एक बूढ़ा आदमी है। शाम का वक़्त है। वह अपने मोहल्ले के उस पुराने पार्क में टहलने निकला है, जहां वह पिछले तीस साल से जाता आया है। कुछ क़दम चलने के बाद उसके घुटने थक जाते हैं। वह बैठने की जगह ढूंढता है।
जिस बेंच पर वह बीस साल पहले बैठा करता था, वह अब भी वहां है। पर अब उसके बीच में लोहे की एक पट्टी लगी हुई है, जो बैठने वाले को आधा कर देती है, और लेटने को नामुमकिन। वह आदमी कोशिश करता है, सिर्फ़ पीठ टिकाने भर की। तीन मिनट में पट्टी पीठ में चुभने लगती है। वह उठ खड़ा होता है।
यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। बेंच पर वह पट्टी जान बूझकर लगाई गई है, ताकि कोई उस पर लेट न सके। उस पट्टी का सबसे बड़ा निशाना बेघर लोग हैं, पर असली असर उन बूढ़ों पर पड़ता है जो थोड़ी देर सुस्ताने आए थे, उन माओं पर जो बच्चे के सोते समय ख़ुद थोड़ी देर पीठ टिकाना चाहती थीं, और उन छात्रों पर जो शाम में दो घंटे चुपचाप बैठकर पढ़ना चाहते थे।
एक छोटी सी लोहे की पट्टी। और उसमें एक पूरा शहर खड़ा है।
बेंच पर लोहे की पट्टी
अगर ध्यान से देखें, तो हमारे शहरों में पिछले कुछ दशकों से एक चुपचाप वाली डिज़ाइन का चलन है। उसे शहरी योजनाकार अलग अलग नामों से जानते हैं, पर एक आम नागरिक के लिए उसे एक सीधे वाक्य में कहा जा सकता है, यह डिज़ाइन कह रही है, यहां ठहरो मत।
बेंच के बीच की पट्टी एक उदाहरण है। बस स्टैंड पर तिरछी झुकी हुई वह सीट जिस पर रुक भर सकते हो, बैठ नहीं सकते, दूसरी। मेट्रो स्टेशन के बाहर अचानक ग़ायब हो गई शेड और बेंच तीसरी। फुटपाथ के किनारे लगे वे पत्थर जो किसी को सुस्ताने नहीं देते, चौथी। और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के सामने वह सख़्त “बिना कुछ ख़रीदे यहां खड़े मत हो” वाला माहौल पांचवीं।
ये सब एक सोची समझी रचना है। हर एक टुकड़ा अकेला देखें तो छोटा लगता है। पर जब सब मिलाकर देखो, तो एक पूरी मानसिकता दिखती है। शहर अब आराम के लिए नहीं बनाए जा रहे। शहर अब केवल काम और ख़रीद के लिए बनाए जा रहे हैं। जो इन दोनों में नहीं है, उसे शहर अपने अंदर रखना नहीं चाहता।
यह कोई एक शहर का दोष नहीं है। यह एक नई आदत है जो धीरे धीरे हर शहर ने ओढ़ ली है, और हम सबने उसे होने दिया, क्योंकि हर अकेला फ़ैसला अपने आप में बहुत बड़ा नहीं लगता।
तीन तरह से एक जगह मरती है
सार्वजनिक स्थान एक ही दिन में नहीं मरते। उनकी मौत धीमी होती है, और तीन अलग रास्तों से आती है।
पहली, सीधा ग़ायब हो जाना। मोहल्ले का जो छोटा पार्क था, वहां अब एक पार्किंग रैंप है। चौक पर जो नीम का पेड़ था, उसके नीचे जहां शाम को बूढ़े जमा होते थे, वह पेड़ कट गया, और नीचे एक दुकान खुल गई। नगर निगम का पुस्तकालय जो पुराने समय में हर मोहल्ले में होता था, अब या तो बंद है, या उसके दरवाज़े पर एक ताला लगा है जिसकी चाबी किसी को नहीं मिलती। यह पहली मौत है, जगह का होते होते न होना।
दूसरी, बाज़ार में बदल जाना। एक चौक जहां पहले लोग आते जाते थे, अब वहां एक मॉल है। एक पुरानी सड़क जहां फेरीवाले बैठते थे, उसे चौड़ा करके सिर्फ़ गाड़ियों के लिए छोड़ दिया गया। एक मैदान जहां मोहल्ले के बच्चे शाम को क्रिकेट खेलते थे, उसके चारों ओर अब दीवार उठ गई है, और भीतर एक प्राइवेट क्लब चल रहा है जिसकी सदस्यता हर महीने हज़ारों में है। जो कभी सबकी जगह थी, अब उनकी है जो भर सकते हैं।
तीसरी, और सबसे चुपचाप वाली, डिज़ाइन से बाहर कर देना। जगह वही है, पर वहां रुकना नामुमकिन बना दिया गया। बेंच पर पट्टी, फुटपाथ पर पत्थर, सीढ़ी पर रेलिंग, चौक पर सिक्योरिटी गार्ड। आपको दिख रही है जगह, पर जब आप उसमें थोड़ी देर ठहरने की कोशिश करेंगे, तो कोई न कोई संकेत आपको आगे बढ़ने को कहेगा। यह बहिष्कार चीख कर नहीं होता, यह डिज़ाइन में बुना होता है, और इसीलिए सबसे ख़तरनाक होता है।
तीनों में एक बात साझा है। हर मौत के साथ शहर में सबके लिए बची हुई जगह थोड़ी और कम हो जाती है। और जो जगह जा रही है, वह वापस नहीं आती।
जो सबसे पहले बाहर होते हैं
जब सार्वजनिक स्थान सिकुड़ता है, तो उसका असर सब पर एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग सबसे पहले बाहर होते हैं।
बच्चे, क्योंकि उन्हें खुली जगह की ज़रूरत होती है, खेलने के लिए, गिरने के लिए, साथियों से मिलने के लिए। बंद कमरों में खेलने वाला बच्चा एक अलग बच्चा बनता है। मोहल्ले के मैदान में खेलने वाला बच्चा एक अलग बच्चा बनता है। उस अंतर को नज़र से नहीं देखा जा सकता, पर वह असली है।
बूढ़े, क्योंकि उन्हें बैठने की, धीरे चलने की, और अपने बराबर के लोगों से रोज़ मिलने की ज़रूरत होती है। एक बूढ़े के लिए मोहल्ले का चौक सिर्फ़ टहलने की जगह नहीं है, वह उसकी रोज़ की दुनिया है। जब वह चौक मर जाता है, तो उसके साथ बूढ़े का सामाजिक जीवन भी सिकुड़ जाता है। आज जो “बुज़ुर्गों के अकेलेपन” को एक बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में पहचाना जा रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा इन्हीं ग़ायब हुई जगहों की देन है।
महिलाएं, क्योंकि सार्वजनिक स्थान की दृश्यता ही महिलाओं की सुरक्षा का सबसे बड़ा कारण है। एक चौक जहां शाम को बहुत लोग आते जाते हैं, जहां एक चाय की दुकान है, जहां एक बेंच पर कोई बैठा है, उसमें अकेली महिला भी सुरक्षित महसूस करती है। एक सुनसान फुटपाथ, जिस पर रुकने की कोई जगह नहीं, और जो सिर्फ़ निकल जाने के लिए है, वह असुरक्षित होता है। डिज़ाइन से जब “रुकना” हटा दिया जाता है, तो उस जगह से “देखभाल” भी हट जाती है।
मेहनतकश और दिहाड़ी मज़दूर, क्योंकि उनके पास निजी जगह है ही नहीं। एक रिक्शाचालक के पास अपना कमरा हो भी सकता है, पर वहां वह सिर्फ़ सोता है। दिन का बाक़ी समय वह सड़क पर है। उसके लिए बेंच, चौक, और पेड़ की छांव सिर्फ़ सुविधा नहीं है, वह उसकी ज़िंदगी का हिस्सा है। जब सार्वजनिक स्थान मरते हैं, तो सबसे पहले उन्हीं की ज़मीन खिंचती है जो अपनी ज़मीन ख़रीद नहीं सकते।
एक शहर को देखकर यह समझना हो कि वह कितना सभ्य है, उसे उसके अमीरों से नहीं, उसके बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं, और मज़दूरों से समझिए। उनके लिए जगह है, तो शहर है। नहीं है, तो शहर अधूरा है।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह ढांचा है
यहां एक ज़रूरी बात कहनी है, क्योंकि बात आगे बढ़ने से पहले इसे साफ़ करना ज़रूरी है। यह जो हो रहा है, यह किसी की साज़िश नहीं है।
कोई एक बैठक नहीं हुई जिसमें यह तय किया गया हो कि सार्वजनिक स्थानों को धीरे धीरे ख़त्म कर दिया जाए। कोई एक आदेश नहीं निकला। यह हुआ हज़ार छोटे छोटे फ़ैसलों के ज़रिए, हर एक फ़ैसला अपने आप में तर्कसंगत लगता हुआ। एक चौक को पार्किंग में बदलना ज़रूरी था क्योंकि गाड़ियां बहुत हो गई थीं। एक पार्क के बीच मॉल बनाना ठीक लगा क्योंकि शहर को आधुनिक दिखना था। एक पुस्तकालय को बंद करना मजबूरी थी क्योंकि बजट कम था। हर एक फ़ैसला अकेले देखो तो जायज़ है, पर सब मिलाकर शहर के लिए नुक़सान है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर शहर में, हर सरकार के अधीन, यह चुपचाप होता रहा है। और हम नागरिकों ने भी इसे होने दिया, क्योंकि एक एक फ़ैसले पर लड़ने की हमारे पास ताक़त नहीं थी, और पूरे ढांचे को देखने की हमारे पास आदत नहीं थी। समस्या किसी की नीयत नहीं है, समस्या उस सोच में है जो शहर को एक उत्पाद की तरह देखती है, और इसी वजह से नागरिक को सिर्फ़ ग्राहक की तरह देखती है।
ढाई हज़ार साल पहले प्लेटो ने एक बात कही थी, जो आज भी सच है। वह कहता था कि शहर सिर्फ़ इमारतों से नहीं बनता। शहर बनता है उन साझा जगहों से जहां नागरिक एक दूसरे से रोज़ मिलते हैं, बात करते हैं, बहस करते हैं, और एक दूसरे की पहचान बनते हैं। उसी जगह को यूनानी “अगोरा” कहते थे, हम उसे चौक कह सकते हैं। जब चौक ख़त्म होता है, तो शहर भी ख़त्म होता है, चाहे उसकी सड़कें कितनी भी चौड़ी हों, और उसकी इमारतें कितनी भी ऊंची।
क्या किया जा सकता है
यह जवाब का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, क्योंकि ठोस काम के बिना यह सब सिर्फ़ शिकायत है।
पहली बात, एक जगह चुनिए और उसकी रक्षा कीजिए। आपके मोहल्ले में कोई एक पार्क होगा, कोई एक पुस्तकालय, कोई एक चौक। उस जगह को नियमित रूप से इस्तेमाल कीजिए। शाम को टहलने जाइए। बच्चों को वहां ले जाइए। बूढ़ों के पास बैठिए। इस्तेमाल की हुई जगह को कोई जल्दी नहीं मिटा सकता। जो जगह ख़ाली पड़ी रहती है, वहीं पहले विकास का बुलडोज़र पहुंचता है।
दूसरी बात, विकास का सवाल बदलिए। जब आपके इलाक़े में कोई नई परियोजना घोषित हो, मॉल हो, पार्किंग हो, चौड़ी सड़क हो, तो सिर्फ़ यह मत पूछिए कि उसमें मेरा क्या फ़ायदा है। यह भी पूछिए कि उससे कौन बाहर हो रहा है। बच्चे कहां खेलेंगे? बूढ़े कहां बैठेंगे? रिक्शाचालक कहां सुस्ताएगा? यह सवाल असहज है, और इसीलिए ज़रूरी है। जो सवाल असहज है, वही असली सवाल है।
तीसरी बात, पुस्तकालय की मांग कीजिए। हर ज़िले में, हर वार्ड में, एक मुफ़्त पुस्तकालय का होना नागरिक का अधिकार है, माफ़ी नहीं। यह छोटी बात नहीं है। एक नौजवान जिसके घर में पढ़ने की जगह नहीं, उसके लिए मोहल्ले का पुस्तकालय वह सीढ़ी है जिस पर चढ़कर वह अगले बीस साल में कहीं और पहुंच सकता है। उस सीढ़ी का अभाव सिर्फ़ एक सुविधा का अभाव नहीं है, वह एक पूरी पीढ़ी का बंद रास्ता है।
चौथी बात, बेंच को बेंच रहने दीजिए। यह सुनने में अजीब लगता है, पर यह उतना ही बुनियादी है। अगली बार जब आप किसी पार्क की बेंच पर लोहे की पट्टी देखें, या किसी बस स्टैंड पर तिरछी सीट, या किसी फुटपाथ पर ऐसे पत्थर जो बैठने न दें, तो उसे एक छोटी सी असुविधा मानकर मत छोड़िए। उस छोटी डिज़ाइन में एक बड़ा संदेश है, और उस संदेश को पहचानिए। नगर निगम से, अपने जनप्रतिनिधि से, और स्थानीय अख़बार से यह सवाल पूछिए कि वह पट्टी वहां क्यों है। एक पट्टी के बारे में पूछा गया सवाल भी छोटी बात नहीं है, क्योंकि एक पट्टी के पीछे एक पूरी नीति खड़ी है।
अंत में
एक शहर को उसकी सबसे मामूली जगहों से समझा जा सकता है। उसकी सबसे साधारण बेंच से, उसके सबसे छोटे चौक से, उसके सबसे पुराने पुस्तकालय से। ये जगहें जब अच्छी होती हैं, तो शहर अच्छा होता है। ये जब मरती हैं, तो शहर के साथ कुछ और भी मरता है, जिसे हम अक्सर नाम नहीं दे पाते।
अगर शहर में बैठने को जगह नहीं है, तो वह शहर नहीं है। वह सिर्फ़ एक बाज़ार है, जिसमें घूमते हुए नागरिक धीरे धीरे सिर्फ़ ग्राहक बन जाते हैं। और एक नागरिक जो ग्राहक बनकर ही जी सकता है, वह लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है, क्योंकि वह यह भूल जाता है कि उसका शहर उसका है, किसी और का नहीं।
ताली बजाना बंद कीजिए, बैठने की जगह मांगना शुरू कीजिए। यह छोटी सी बात लगती है, पर एक पूरी सभ्यता उन्हीं छोटी जगहों से बनती है, जहां एक अनजान आदमी दूसरे अनजान आदमी के बग़ल में बिना डर के बैठ सके।