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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

आपकी जेब से कितना पैसा कौन ले जा रहा है, और आप गिनते भी नहीं

एक बहुत सीधा सवाल। आप पिछले साल कितना टैक्स देते हैं, यह बता सकते हैं?

ज़्यादातर लोग आय कर वाला आंकड़ा बता देंगे। दस हज़ार, बीस हज़ार, पचास हज़ार, जो भी हो। फॉर्म 16 में लिखा होता है।

लेकिन यह आधा जवाब है। आपकी जेब से सरकार ने पिछले साल जितना पैसा निकाला, उसमें से शायद आधा यानी आधे से कम आय कर के रूप में गया होगा। बाक़ी कहीं और से गया, और आपको पता भी नहीं चला।

यह कैसे होता है, और कितना होता है, यह जानना हर नागरिक का अधिकार है। और एक छोटी सी ईमानदार गिनती बहुत कुछ बदल सकती है।

जो टैक्स आप जानते हैं

आय कर सबसे दिखने वाला टैक्स है। हर महीने सैलरी से कटता है। साल के अंत में रिटर्न भरना पड़ता है। आपको पता रहता है कि कितना गया।

लेकिन सच यह है कि देश की कुल आबादी का सिर्फ़ छोटा सा हिस्सा आय कर देता है। आंकड़े अलग अलग आते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि अधिकतर भारतीय सीधे आय कर नहीं भरते। कोई इसलिए नहीं भरता कि उनकी आय कर सीमा से कम है, कोई इसलिए नहीं कि उनकी आय अनौपचारिक है।

तो अगर सरकार ज़्यादातर पैसा आय कर से नहीं कमाती, तो कहां से कमाती है। जवाब चौंकाने वाला है।

जो टैक्स आप जानते भी नहीं

आपके दिन की एक झलक लीजिए।

सुबह उठे, टूथपेस्ट का इस्तेमाल किया, उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगा था। नहाने का साबुन, उस पर भी जीएसटी। दूध की पैकेट पर 5 प्रतिशत। पाव रोटी पर 5 प्रतिशत। चाय की पत्ती पर 5 प्रतिशत। चीनी पर 5 प्रतिशत।

ऑफिस के लिए निकले। पेट्रोल भरवाया। यहां पर एक बहुत दिलचस्प चीज़ है। पेट्रोल पर सीधा जीएसटी नहीं है, लेकिन इसकी क़ीमत का बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य के विभिन्न करों से बना होता है। यानी पेट्रोल की असली लागत जो आती है, उससे काफ़ी ज़्यादा क़ीमत पर आप तेल खरीदते हैं, और बाक़ी पैसा सरकार के पास जाता है।

ऑफिस पहुंचे। चाय पी। बिस्किट खाया। दोनों पर जीएसटी। दोपहर का खाना मँगवाया। ज़ोमैटो या स्विगी ने जो बिल भेजा, उसमें जीएसटी अलग से लिखा है।

शाम को घर लौटे। बिजली का बिल आया। उस पर सर्विस चार्ज, इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी, और कई जगह सेस। मोबाइल का रिचार्ज किया। उस पर भी जीएसटी।

अगर आपने एक नई गाड़ी खरीदी है, तो उस पर रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन फ़ीस, इंश्योरेंस पर जीएसटी, और कई जगह ग्रीन सेस।

अगर आपने घर खरीदा है, तो स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन फ़ीस, जीएसटी अंडर कंस्ट्रक्शन पर।

अगर आपने शराब पी है, तो उस पर अलग से आबकारी कर। यह राज्य का बड़ा स्रोत है।

यह सब मिलाकर एक औसत शहरी मध्यवर्गीय परिवार साल में अप्रत्यक्ष करों के रूप में जितना देता है, वह उसके आय कर से अक्सर ज़्यादा होता है। और इस पर कभी बहस नहीं होती, क्योंकि यह छोटे छोटे हिस्सों में निकलता है।

अप्रत्यक्ष कर का राजनीतिक फायदा

प्रत्यक्ष कर यानी आय कर पर हर साल बहस होती है। बजट के दिन हर अख़बार लिखता है कि कितनी छूट मिली। राजनीतिक दल वादे करते हैं।

अप्रत्यक्ष कर पर ऐसी बहस नहीं होती। क्योंकि यह छुपा हुआ होता है। आप एक टूथपेस्ट खरीदते समय यह नहीं सोचते कि इस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगा है। आप बस क़ीमत देखकर पैसा देते हैं।

राजनीतिक तौर पर यह सरकारों के लिए बहुत अच्छा है। आय कर बढ़ाओगे, तो विरोध होगा। जीएसटी की दरें बदलोगे, तो शायद ही किसी को पता चले कि उसकी जेब से कितना अधिक गया।

यह कोई एक सरकार की बात नहीं है। हर सरकार, हर राज्य, हर समय, यही करती है। यह व्यवस्था की बात है, राजनीति की नहीं।

क्या इसके बदले में क्या मिल रहा है

यह असली सवाल है।

आप साल भर इतना टैक्स देते हैं। तो बदले में क्या मिलता है।

सरकारी अस्पताल जब ज़रूरत पड़ती है, तो आप वहां नहीं जाते। निजी अस्पताल जाते हैं, और भारी बिल भरते हैं। सरकारी स्कूल जब बच्चे की पढ़ाई की बात आती है, तो आप वहां नहीं भेजते। निजी स्कूल भेजते हैं, और हर साल फ़ीस बढ़ती जाती है। सरकारी बिजली अनियमित है, तो जनरेटर। सरकारी पानी पीने लायक नहीं है, तो आरओ। सरकारी सुरक्षा भरोसेमंद नहीं लगती, तो कैमरे और गार्ड।

यानी आप दो तरह से भुगतान कर रहे हैं। एक बार टैक्स के रूप में सरकार को। दूसरी बार निजी सेवा के रूप में बाज़ार को। यह दोहरा भुगतान देश के बहुत बड़े वर्ग की हक़ीक़त है।

और इस दोहरे भुगतान पर कोई बहस नहीं होती।

तो क्या किया जा सकता है

पहली बात, गिनती शुरू कीजिए। पिछले एक महीने में आपने जो भी ख़र्च किए, उनमें से कितने पर जीएसटी और अन्य कर लगे थे, इसका मोटा अनुमान लगाइए। यह आंकड़ा शायद आपको चौंका देगा।

दूसरी बात, यह जानिए कि आपके इलाक़े में सरकारी सेवाओं पर कितना ख़र्च हो रहा है। नगर निगम का बजट, ज़िला योजना का बजट, यह सब सार्वजनिक है। अधिकतर लोगों ने कभी देखा ही नहीं।

तीसरी बात, अगली बार जब कोई कहे कि “मैं तो आय कर नहीं देता, इसलिए मेरा क्या मतलब”, उन्हें बताइए कि हर भारतीय जो कुछ भी ख़रीदता है, उस पर टैक्स देता है। हर मज़दूर जो साबुन ख़रीदता है, सरकार को पैसा दे रहा है। यानी हर नागरिक कर दाता है। हर नागरिक का यह हक़ है कि वह पूछे कि उसका पैसा कहां जा रहा है।

चौथी बात, यह सवाल अपने जनप्रतिनिधि से पूछिए। आपके इलाक़े से जो टैक्स इकट्ठा हुआ, उसका कितना हिस्सा यहां वापस आया। यह सवाल वैध है। इसका जवाब आप का हक़ है।

अंत में

लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक स्थिति वह नहीं है जहां सरकार ज़्यादा टैक्स लेती है। वह स्थिति है जहां सरकार चुपचाप टैक्स लेती है, और नागरिक को पता भी नहीं चलता।

जब आपको पता नहीं कि आप कितना दे रहे हैं, तो आप यह भी नहीं पूछ सकते कि बदले में आपको क्या मिल रहा है। और जो वर्ग नहीं पूछता, उसकी कोई सुनवाई नहीं होती।

गिनना शुरू कीजिए। बहुत कुछ बदल जाएगा।

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