एक सड़क है, किसी भी शहर की। दोपहर का समय है। एक आदमी सड़क के किनारे खड़ा है, और उसने अभी एक छोटा सा थूकने वाला काम किया है। उसके पीछे एक दूसरा आदमी खड़ा था, हाथ में मोबाइल। उस दूसरे आदमी ने पूरा दृश्य रिकॉर्ड कर लिया, और उसी रात अपने सोशल मीडिया पर डाल दिया। शीर्षक था, “नागरिक संस्कार कहां गया।”
वीडियो वायरल हो गया। हज़ारों लोगों ने देखा। पहले आदमी का चेहरा एक मीम बन गया, टिप्पणियों में दर्जनों लोगों ने उसे “गंवार” कहा, “देश को बदनाम करने वाला” कहा। कुछ ने उसकी जाति का अनुमान लगाया, कुछ ने उसके राज्य का। एक छोटी सी कार्रवाई पर एक बड़ा सा नैतिक तूफ़ान आ गया।
अब उसी सड़क पर एक छोटा सा सर्वेक्षण करना मुश्किल नहीं है। उस आदमी के दो सौ मीटर के दायरे में कोई कूड़ेदान नहीं है। उसके आधा किलोमीटर के दायरे में कोई सार्वजनिक शौचालय नहीं है। उसके सामने वाला नाला तीन हफ़्तों से उफनकर बह रहा है। इस सड़क पर कूड़ा उठाने वाली नगर निगम की गाड़ी पिछले ग्यारह दिनों से नहीं आई है।
वीडियो को पचास हज़ार बार देखा गया है। नाला, खाली कूड़ेदान, और ग़ायब गाड़ी, ये तीनों वायरल नहीं हैं। यह असमानता ही इस लेख का विषय है।
“नागरिक संस्कार” का असली अर्थ क्या था
पहले शब्द को ठीक से समझिए, क्योंकि सोशल मीडिया पर उसका इस्तेमाल बहुत हल्के में होता है।
“नागरिक संस्कार” का मतलब सिर्फ़ व्यक्तिगत साफ़ सफ़ाई नहीं है। उसका मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि कोई नहीं थूकेगा, कोई नहीं फेंकेगा, कोई नहीं गंदा करेगा। उसका असली मतलब है, साझा संसाधनों की साझा देखभाल। यह “साझा” शब्द दोनों तरफ़ है। एक तरफ़ नागरिक की देखभाल, दूसरी तरफ़ व्यवस्था की देखभाल।
एक तरफ़ की देखभाल बिना दूसरी तरफ़ की देखभाल के अधूरी है। एक नागरिक से यह उम्मीद करना कि वह कूड़ा फेंकेगा नहीं, समझ में आती है। पर उसी नागरिक से जब पूछा जाए कि कूड़ा कहां फेंके, तो जवाब होना चाहिए। एक नागरिक से यह कहना कि सड़क पर शौच न करे, समझ में आता है। पर उसी नागरिक के पास सार्वजनिक शौचालय कितने हैं, कितने खुले हैं, कितने इस्तेमाल लायक़ हैं, यह सवाल साथ में है।
जब हम सिर्फ़ नागरिक के व्यवहार पर बहस करते हैं, और व्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर नहीं, तो हम “नागरिक संस्कार” को आधा कर देते हैं। बल्कि कह सकते हैं, हम उसे एक तमाशा बना देते हैं, जिसमें कमज़ोर पर ज़्यादा बोझ है, और ताक़तवर पर ज़िम्मेदारी नहीं।
जब व्यवस्था नहीं हो, तो व्यक्ति को क्यों दोष
अब उस आदमी के बारे में सोचिए जो वीडियो में थूक रहा था।
पान खाने वाले को पान निगलना नहीं है, यह सबको पता है। पान खाने के बाद थूकना चाहिए। पर थूकने की एक उचित जगह कहां है। एक आदर्श व्यवस्था में, हर दो सौ मीटर पर एक कूड़ेदान होगा, हर पांच सौ मीटर पर एक छोटी सी पिच होगी जिसमें थूका जा सके, हर मोहल्ले में एक सार्वजनिक शौचालय होगा। हमारे यहां इनमें से ज़्यादातर चीज़ें नहीं हैं, या बहुत कम हैं। ऐसी स्थिति में थूकने का काम, या कहीं भी पेशाब का काम, असुविधाजनक हो जाता है, पर पूरी तरह असंभव नहीं हो जाता।
यह उदाहरण छोटा है, पर इसके पीछे एक बड़ा सच है। मानव शरीर की कुछ ज़रूरतें होती हैं। थूकना, पेशाब करना, कूड़ा फेंकना, ये सब अपने आप होंगे। अगर व्यवस्था इनके लिए जगह नहीं देगी, तो ये सड़क पर होंगे। और फिर हम सड़क पर हुए इन कामों पर वीडियो बना सकते हैं, टिप्पणियां कर सकते हैं, और ख़ुद को “जागरूक नागरिक” कह सकते हैं। पर इस पूरे तमाशे में जो काम हम नहीं कर रहे, वह है व्यवस्था से बुनियादी ढांचा मांगना।
यह विश्लेषण किसी के व्यवहार को सही नहीं ठहराता। पान फिर भी संयम से खाया जा सकता है, थूकने में सावधानी रखी जा सकती है, कूड़ा अपने पास रखकर बाद में फेंका जा सकता है। यह सब सच है। पर यह भी सच है कि अगर बुनियादी ढांचा नहीं होगा, तो इन सब बातों के बावजूद, बहुत सारा गंदापन सड़क पर रहेगा।
वायरल वीडियो की राजनीति
अब उस वीडियो वाले की बारी।
यह छोटी सी बात देखिए, और ध्यान दीजिए। नागरिक संस्कार के नाम पर वायरल होने वाले अधिकांश वीडियो में कौन है? ज़्यादातर मामलों में, ये वीडियो उन लोगों के हैं जो मेहनतकश हैं, मज़दूर हैं, ग़रीब हैं, या कम पढ़े लिखे लगते हैं। यह अनायास नहीं है।
अमीरों की गंदगी अलग रूप में होती है। उनकी गाड़ी से प्लास्टिक बैग सड़क पर फेंका जाता है, पर वह वीडियो नहीं बनता क्योंकि गाड़ी के अंदर का दृश्य नहीं दिखता। उनकी इमारत से ख़राब पानी सीधे नाले में बहता है, पर वह भी वीडियो नहीं बनता क्योंकि यह “व्यवस्था” का हिस्सा माना जाता है। उनकी पार्टी से कूड़ा सुबह सुबह सफ़ाई कर्मचारी समेटता है, पर रात की वह गंदगी कोई रिकॉर्ड नहीं करता।
वीडियो की कैमरा हमेशा वहीं ज़्यादा जाती है, जहां कमज़ोर है, जहां जवाब नहीं देगा, जहां शर्म महसूस कर सकता है। यह कोई सोची समझी साज़िश नहीं है, यह उस मानसिकता का स्वाभाविक नतीजा है जो ग़रीब को “गंदा” मानती है और अमीर को “व्यस्त”।
इस सब का असर एक तरफ़ शर्मिंदगी का है, और दूसरी तरफ़ चुप्पी का। शर्मिंदा होता है वह जो कैमरे के सामने आया। चुप रहती है वह व्यवस्था जो असली ज़िम्मेदार है।
यह किसी एक की बेईमानी नहीं, यह सोच है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। वीडियो बनाने वाला कोई बुरा इंसान नहीं है। वह अपने हिसाब से सही काम कर रहा है। उसे लगता है कि वह अपने देश को बेहतर बना रहा है।
पर एक मासूम इरादा एक संरचनात्मक ग़लती का सहारा बन सकता है। यह वही ग़लती है जो हर बार होती है जब हम जटिल समस्या को व्यक्ति की कमज़ोरी पर डाल देते हैं। नागरिक संस्कार की बहस अगर सिर्फ़ “कौन गंदा है” तक रही, तो वह एक नैतिक तमाशा बनेगी, संरचनात्मक सुधार नहीं। और जो सोच इस तमाशे को मज़बूत करती है, वह व्यवस्था के लिए सबसे सुविधाजनक है, क्योंकि जब नागरिक एक दूसरे को घूर रहे हैं, तो किसी का ध्यान उस मेज़ पर नहीं जाता जहां असली निर्णय होते हैं।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह सोच चलती आई है, क्योंकि यह सोच राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है। नागरिक एक दूसरे पर अंगुली उठाएगा, और व्यवस्था अपनी ज़िम्मेदारी से बच जाएगी। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस आदत में है जो सोचने की मेहनत को टालकर शर्मिंदा करने का छोटा रास्ता चुनती है।
अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक नागरिक की सच्ची पहचान उसकी निजी नैतिकता में नहीं, बल्कि उसकी सार्वजनिक भागीदारी में होती है। मतलब, सिर्फ़ ख़ुद साफ़ रहना नागरिक संस्कार नहीं है, अपने पड़ोस की सफ़ाई के लिए व्यवस्था से मांग करना भी नागरिक संस्कार है। हम पहले वाले की बहुत बात करते हैं, और दूसरे वाले की लगभग नहीं।
क्या किया जा सकता है
यह छोटी सी सोच है, पर इसका असर बड़ा हो सकता है, अगर इसे अमल में लाया जाए।
पहली बात, अगली बार जब कोई “नागरिक संस्कार” वाला वीडियो आपके सामने आए, तो उसे साझा करने से पहले एक छोटा सा सवाल पूछिए। वह जगह जहां यह हुआ, वहां कूड़ेदान था? सार्वजनिक शौचालय था? सफ़ाई की गाड़ी आती थी? अगर इन सवालों के जवाब “नहीं” हैं, तो वह वीडियो आधी कहानी है। पूरी कहानी के लिए वह सवाल साथ में होना चाहिए।
दूसरी बात, अपने इलाक़े का एक छोटा सा सर्वेक्षण ख़ुद कीजिए। आपके घर से पांच सौ मीटर के दायरे में कितने कूड़ेदान हैं, कितने सार्वजनिक शौचालय, कितने नल। यह संख्या लिखिए। और अगर बहुत कम है, तो अपने पार्षद से, नगर निगम से, यह सवाल पूछिए। यह सवाल लंबे समय तक चलाइए, क्योंकि इसका जवाब एक रात में नहीं आएगा।
तीसरी बात, अगर आप किसी सोसाइटी में रहते हैं, तो अपनी सोसाइटी के बाहर के बुनियादी ढांचे पर ध्यान दीजिए, सिर्फ़ अंदर के नहीं। आपकी सोसाइटी के बाहर वाली सड़क पर सफ़ाई कैसे होती है, कूड़ा कहां जाता है, उस सड़क पर पैदल चलने वाले रहवासी और मज़दूर कहां अपनी प्राकृतिक ज़रूरतें पूरी करते हैं, यह जानना और इस पर ध्यान देना नागरिक संस्कार का हिस्सा है।
चौथी बात, अपने इलाक़े की सफ़ाई कर्मचारियों को पहचानिए, उनसे बात कीजिए। वे अक्सर सबसे पहले जानते हैं कि व्यवस्था कहां टूटी है, कौन सी गाड़ी क्यों नहीं आ रही, कौन सी सफ़ाई का बजट कहां जा रहा है। यह जानकारी सीधी होती है, और हमारी आधी “नागरिक संस्कार” की बहस इसी जानकारी की कमी से चलती है।
अंत में
एक देश जिसमें कूड़ेदान कम हों और कैमरे ज़्यादा, वह देश सच में नागरिक नहीं बना सकता। क्योंकि नागरिकता पहले व्यवस्था पर बनती है, और फिर व्यवहार पर। बिना पहले के, दूसरा अधूरा है।
जो लोग वीडियो बनाते हैं, उनकी नीयत अच्छी है। पर जो प्रभाव बनता है, वह आधा है। पूरा प्रभाव तब बनेगा जब हम कैमरा एक बार उस नगर निगम के दफ़्तर पर भी ले जाएंगे, उस ठेकेदार के पास भी, और उस अधिकारी से भी पूछेंगे कि सफ़ाई की गाड़ी पिछले ग्यारह दिनों से क्यों नहीं आई।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े के कूड़ेदान गिनना शुरू कीजिए। पांच सौ मीटर में कितने हैं। एक किलोमीटर में कितने सार्वजनिक शौचालय हैं। पिछले महीने सफ़ाई की गाड़ी कितने दिन आई। यह छोटा सा हिसाब है, पर इस हिसाब के बिना नागरिक संस्कार सिर्फ़ शोर है, संस्कार नहीं।