आज़ादी के दिन को 1947 से जब हमने नापना शुरू किया, तब से आज तक एक बात बार बार कही जाती है। हम औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्त हुए। हम अपने मालिक ख़ुद बने।
यह सच है, और यह बड़ी बात है।
लेकिन एक और सच भी है, जो उतना नहीं बोला जाता। अंग्रेज़ चले गए। उनका शासन ख़त्म हुआ। लेकिन उनका बनाया हुआ ढांचा बहुत हद तक बना रहा। कुछ कानून, कुछ संस्थाएं, कुछ आदतें, कुछ मनोवृत्तियां, यह सब पूरे या आंशिक रूप से वैसी ही रहीं जैसी 1947 में थीं।
यह सूची उसी की है। यह आरोप नहीं है। यह सिर्फ़ ईमानदार लेखा जोखा है।
1. प्रशासनिक सेवा का बुनियादी ढांचा
भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस का जो रूप आज है, वह सीधे इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस की उत्तराधिकारी है। आईसीएस वह सेवा थी जिसके ज़रिये अंग्रेज़ कुछ हज़ार अधिकारियों से पूरे उपमहाद्वीप पर शासन करते थे। एक ज़िला, एक ज़िलाधिकारी, बहुत बड़ी ताक़त।
आज़ादी के बाद नाम बदला, लेकिन बुनियादी ढांचा वही रहा। एक सामान्य अधिकारी, एक बड़े ज़िले पर व्यापक कार्यकारी अधिकार। वही प्रशिक्षण, वही पदानुक्रम, वही दूरी।
बदलाव कुछ हुए। अब अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह है, अंग्रेज़ राजशाही के नहीं। लेकिन रोज़मर्रा का अनुभव, जब आप ज़िलाधिकारी से मिलना चाहते हैं, बहुत हद तक 1900 जैसा ही है। प्रतीक्षा, बिचौलिए, सही समय का इंतज़ार।
2. पुलिस अधिनियम 1861 की रूह
ब्रिटिश राज ने 1857 के विद्रोह के बाद पुलिस अधिनियम 1861 बनाया। इसका मुख्य उद्देश्य था, पुलिस को राज्य के प्रति जवाबदेह बनाना, समुदाय के प्रति नहीं। पुलिस का काम था, असहमति को रोकना, सरकार की रक्षा करना।
यह क़ानून दशकों तक चलता रहा। राज्यों ने अपने अपने पुलिस क़ानून बनाए, लेकिन उनमें से बहुतों की रूह आज भी 1861 जैसी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधार के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे। इन निर्देशों पर अमल आधा अधूरा हुआ है।
नतीजा यह है कि एक आम नागरिक के लिए पुलिस थाना आज भी डर की जगह है, सहायता की नहीं। यह स्वतंत्रता के बाद भी पूरी तरह नहीं बदला।
3. भूमि अधिग्रहण की मनोवृत्ति
ब्रिटिश राज में भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बना। इसका तर्क था, सरकार सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किसी की भी भूमि ले सकती है। मुआवज़ा देगी, लेकिन भूमि लेगी ज़रूर।
यह क़ानून 1894 से 2013 तक चला, यानी आज़ादी के 66 साल बाद तक। 2013 में नया क़ानून बना, जिसने थोड़े बहुत बदलाव किए। लेकिन बुनियादी मनोवृत्ति, कि राज्य की ज़रूरत व्यक्तिगत मालिकी पर भारी पड़ती है, अभी भी क़ायम है। आज भी सड़क, बांध, परियोजना के नाम पर किसानों की भूमि का अधिग्रहण होता है, और मुआवज़ा क्या होगा, यह सरकार तय करती है, ज़मीन का मालिक नहीं।
4. राजद्रोह जैसे विचार
ब्रिटिश राज ने 1870 में भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धारा 124-ए जोड़ी थी। इसका मुख्य उपयोग था स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजना। तिलक, गांधी, सब इसी धारा के तहत जेल गए।
आज़ादी के बाद यह धारा बनी रही, दशकों तक। हाल ही में नई भारतीय न्याय संहिता में इसे बदला गया, लेकिन ऐसे ही विचार वाले प्रावधान बने हुए हैं, सिर्फ़ नए नाम के साथ। कानून का नाम बदला। मनोवृत्ति का बदलना अभी बाक़ी है।
5. राज्यपाल का पद
ब्रिटिश राज में हर प्रांत का गवर्नर एक अंग्रेज़ अधिकारी होता था, जिसे केंद्र ने नियुक्त किया होता था। उसका काम था, केंद्र के हितों को प्रांत में लागू करना। प्रांत की चुनी हुई सरकार के काम में दख़ल देना, ज़रूरत पड़ने पर बर्ख़ास्त करना।
आज़ादी के बाद यह पद बना रहा। अब अंग्रेज़ नहीं हैं, भारतीय हैं, लेकिन भूमिका लगभग वैसी ही है। केंद्र द्वारा नियुक्त, राज्य की सरकार पर निगरानी, और कुछ परिस्थितियों में राज्य सरकार के निर्णयों में हस्तक्षेप।
यह पद आज भी विवादास्पद है। हर कुछ साल में कोई न कोई मामला सामने आता है जहां राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठते हैं। ब्रिटिश डिज़ाइन का यह हिस्सा संविधान में बना रहा।
6. अंग्रेज़ी का प्रभुत्व
ब्रिटिश राज में अंग्रेज़ी थी ऊपर वालों की भाषा। प्रशासन, अदालत, उच्च शिक्षा, सब अंग्रेज़ी में।
आज़ादी के बाद यह बदला, लेकिन पूरी तरह नहीं। सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट आज भी अंग्रेज़ी में चलते हैं। केंद्र सरकार के बड़े फ़ैसले अंग्रेज़ी में आते हैं, फिर हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद होते हैं। उच्च शिक्षा, विशेष रूप से तकनीकी और चिकित्सा, बहुत हद तक अंग्रेज़ी में है।
यह कोई बुराई नहीं है। अंग्रेज़ी जानना उपयोगी है। लेकिन यह तथ्य है कि ब्रिटिश राज के जाने के बाद उसकी भाषा बहुत हद तक रह गई, और जो उसे जानता है, वह आज भी कई फ़ायदों में आगे है।
7. विभिन्न अधिनियमों के नाम और रूप
कई पुराने ब्रिटिश दौर के अधिनियम सिर्फ़ नाम बदलकर चलते रहे। साक्ष्य अधिनियम, संविदा अधिनियम, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, यह सब 19वीं सदी के क़ानून हैं जो थोड़े बहुत संशोधनों के साथ आज भी लागू हैं।
बीच में सरकारों ने नए नाम दिए। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, यह सब हाल के बदलाव हैं। लेकिन बुनियादी संरचना, बहुत हद तक ब्रिटिश ढांचे की उत्तराधिकारी है।
8. अमीर और ग़रीब के बीच क़ानून की पहुंच
ब्रिटिश राज में अमीर भारतीय अच्छे वकील रख सकता था, अंग्रेज़ी जानता था, अदालत तक पहुंच पाता था। ग़रीब के लिए क़ानून दूर था, समझ से बाहर था, ख़र्चे से बाहर था।
यह आज भी है। नए क़ानून बने हैं, मुफ़्त क़ानूनी सहायता की व्यवस्था है, लोक अदालतें हैं, लेकिन व्यवहार में अमीर और ग़रीब के लिए क़ानून का अनुभव बहुत अलग है। यह औपनिवेशिक विरासत नहीं है केवल, यह विश्व भर की समस्या है, लेकिन भारत में यह विशेष रूप से ब्रिटिश ढांचे के साथ जुड़ी रही।
9. शिक्षा का परीक्षा केंद्रित होना
मैकाले की 1835 की शिक्षा नीति का मक़सद था, ऐसे भारतीय तैयार करना जो प्रशासन में अंग्रेज़ी के सहायक बनें। यानी ऐसी शिक्षा जो जानकारी याद कराए, सवाल पूछने की आदत न डलवाए, आज्ञा का पालन सिखाए।
यह व्यवस्था आज़ादी के बाद भी क़ायम रही, थोड़े बहुत बदलाव के साथ। आज भी अधिकतर भारतीय स्कूल परीक्षा आधारित हैं। याद करना, लिखना, अंक पाना। बहस, चर्चा, स्वतंत्र चिंतन, यह आज भी हाशिये पर है।
नई शिक्षा नीति 2020 में इसे बदलने की बात है, लेकिन ज़मीन पर यह बदलाव बहुत धीमा है।
10. सरकारी काम में देरी की संस्कृति
ब्रिटिश राज में सरकारी काम धीमा था। फ़ाइलें यहां से वहां जाती थीं, टिप्पणियां लिखी जाती थीं, मंज़ूरी होती थी, फिर अगला क़दम। यह व्यवस्था नियंत्रण के लिए बनी थी, सेवा के लिए नहीं।
आज़ादी के बाद यह व्यवस्था बहुत हद तक वैसी ही चली। डिजिटल युग में थोड़े बहुत बदलाव हुए हैं, लेकिन सरकारी दफ़्तर में काम कराने का अनुभव आज भी 1947 जैसा ही है, बहुत हद तक।
अंत में
यह सूची आलोचना के लिए नहीं है। यह स्वीकार करने के लिए है।
आज़ादी एक रात में नहीं आई। औपनिवेशिक विरासत भी एक रात में नहीं जाएगी। हमने 78 साल में बहुत कुछ बदला है, और बहुत कुछ बदलना बाक़ी है।
लेकिन बदलाव की पहली शर्त है, यह पहचानना कि क्या बदलना है। जब हम मान लेते हैं कि सब बदल गया, तब असली बदलाव रुक जाता है।
ब्रिटिश राज की छाया अभी पूरी तरह नहीं हटी है। यह मानने में कुछ बुरा नहीं है। यह मानने से ही असली बदलाव की दिशा खुलती है।
आज़ादी एक उपलब्धि है। आज़ादी का पूरा अर्थ अभी एक यात्रा है।