों मामलों का बोझ है। तारीख़ पे तारीख़ का चक्र इसी ढांचागत कमी से चलता है।

ये बातें कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं हैं। यह सब लंबे समय से ज्ञात है। हर कुछ साल में कोई न कोई आयोग रिपोर्ट देता है, सिफारिशें होती हैं, संसद में बहस होती है। फिर बात ख़त्म। क्योंकि न्याय व्यवस्था को सुधारने का राजनीतिक लाभ बहुत कम है। ना यह वोट दिलाती है, ना यह तत्काल दिखाई देती है। पुल बनेगा तो दिखेगा, अदालत के एक नए जज की नियुक्ति किसी को नहीं दिखाई देती।

जो हम कर सकते हैं, और जो करना चाहिए

यह लेख सिर्फ़ निराशा फैलाने के लिए नहीं है। चीज़ें कठिन हैं, लेकिन कुछ रास्ते हैं।

पहली बात, न्याय व्यवस्था में सुधार को राजनीतिक मुद्दा बनाना। आज चुनावों में कोई भी पार्टी यह वादा नहीं करती कि वह न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाएगी, अदालतों का आधुनिकीकरण करेगी, या लंबित मामलों को कम करने के लिए ठोस योजना लाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि नागरिक यह मांग नहीं करता। अगर पच्चीस फ़ीसदी मतदाता भी अपने इलाक़े के उम्मीदवारों से यह सवाल पूछने लगे कि न्याय व्यवस्था पर आपकी क्या योजना है, तो पार्टियों के घोषणा पत्र बदल जाएंगे।

दूसरी बात, स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक तंत्रों का इस्तेमाल। उपभोक्ता अदालत, लोक अदालत, मध्यस्थता केंद्र, और ग्राम न्यायालय जैसे ढांचे मौजूद हैं। ये पूर्ण समाधान नहीं हैं, लेकिन छोटे मामलों के लिए ये बहुत तेज़ हैं और ज़्यादातर लोगों को इनके बारे में पता नहीं है। अपने इलाक़े की उपभोक्ता अदालत कहां है, लोक अदालत कब लगती है, यह जानकारी रखना नागरिक की एक बुनियादी ज़िम्मेदारी है।

तीसरी बात, छोटे अन्याय की आदत तोड़ना। हम बहुत बार रोज़ की छोटी छोटी गड़बड़ियों को “छोड़ो भी” कहकर निपटा देते हैं। दुकानदार ने तौल में कम दिया, बस वाले ने ज़्यादा किराया लिया, पेट्रोल पंप पर पूरा तेल नहीं डला। हर बार छोड़ देने की आदत बड़ी न्याय व्यवस्था से अलग नहीं है। उसी सोच की छोटी झलक है। शिकायत करना सीखना, चाहे छोटे स्तर पर ही क्यों न हो, यह नागरिक का अभ्यास है।

चौथी बात, विचाराधीन क़ैदियों के मुद्दे को समझना और उठाना। एक नागरिक की हैसियत से हम इस मुद्दे को अपने स्थानीय पत्रकारों, सामाजिक संगठनों, और अपने प्रतिनिधियों के सामने रख सकते हैं। यह मानवीय सवाल है, और इसमें कोई राजनीतिक पक्ष नहीं है, क्योंकि हर सरकार में यह समस्या रही है।

अंत में

लोकतंत्र की कीमत सिर्फ़ चुनाव में नहीं चुकानी होती। वह उन अदालतों में चुकानी होती है जहां सही और ग़लत के बीच फ़ैसला हो रहा है। अगर वह फ़ैसला समय पर नहीं होता, तो लोकतंत्र अपनी बुनियाद से खिसकने लगता है। चुनाव होते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन नागरिक का राज्य से जो रिश्ता है, वह कमज़ोर होता जाता है।

अरस्तू ने कहा था कि न्याय में देरी न्याय से इनकार है। प्लेटो ने कहा था कि जब आम आदमी न्याय व्यवस्था से उम्मीद छोड़ देता है, तो राज्य खोखला हो जाता है। दोनों की बातें हमारे देश पर अक्षरशः सच बैठती हैं।

“छोड़ो भी” वाक्य को अपनी रोज़मर्रा की भाषा से कम करना, छोटा क़दम है। बड़ा क़दम वहां शुरू होता है जब हम अपने प्रतिनिधियों से, अपनी पार्टियों से, अपने मीडिया से यह पूछने लगते हैं कि न्याय व्यवस्था पर आपकी क्या योजना है। यह सवाल जब पर्याप्त संख्या में नागरिक पूछेंगे, तभी इसका जवाब आएगा।

तब तक न्याय वहीं रहेगा जहां वह आज है। दूर, धीमा, और ज़्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर। और एक देश जो अपने नागरिकों को न्याय नहीं दे पाता, वह बाक़ी कितनी भी तरक़्क़ी कर ले, अरस्तू की कसौटी पर पूरा नहीं उतरता।

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