दोपहर के दो बजे हैं। एक शहर में, धूप इतनी तेज़ है कि सड़क का तारकोल पिघलने लगा है। एक निर्माण स्थल पर एक मज़दूर ईंट उठा रहा है। उम्र क़रीब अड़तीस। उसके सामने एक छोटी सी बोतल है, जिसमें पानी आधा बचा है। उसके सिर पर एक पुराना अंगोछा है, जो धूप के लिए नहीं, पसीने पोंछने के लिए। उसके आसपास कोई पेड़ नहीं है, कोई शेड नहीं है, कोई ठंडी जगह नहीं है जहां वह आधे घंटे के लिए जा सके।
ठीक उसी समय, उसी शहर में, उसी सड़क के थोड़ी दूर एक ऊंची इमारत के अंदर एक कमरा है, जहां तापमान बाईस डिग्री है। वहां एक आदमी कुर्सी पर बैठा है, अपनी मेज़ पर काम कर रहा है। उसकी खिड़की से बाहर का तापमान दिख रहा है, सैंतालीस। पर उस तापमान का असर उसके भीतर के बाईस तक नहीं पहुंचता।
दोनों एक ही शहर में हैं, एक ही दोपहर में, और सरकारी आंकड़े दोनों के लिए एक ही तापमान दर्ज कर रहे हैं। पर इन दोनों के लिए “सैंतालीस डिग्री” दो बहुत अलग चीज़ें हैं। एक के लिए वह बस एक संख्या है। दूसरे के लिए वह उसका शरीर है, उसका दिन है, उसकी जान का जोखिम है।
गर्मी का दूसरा देश इसी फ़र्क़ की कहानी है।
गर्मी जो सबके लिए एक नहीं होती
मौसम विभाग जब तापमान बताता है, तो वह संख्या एक छाया वाली जगह पर लगे थर्मामीटर की होती है। ज़मीन की सतह का तापमान, या एक तपती छत का तापमान, या एक चलते मज़दूर का शरीर का तापमान, इन सबकी संख्या उससे कई डिग्री ज़्यादा होती है। एक छप्पर के नीचे, जहां धूप सीधे आती है, गर्मी सरकारी संख्या से दस डिग्री ऊपर तक जा सकती है।
इसका मतलब क्या होता है, यह विज्ञान बहुत साफ़ है। शरीर का अंदर का तापमान जब लगातार सीमा से ऊपर रहता है, तो गुर्दे काम करना धीमा कर देते हैं, मस्तिष्क की सोच धुंधली हो जाती है, और लंबे समय में हृदय पर असर पड़ता है। एक दिन की चूक का असर शायद कम हो, पर साल दर साल, जो लोग खुले में काम करते हैं, उनकी ज़िंदगी पांच से दस साल छोटी हो रही है। यह आंकड़ा सरकारी रिपोर्ट में नहीं है, क्योंकि इसे गिनने की हमारी आदत नहीं है। पर यह सच है।
जो लोग छांव वाले कमरों में काम करते हैं, उन्हें यह सच एक अलग देश की ख़बर लगता है। उनके लिए गर्मी एक मौसम है, असुविधा है, बात करने का विषय है। जो लोग खुले में काम करते हैं, उनके लिए यह उनकी पूरी ज़िंदगी की संरचना है। ये दो अनुभव एक ही “गर्मी” शब्द में बांधे जाते हैं, और इसी बंधन में सबसे बड़ी असमानता छुप जाती है।
जिन्हें सबसे ज़्यादा भुगतना है
गर्मी का असली असर कुछ ख़ास तबक़ों पर ज़्यादा पड़ता है। यह सूची देखिए, क्योंकि इसमें छुपा हुआ एक पूरा देश है।
निर्माण मज़दूर, जो दिन भर खुले में ईंट उठाते हैं, सीमेंट मिलाते हैं, छत बनाते हैं। उनके पास न शेड है, न नियमित ब्रेक का अधिकार, न ठंडे पानी की गारंटी। ठेकेदार के पास उनके स्वास्थ्य की कोई औपचारिक ज़िम्मेदारी नहीं है।
सड़क पर खाना पहुंचाने वाले, जो आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था के अदृश्य पहिये हैं। दस घंटे की शिफ़्ट, मोटरसाइकिल पर, सूरज और तारकोल के बीच। एक मोबाइल ऐप उनके हर मिनट को मापती है, पर तापमान को नहीं मापती।
फेरीवाले और रेहड़ी वाले, जो दिन भर सड़क के किनारे बैठते हैं। उनकी पूरी रोज़ी एक तय जगह पर बैठे रहने पर निर्भर है, इसलिए वे चाहते हुए भी छांव में नहीं जा सकते।
खेत मज़दूर, जो धान, गेहूं, गन्ने की कटाई के समय बारह बारह घंटे धूप में रहते हैं। ग्रामीण भारत में जब लू चलती है, तो यह वर्ग सबसे पहले हारता है, पर ख़बर में सबसे आख़िर में आता है।
टीन की छत वाले घरों में रहने वाली स्त्रियां, क्योंकि रसोई का काम, बच्चों की देखभाल, और घर का बाक़ी काम उनके ज़िम्मे होता है, अक्सर एक ऐसे कमरे में जो छत से उतरती गर्मी की भट्टी बन जाता है। यह एक अनदेखा बोझ है, जिसकी कोई गिनती नहीं होती।
ये पांचों मिलाकर देश का वह बड़ा हिस्सा हैं, जो हर साल मई जून में अपनी जान जोखिम में डालकर काम करता है। और इन्हीं पर सबसे कम ध्यान जाता है।
क़ानून में जो नहीं है
यहां एक ज़रूरी सच कहना है, जो बहुत कम लोग जानते हैं।
हमारे यहां अभी तक कोई स्पष्ट, लागू होने योग्य गर्मी से सुरक्षा वाला श्रम क़ानून नहीं है। एक खुले में काम करने वाले मज़दूर को कितने तापमान पर ब्रेक मिलना चाहिए, कितने अंतराल पर पानी मिलना चाहिए, किस तापमान पर काम रुकना चाहिए, यह क़ानूनी रूप से तय नहीं है। एक सिफ़ारिश है, एक दिशानिर्देश है, पर अधिकार नहीं है।
दुनिया के बहुत से देशों ने यह व्यवस्था बनाई है। एक तय तापमान से ऊपर बाहरी काम बंद, हर इतने मिनट पर शीतल पानी, हर इतने घंटे पर छांव में आराम, अत्यधिक तापमान के दिनों में सरकारी स्तर पर श्रमिक संरक्षण। यह कोई विदेशी विलासिता नहीं है, यह उनके यहां श्रमिकों ने सालों संगठित होकर मांगी और पाई है।
हमारे यहां यह अधिकार नहीं है, इसका मतलब यह नहीं कि गर्मी कम है। गर्मी ज़्यादा है, और जान का जोखिम ज़्यादा है। पर मज़दूर बिखरा है, उसकी आवाज़ छोटी है, और उसकी मांग किसी एक बड़ी सूची में नहीं आती।
यह किसी की लापरवाही नहीं, यह ढांचा है
यह जो हो रहा है, यह किसी एक की लापरवाही नहीं है। यह उस सोच का नतीजा है जो श्रमिक के शरीर को संसाधन मानती है, और संसाधन की देखभाल की ज़िम्मेदारी उसके इस्तेमाल करने वाले पर डाल देती है, बिना यह तय किए कि वह देखभाल क्या हो।
ठेकेदार के लिए मज़दूर एक रोज़ का ख़र्च है। अगर वह बीमार हो जाए, तो कल दूसरा मिल जाएगा। एक डिलीवरी ऐप के लिए राइडर एक डेटा बिंदु है, अगर वह छोड़ दे, तो नया जुड़ जाएगा। नगर निगम के लिए फेरीवाला एक “अतिक्रमण” है, जिसे हटाना है, जिसकी छांव की ज़रूरत समझनी नहीं है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह व्यवस्था कमोबेश वैसी ही चली है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस सोच में है जो जान की क़ीमत को भी श्रेणीबद्ध करती है। एक प्रकार की जान की क़ीमत बहुत है, दूसरी की कम। और जब क़ीमत कम होती है, तो उसकी रक्षा की व्यवस्था भी नहीं बनती।
अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक राज्य की पहचान उसकी सबसे कमज़ोर परत की देखभाल से होती है, सबसे ऊपर वाली परत की चमक से नहीं। एक देश जो अपने मज़दूर को सैंतालीस डिग्री में बिना छांव के काम करवाता है, और इसे “विकास” कहता है, उसके विकास की परिभाषा अधूरी है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल क़ानून और बाज़ार दोनों के साथ चलने से आएगा। पर एक नागरिक के तौर पर भी कुछ ठोस बातें हैं।
पहली बात, अपने आसपास के मज़दूरों की मौजूदगी को पहचानिए। अगर आपके घर पर कोई काम चल रहा है, चाहे एक छोटी मरम्मत हो, तो ठंडे पानी की एक बोतल काम करने वाले के लिए रखिए। यह छोटा सा क़दम लगता है, पर हर ऐसी छोटी आदत मिलकर एक सम्मान की संस्कृति बनाती है।
दूसरी बात, अपने नगर निगम से सार्वजनिक ठंडी जगहों की मांग कीजिए। पुस्तकालय, सामुदायिक भवन, बस स्टैंड पर शेड, ये सब बहुत महंगे नहीं होते। बहुत से देशों में “कूलिंग सेंटर” नाम की व्यवस्था है, जहां अत्यधिक गर्मी के दिनों में कोई भी जाकर बैठ सकता है, ठंडा हो सकता है। हमारे यहां यह बहुत कम है, और जहां है, वहां इसकी जानकारी नहीं फैली है। इसकी मांग कीजिए।
तीसरी बात, उन सेवाओं का उपयोग करते हुए जो आप लेते हैं, श्रमिक की स्थिति पर एक छोटा सवाल पूछिए। डिलीवरी ऐप पर एक टिप दीजिए, राइडर से एक मिनट बात कीजिए, उसके ब्रेक की जानकारी पूछिए। यह ख़र्च नहीं है, यह पहचान है। और पहचान धीरे धीरे संगठन बनाती है।
चौथी बात, और यह सबसे ज़रूरी, गर्मी से सुरक्षा का स्पष्ट श्रम क़ानून मांगिए। यह मांग किसी एक नागरिक की नहीं है, यह सामूहिक है। पर हर नागरिक यह सवाल पूछ सकता है कि उसके राज्य में, उसके ज़िले में, अत्यधिक तापमान के दिनों में बाहरी मज़दूरों के लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश है या नहीं, कोई हेल्पलाइन है या नहीं, कोई शिकायत का रास्ता है या नहीं। यह सवाल जिस दिन पर्याप्त लोग पूछेंगे, उस दिन क़ानून बनने की प्रक्रिया शुरू होगी।
अंत में
गर्मी के दो देश आज एक साथ चल रहे हैं। एक देश छांव में बैठा है, थर्मामीटर पर संख्या पढ़ रहा है, और सोच रहा है कि इस बार जलवायु बहुत ख़राब हो रही है। दूसरा देश धूप में खड़ा है, अपने शरीर पर वह संख्या भुगत रहा है, और सोच रहा है कि अगले महीने का राशन कैसे आएगा।
जब तक यह दो देश एक नहीं होंगे, तब तक हम “जलवायु पर बात” का दावा अधूरा करेंगे। क्योंकि जलवायु का असर सब पर पड़ता है, यह सच है, पर सब पर बराबर नहीं पड़ता, यह असली सच है।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने आसपास खुले में काम कर रहे मज़दूर को देखना शुरू कीजिए। उसके पास पानी है या नहीं, उसके पास छांव है या नहीं, उसके पास आराम का अधिकार है या नहीं। यह छोटे से सवाल हैं, पर जिस दिन ये सवाल हर निर्माण स्थल के बाहर, हर डिलीवरी ऐप के अंदर, हर रेहड़ी के पास पूछे जाएंगे, उस दिन गर्मी का दूसरा देश भी पहले देश की बराबरी पर बैठने लगेगा।