एक छोटा सा प्रयोग कीजिए। अपने आप से ये सवाल पूछिए।
आपके इलाक़े के विधायक का नाम क्या है। ज़्यादातर लोगों को पता है। आपके सांसद का नाम क्या है। शायद पता है। आपके प्रधानमंत्री का नाम। पता है।
अब ये सवाल पूछिए। आपके इलाक़े के तहसीलदार का नाम क्या है। आपके ब्लॉक के बीडीओ का नाम क्या है। आपके पटवारी या लेखपाल का नाम क्या है। आपके एसडीएम का नाम क्या है। आपके थानेदार का नाम क्या है।
ज़्यादातर लोगों के पास इन सवालों का जवाब नहीं होगा।
लेकिन यहां एक विडंबना है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, ये सब आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बहुत कम छूते हैं। ये सब बड़े फ़ैसले करते हैं, बड़ी योजनाएं बनाते हैं। लेकिन आपके ज़मीन के काग़ज़ की एक एंट्री, आपके बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र की देरी, आपके खेत की चहारदीवारी की मंज़ूरी, आपके मोहल्ले की सड़क का प्रस्ताव, यह सब उन अधिकारियों के हाथ में है जिनके नाम तक आप नहीं जानते।
यह विरोधाभास है। सबसे ताक़तवर अधिकारी, सबसे कम जाने जाते हैं।
जो रोज़ की ज़िंदगी चलाते हैं
आइए नामों से परिचय कराते हैं।
पटवारी या लेखपाल आपके गांव या मोहल्ले की भूमि का रिकॉर्ड रखता है। आपके खेत की सीमा, आपके नाम पर ज़मीन, बंटवारे, रिकॉर्ड में बदलाव, यह सब उसके ज़िम्मे है। एक पटवारी पंद्रह बीस गांवों का काम संभालता है। उसकी एक एंट्री की कमी सालों तक मुक़दमे का कारण बन सकती है।
तहसीलदार तहसील स्तर का राजस्व अधिकारी है। ज़मीन के दाख़िल ख़ारिज, छोटे क़ानूनी विवाद, सरकारी राहत वितरण, जाति आय आवास प्रमाण पत्र, यह सब उसके पास से होकर निकलता है। तहसीलदार अगर साथ है, काम होता है। नहीं है, तो काम सालों लटक सकता है।
ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर यानी बीडीओ ब्लॉक स्तर का विकास अधिकारी है। मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास, पंचायत के काम, ब्लॉक स्तर की योजनाएं, यह सब बीडीओ के ज़िम्मे हैं। एक सक्रिय बीडीओ पूरे ब्लॉक की तस्वीर बदल सकता है।
एसडीएम यानी उप ज़िलाधिकारी अनुमंडल का अधिकारी है। राजस्व, अदालत, क़ानून व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, यह सब उसके ज़िम्मे है। एसडीएम की मेज़ पर बहुत बड़े फ़ैसले बैठते हैं।
थानेदार यानी एसएचओ आपके इलाक़े के थाने का प्रभारी है। एफआईआर दर्ज होगी या नहीं, छोटे विवादों में दख़ल होगा या नहीं, सड़क पर अनधिकृत अतिक्रमण हटेगा या नहीं, यह सब थानेदार के रवैये पर निर्भर है।
नगर निगम अधिकारी शहर में बीडीओ की भूमिका निभाता है। सफ़ाई, सड़क, पानी, पार्क, यह सब। नगर निगम का जेई, एई, यह वही लोग हैं जो आपकी कॉलोनी की गलियों का नक़्शा बनाते हैं।
तहसील का कानूनगो, ज़िला कलेक्ट्रेट का बाबू, एडीएम, यह सूची लंबी है।
ये अधिकारी कितनी ताक़त रखते हैं
एक उदाहरण से बात समझिए।
मान लीजिए आपके खेत में पटवारी ने ग़लती से किसी और का नाम चढ़ा दिया। यह एक कलम का काम है, और इसे ठीक करने में सालों लग सकते हैं। मुक़दमा अदालत जाएगा, पैसा ख़र्च होगा, समय बर्बाद होगा।
मान लीजिए आपके मोहल्ले में एक सरकारी स्कूल है, जिसकी मरम्मत के लिए बजट आया। यह बजट कब इस्तेमाल होगा, कैसे इस्तेमाल होगा, इसमें बीडीओ की भूमिका सबसे बड़ी है।
मान लीजिए आपके इलाक़े में बिजली का खंभा गिर गया, और कई दिनों से बिजली नहीं है। बिजली बोर्ड के स्थानीय अधिकारी से अगर पहचान है, तो काम जल्दी होगा। नहीं है, तो लाइन में नंबर लगेगा।
मान लीजिए आपके पड़ोसी ने आपकी सीमा पर अतिक्रमण कर लिया। थानेदार के पास जब आप जाते हैं, तो उसका रवैया तय करेगा कि मामला कैसे आगे बढ़ता है।
यह सब रोज़मर्रा की चीज़ें हैं। और इन सब में जो लोग सबसे बड़ा फ़र्क डालते हैं, वे विधायक या सांसद नहीं हैं। वे ये अधिकारी हैं।
ये जानकारी क्यों दबी है
इन अधिकारियों का नाम और संपर्क सूचना सार्वजनिक है। हर तहसील की वेबसाइट पर है। ज़िला कलेक्ट्रेट की वेबसाइट पर है। नगर निगम की वेबसाइट पर है।
लेकिन यह जानकारी बहुत कम लोगों तक पहुंचती है। क्यों?
पहला कारण, राजनीतिक कवरेज इन्हें नज़र अंदाज़ करता है। टीवी और अख़बार बड़े नेताओं की कहानियां दिखाते हैं। तहसीलदार पर ख़बर नहीं बनती, जब तक कोई बड़ा घोटाला न हो।
दूसरा कारण, ये अधिकारी ख़ुद को छुपाते हैं। कई अधिकारी अपने नाम सार्वजनिक करना पसंद नहीं करते, क्योंकि शिकायतें बढ़ जाएंगी। उनके दफ़्तर के बाहर अक्सर नाम तक नहीं लिखा होता, या मिटा दिया गया होता है।
तीसरा कारण, हम पूछते ही नहीं। हम मान लेते हैं कि सरकारी काम धीमा है, सरकारी अधिकारी पहुंच से बाहर हैं। यह मान लेना ही उन्हें दूर रखता है।
जो आज ही किया जा सकता है
आज एक काम कीजिए। तीस मिनट का है।
क़दम 1: अपने ज़िले के कलेक्ट्रेट की वेबसाइट खोलिए। हर ज़िले की एक होती है, “जिला डाट निक डाट इन” जैसी।
क़दम 2: वहां “अधिकारी सूची” या “ऑफ़िसर्स” का सेक्शन देखिए। उसमें ज़िले के सारे अधिकारियों का नाम, पद, और संपर्क मिल जाएगा।
क़दम 3: कम से कम ये नाम लिख लीजिए। आपका जिलाधिकारी, आपका एसडीएम, आपका तहसीलदार, आपका बीडीओ। अगर शहर में रहते हैं, तो आपके वार्ड का नगर निगम अधिकारी, आपका थानेदार।
क़दम 4: एक फ़ोन नंबर रिकॉर्ड कर लीजिए। ज़रूरत पर काम आएगा।
क़दम 5: अगली बार जब आप किसी सरकारी काम में अटकें, बड़े नेताओं को फ़ोन करने से पहले इन अधिकारियों को संपर्क कीजिए। आधे मामले यहीं हल हो जाते हैं।
अधिकारियों से कैसे बात करें
यह छोटी सी जानकारी कई बार बहुत काम आती है।
सरकारी अधिकारी को मिलने जाते समय निम्न बातें याद रखें।
मुलाक़ात का समय पहले से जान लीजिए। हर अधिकारी का “जनसुनवाई” का समय होता है, सप्ताह में एक या दो दिन।
अपना मामला लिखकर लाइए। मौखिक से लिखित हमेशा बेहतर है। एक पन्ने पर साफ़ शब्दों में अपनी समस्या और जो माँग रहे हैं।
आरटीआई का नाम जानिए। अगर मामला नहीं बढ़ रहा, तो आरटीआई आवेदन एक प्रभावी उपकरण है। दस रुपये का है। तीस दिन में जवाब देना अनिवार्य है।
विनम्र रहिए, लेकिन डरिए नहीं। यह अधिकारी आपके नौकर हैं, आपके मालिक नहीं। उनका वेतन आपके टैक्स से आता है। उन्हें अपना काम करना है। और आपको भी अपने अधिकार जानने हैं।
अंत में
लोकतंत्र के बारे में हमारी जानकारी बहुत हद तक “ऊपर” से शुरू होती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, बड़े मंत्री, यह सब हमें पता है।
लेकिन लोकतंत्र असल में नीचे से बनता है। उन अधिकारियों के दफ़्तर से जो आपकी गली से दस मिनट दूर हैं। उन कर्मचारियों से जो आपके ज़मीन के काग़ज़ संभालते हैं। उन फ़ैसलों से जो रोज़ छोटी छोटी मेज़ों पर होते हैं।
जब आप इन अधिकारियों का नाम तक नहीं जानते, तब आप अपने हक़ का बड़ा हिस्सा खो देते हैं। जब आप जानते हैं, तब आप उस हक़ का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आज शाम तक अपने तहसीलदार और बीडीओ का नाम पता कीजिए। शुरुआत यहीं से होती है।
ताली बजाना बंद कीजिए, खोजना शुरू कीजिए।