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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

पानी का दूसरा देश: जब टंकी ख़ाली होती है, सबकी एक साथ नहीं होती

सुबह के पांच बजे एक बस्ती में एक हैंडपंप के सामने पंक्ति लगी है। पहले नंबर पर एक महिला अपनी बाल्टी रखे खड़ी है। उसके पीछे दस और औरतें, बच्चे, और कुछ बुज़ुर्ग। हैंडपंप एक एक करके पानी देता है, और हर बाल्टी भरने में दस मिनट लगते हैं। दो घंटे की पंक्ति, चार बाल्टी, यानी एक परिवार का पूरे दिन का पानी, क़रीब अस्सी लीटर। उसमें खाना बनाना है, पीना है, धोना है, नहाना है।

ठीक उसी सुबह, उसी शहर के एक दूसरे हिस्से में एक ऊंची इमारत है। उसके नीचे एक भूमिगत जल टंकी है, जिसमें पचास हज़ार लीटर पानी भरा रहता है। हर फ़्लैट के लिए नल बहता है, चौबीस घंटे। पीने के लिए आरओ का पानी अलग। गाड़ी धोने के लिए नियमित आपूर्ति। एक छोटे से बग़ीचे में सिंचाई। एक परिवार रोज़ क़रीब आठ सौ लीटर पानी इस्तेमाल करता है, अक्सर इसका हिसाब भी नहीं रखता।

दोनों एक ही शहर के नागरिक हैं। दोनों के ऊपर एक ही आसमान है, एक ही बारिश, एक ही ज़मीन के नीचे की वही पानी की चादर। पर इन दोनों के लिए “पानी” शब्द दो बहुत अलग चीज़ें हैं। पानी का दूसरा देश इस फ़र्क़ की कहानी है।

जो पानी ज़मीन के नीचे से ग़ायब हो रहा है

यहां एक तथ्य से शुरू कीजिए, जो हम सब के लिए चिंता का है।

देश के लगभग दो तिहाई राज्य अब “जल तनाव” वाली श्रेणी में हैं, यानी जितना पानी ज़मीन से निकाला जा रहा है, उसकी भरपाई बारिश और प्राकृतिक प्रक्रिया से नहीं हो पा रही। नतीजा यह है कि बहुत से इलाक़ों में हर साल पानी की चादर एक से दो मीटर नीचे जा रही है।

इसका मतलब क्या है, यह आगे के दस साल में दिखेगा। आज जहां सौ फ़ुट का बोरवेल है, वहां पंद्रह साल बाद डेढ़ सौ फ़ुट का करना होगा। आज जो हैंडपंप पानी दे रहा है, कुछ साल बाद वह सूख जाएगा। आज जो कुएं हैं, उनके नीचे का पानी हर साल और दूर होता जा रहा है।

यह कोई दूर का ख़तरा नहीं है। देश के कई बड़े जलाशय इस गर्मी पहले ही अपनी क्षमता के बीस तीस प्रतिशत पर हैं, कुछ शून्य पर पहुंच चुके हैं। हर साल यह संख्या और कम होती जा रही है।

पर सबसे चिंताजनक बात संख्या नहीं है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब टंकी ख़ाली होती है, तो वह सबकी एक साथ नहीं होती। पहले उस की होती है, जिसके पास कम है। बाद में उसकी, जिसके पास ज़्यादा है। यह क्रम है, और इसी क्रम में सबसे बड़ी असमानता छुपी है।

जिन तालाबों ने पानी थामा था

यहां एक पुरानी बात कहनी है, जो आज के संदर्भ में ज़रूरी है।

देश में पहले हर गांव, हर मोहल्ले, हर शहर में पारंपरिक जल संरचनाएं होती थीं। तालाब, बावड़ी, कुंड, झील, जोहड़। ये सब बारिश के पानी को थामती थीं, ज़मीन में रिसने देती थीं, और साल भर के लिए एक संचय बनाती थीं। यह कोई पुरानी संस्कृति की बात नहीं है, यह बहुत बुनियादी पारिस्थितिकी थी, जिसमें एक छोटी सी जल इंजीनियरिंग छुपी थी।

पिछले तीस सालों में, इनमें से बहुत सी संरचनाएं ख़त्म हो गई हैं। शहरों में तालाब पाट कर इमारतें बनी, बावड़ी कूड़े से भर गई, कुंड बंद हो गए। गांवों में जोहड़ सूख गए, क्योंकि उन पर ध्यान देने वाला अब कोई नहीं था। आधिकारिक आंकड़ों में कहा जाता है कि देश में लाखों जल संरचनाएं हैं, पर असली परीक्षा यह है कि उनमें से कितनी आज सच में पानी थाम रही हैं। यह संख्या लगातार गिर रही है।

यह कोई नज़दीक की भावनात्मक बात नहीं है, यह सीधी इंजीनियरिंग है। जब बारिश का पानी थामने वाली जगहें ख़त्म होती हैं, तो वह पानी सीधा नालों में, सड़कों पर, और बाद में समुद्र में चला जाता है। ज़मीन के अंदर जाने का उसका रास्ता ख़त्म हो जाता है। फिर जब ज़रूरत पड़ती है, तब हम बोरवेल और ज़्यादा गहरे करते हैं, क्योंकि सतह का बारिश पकड़ने वाला तंत्र हमने ख़ुद तोड़ दिया है।

जब पानी ख़त्म होता है, सबका एक साथ नहीं होता

अब उस क्रम पर आइए जो सबसे महत्वपूर्ण है।

जब किसी शहर में पानी की आपूर्ति घटती है, तो उसका असर सब इलाक़ों पर एक साथ नहीं पड़ता। पाइप का दबाव कम होने पर सबसे पहले उसके दूर वाले छोर सूखते हैं, जो अक्सर बस्तियां होती हैं, परिधि की कॉलोनियां होती हैं, या वो मोहल्ले होते हैं जहां अनधिकृत आपूर्ति है। बीच के इलाक़े, जहां पाइप का दबाव अच्छा है, वहां पानी आख़िर तक आता रहता है। और जिनके पास भूमिगत टंकी है, जनरेटर के साथ पंप है, और ज़रूरत पड़ने पर निजी टैंकर मंगाने के पैसे हैं, उनके लिए कमी का असर सबसे बाद में आता है।

यानी, पानी का संकट जब किसी शहर पर आता है, तो उसका पहला झटका सबसे कमज़ोर तक पहुंचता है। वह झटका अदृश्य रहता है, क्योंकि उस तक मीडिया की पहुंच नहीं होती, और उस संकट को न्यूज़ चैनलों पर कोई नहीं चलाता। बीच के तबक़े तक झटका पहुंचने पर “जल संकट” की ख़बर बनती है। और जब इमारतों के नीचे के टंकियों तक झटका पहुंच जाए, तब “गंभीर संकट” का सरकारी ऐलान आता है।

इसी क्रम में एक पूरा वर्ग छुपा रहता है, जिसकी कहानी कभी अख़बार में नहीं आती। एक प्रवासी मज़दूर जो शहर के बाहरी इलाक़े में रहता है, उसके लिए पानी की एक बूंद का संकट उसी दिन शुरू हो जाता है, जिस दिन शहर की सबसे ऊंची इमारत में नल पहले की तरह बह रहा होता है। यह “एक साथ नहीं होने” का पूरा अनुपात कभी ठीक से समझा नहीं जाता, पर यह सच है।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह व्यवस्था है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। पानी की यह दशा किसी की साज़िश नहीं है।

कोई आदेश नहीं निकला कि बस्तियों को पानी देर से दिया जाए। कोई बैठक नहीं हुई कि तालाबों को पाट दिया जाए। यह हुआ हज़ार छोटे छोटे फ़ैसलों से, हर एक फ़ैसला तर्कसंगत लगता हुआ। एक तालाब के ऊपर एक कॉलोनी बनाना ज़रूरी था क्योंकि शहर बढ़ रहा था। एक बावड़ी को ढक देना सुरक्षित लगा क्योंकि वहां कोई गिर सकता था। एक कुंड पर पार्किंग बनाना तर्कसंगत था क्योंकि गाड़ियां बहुत हो गई थीं। हर एक छोटा फ़ैसला अकेले देखो तो जायज़ था, पर सब मिलाकर एक पूरी पारिस्थितिकी टूट गई।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह कमोबेश यही चलता रहा है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस सोच में है जो पानी को एक सेवा मानती है जो नल से आती है, उसे एक पारिस्थितिकी नहीं मानती जो धरती के पूरे चक्र पर निर्भर है।

प्लेटो ने कहा था कि जो शहर अपने प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल नहीं करता, वह अपने ही अस्तित्व की देखभाल नहीं कर रहा। यह बात पानी पर पूरी तरह लागू होती है। जो नागरिक पानी को सिर्फ़ बिल के काग़ज़ पर देखता है, और कभी उस तालाब को नहीं देखता जिससे वह आ रहा है, वह नागरिक अपने ही भविष्य से कट चुका है।

क्या किया जा सकता है

यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल कई स्तरों पर है। पर एक नागरिक के तौर पर कुछ ठोस बातें हैं।

पहली बात, अपने इलाक़े की पारंपरिक जल संरचनाओं का पता लगाइए। कौन सा तालाब था, कहां था, अब है या नहीं। यह जानकारी पुराने नक़्शों में, बुज़ुर्गों की स्मृति में, और कभी कभी सरकारी रिकॉर्ड में होती है। पता चलने पर, अगर अब भी जगह बची है, तो उसे पुनर्जीवित करने की मांग कीजिए। बहुत से शहरों में नागरिक समूहों ने इस तरह तालाबों को वापस ज़िंदा किया है।

दूसरी बात, वर्षा जल संचयन को सिर्फ़ एक नियम नहीं, एक आदत बनाइए। अगर आपके घर पर यह व्यवस्था नहीं है, तो उसे जोड़िए। अगर आपके अपार्टमेंट में नहीं है, तो उसकी मांग कीजिए। यह छोटी सी बात लगती है, पर एक एक इमारत मिलकर एक पूरे शहर के पानी का गणित बदल सकती है।

तीसरी बात, अपने घर के पानी का हिसाब रखिए। आप रोज़ कितना इस्तेमाल करते हैं, यह जानना ख़ुद एक नागरिक संस्कार है। बहुत से शहरों में अब मीटर है, और कई जगहों पर मीटर भी नहीं है। बिना हिसाब के, बचत संभव नहीं।

चौथी बात, अपने पार्षद, नगर निगम, या ज़िला प्रशासन से यह पूछिए कि आपके इलाक़े में पानी के दबाव और आपूर्ति का सबसे कमज़ोर बिंदु कहां है, और वहां की कमी कब और कैसे पूरी की जाती है। यह सवाल असहज है, और इसीलिए ज़रूरी है। एक नागरिक जो सिर्फ़ अपने नल का पूछता है, और कभी अपने पड़ोसी इलाक़े के नल का नहीं पूछता, वह आधी नागरिकता निभा रहा है।

अंत में

पानी की कमी जब आती है, तो वह एक प्राकृतिक आपदा नहीं होती। वह एक ढांचागत विफलता का चरम क्षण होती है। ज़मीन के नीचे का पानी सालों में ख़त्म होता है, तालाब दशकों में पाटे जाते हैं, और पाइप का दबाव वर्षों की उपेक्षा से कमज़ोर होता है। जब अंत में नल सूखता है, तो वह सिर्फ़ एक दिन का संकट दिखता है, पर असल में वह पच्चीस साल की लापरवाही का जोड़ है।

जो शहर इस लापरवाही को आज ठीक करना शुरू नहीं करेगा, वह दस साल बाद पानी ख़रीदते हुए दूसरे शहर से होगा। और जो दूसरे शहर बेच रहे होंगे, वहां भी एक नौजवान पीढ़ी होगी जो पूछेगी कि यह व्यवस्था कब टूट गई, और हमारे बड़े कहां देख रहे थे।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े के पानी का असली हिसाब पूछना शुरू कीजिए। पिछले महीने आपके मोहल्ले में पानी कितने घंटे आया। आपके पड़ोसी इलाक़े की बस्ती में कितना आया। टैंकर कितने आए, किसके पास से आए, कितना ख़र्च आया। ये सवाल छोटे लगते हैं, पर इन्हीं छोटे सवालों से पानी के दूसरे देश की सच्चाई एक देश के सामने आती है। और जिस दिन यह सच्चाई पर्याप्त लोगों के सामने होगी, उस दिन पानी की राजनीति बदलनी शुरू होगी।

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