एक बेटी है, उम्र तेईस। तीन साल पहले उसने अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की थी, अच्छे अंकों के साथ। पिछले तीन साल वह घर पर है। काम तलाश रही है, या यह कहना ज़्यादा ठीक है, काम का इंतज़ार कर रही है।
घर वाले विरोध नहीं करते। वे कहते हैं, अगर अच्छा काम मिले, तो ज़रूर करना। पर “अच्छा काम” की उनकी परिभाषा बहुत संकरी है। घर के पास हो, सुरक्षित जगह हो, सम्मानजनक वेतन हो, ठीक समय पर लौटाए। उसके शहर में जो काम मिल रहा है, वह इस परिभाषा में अक्सर नहीं आता। फ़ैक्ट्री दूर है, बस की व्यवस्था अधूरी है। दुकान का काम है, पर वेतन छह हज़ार महीना है, और शिफ़्ट बारह घंटे है। बैंक की परीक्षा है, पर उसकी तैयारी में दो साल और लगेंगे। सरकारी नौकरी की तैयारी है, पर उसके पीछे भी कोई गारंटी नहीं।
इस बीच में, वह न पढ़ रही है, न नौकरी कर रही है, न किसी स्पष्ट रास्ते पर है। आंकड़ों की भाषा में, वह “बेरोज़गार” है। पर उसकी कहानी सिर्फ़ बेरोज़गार होने की नहीं है, यह एक पूरी परत की कहानी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।
दो आंकड़े, और एक छुपा हुआ सच
हाल के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में युवा बेरोज़गारी की दर बढ़ रही है। पंद्रह से उनतीस साल की उम्र के बीच, यह दर अब लगभग पंद्रह प्रतिशत है, यानी हर सौ में पंद्रह नौजवान न पढ़ रहे, न काम कर रहे, और सक्रिय रूप से काम तलाश रहे हैं।
पर एक दूसरा आंकड़ा है, जो इस आंकड़े के भीतर छुपा है, और जिस पर शायद ही ध्यान जाता है। इस उम्र की लड़कियों की बेरोज़गारी दर अट्ठारह प्रतिशत के आसपास है। मतलब, लड़कों की तुलना में लगभग तीन से चार प्रतिशत अंक ज़्यादा। यह कोई छोटा फ़र्क़ नहीं है। यह एक देश के स्तर पर लाखों लड़कियों का अंतर है।
यह आंकड़ा सरकारी रिपोर्ट में है, पर अख़बार में कम आता है, और टीवी पर लगभग नहीं आता। जब बेरोज़गारी की बात होती है, तो “नौजवान” कहा जाता है, मानो लड़का और लड़की एक ही स्थिति में हों। वे नहीं हैं। उनके सामने अवसर, चुनौतियां, और परिवार के दबाव अलग हैं, और इन तीनों ने मिलकर एक पूरी पीढ़ी की लड़कियों को एक ऐसे कोने में डाल दिया है जहां से निकलने के रास्ते बहुत संकरे हैं।
क्यों लड़कियों के लिए ज़्यादा कठिन है
यह सवाल पूछना ज़रूरी है, क्योंकि इसका जवाब सिर्फ़ “घर वाले अनुमति नहीं देते” से कहीं ज़्यादा गहरा है।
पहली बात, यात्रा का प्रश्न। अधिकांश नई फ़ैक्ट्रियां, गोदाम, और कार्यालय शहर के बाहरी हिस्सों में हैं, क्योंकि वहां ज़मीन सस्ती है। वहां तक पहुंचने के लिए बस या मेट्रो हो भी तो उसकी अंतिम मील ख़तरनाक होती है। एक अकेली लड़की के लिए शाम छह बजे के बाद उस अंतिम मील को पार करना सुरक्षित नहीं माना जाता, और इसी कारण से बहुत से अवसर उसके लिए बंद हो जाते हैं। यह उसकी क्षमता का सवाल नहीं है, यह शहर के डिज़ाइन का सवाल है।
दूसरी बात, बीच के काम का अभाव। हमारे यहां जो नौकरियां हैं, उनमें दो ध्रुव हैं। एक तरफ़ बहुत मेहनती फ़ैक्ट्री या दुकान का काम, जो बारह घंटे की शिफ़्ट और कम वेतन वाला होता है। दूसरी तरफ़ बहुत प्रतिष्ठित कार्यालय का काम, जो बड़ी डिग्री और कई सालों की तैयारी मांगता है। बीच का काम, यानी छह से सात घंटे का, स्थानीय, सम्मानजनक वेतन वाला, यह वर्ग बहुत कम है। और यही वह वर्ग है जो एक मध्यवर्गीय लड़की के परिवार को स्वीकार्य हो सकता था। उसका न होना खुद एक संरचनात्मक छेद है।
तीसरी बात, शादी का समयचक्र। एक लड़की पर बीस से छब्बीस की उम्र में शादी का दबाव हमारे यहां औसतन ज़्यादा है। इसी उम्र में उसकी पढ़ाई पूरी होती है, और इसी उम्र में करियर की पहली नींव पड़नी होती है। पर इस उम्र में परिवार उसे एक स्थायी नौकरी में लगाने से ज़्यादा शादी की तैयारी पर ध्यान देता है, क्योंकि “शादी हो जाएगी तो काम बाद में देख लेंगे” वाली सोच गहरी है। शादी के बाद नया घर, नया शहर, नई परिस्थितियां, और करियर अक्सर दूसरे नंबर पर आ जाता है। यह सब किसी एक की चूक नहीं है, यह एक पूरी सामाजिक संरचना है।
चौथी बात, “प्रशिक्षण” का धोखा। आज बहुत सी सरकारी और निजी योजनाएं हैं जो “लड़कियों के लिए कौशल प्रशिक्षण” का दावा करती हैं। उनमें सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर, या कंप्यूटर की मूल जानकारी सिखाई जाती है। इनमें से अधिकांश से असली नौकरी नहीं मिलती, क्योंकि बाज़ार में इन कौशलों की मांग या तो बहुत कम है, या उन कौशलों का स्तर बाज़ार के स्तर से बहुत नीचे है। प्रशिक्षण मिलना और रोज़गार मिलना, ये दो अलग बातें हैं, और इन्हें मिलाकर देखना एक धोखा है जो लाखों लड़कियों के साथ हुआ है।
ग्रामीण में जो उल्टा हो रहा है
युवा बेरोज़गारी की कहानी सिर्फ़ शहर की नहीं है, गांव की भी है, और गांव में स्थिति शायद और चिंताजनक है।
हाल के आंकड़ों में एक छुपा हुआ संकेत है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार बढ़ रहा है, यह दिखता है। पर जब गहराई से देखो, तो यह बढ़ोतरी पूरी की पूरी कृषि क्षेत्र में हो रही है। गांव में युवा वर्ग जो शहरों की तरफ़ काम के लिए गया था, वह अब वापस लौट रहा है, और खेत में अपने पिता के साथ काम करने लगा है। यह रोज़गार है, पर यह उस तरह का रोज़गार है जो आर्थिक भाषा में “कम उत्पादकता” का होता है।
मतलब, गांव की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ रही, वह वापस मुड़ रही है। और इस वापसी का असर लड़कियों पर सबसे ज़्यादा है। क्योंकि जब रोज़गार सिमट कर सिर्फ़ कृषि और स्थानीय परिवार तक रह जाए, तो लड़की की भागीदारी, जो शहर में थोड़ी सी संभव हो रही थी, वह भी कम हो जाती है।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह संरचनात्मक छेद है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। यह जो हो रहा है, यह किसी एक की लापरवाही नहीं है।
कोई बैठक नहीं हुई कि लड़कियों को नौकरी से बाहर रखा जाए। बहुत सी सरकारों ने महिला रोज़गार बढ़ाने की योजनाएं चलाई हैं, पैसा लगाया है, घोषणाएं की हैं। फिर भी आंकड़ा नीचे नहीं जा रहा, और जा रहा है तो लड़कों के लिए, लड़कियों के लिए नहीं। समस्या योजना की कमी नहीं है, समस्या उन परिस्थितियों की कमी है जिनके बिना योजना अधूरी रहती है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। यह हमारी पूरी अर्थव्यवस्था और समाज की बनावट का प्रश्न है। समस्या नीयत में नहीं है, समस्या उस सोच में है जो “महिला रोज़गार” को एक अलग योजना मानती है, मुख्य आर्थिक नीति का हिस्सा नहीं।
प्लेटो ने कहा था कि एक राज्य अपनी आधी आबादी की क्षमता का अगर इस्तेमाल न करे, तो उसकी कुल क्षमता आधी ही रहती है। यह बात बहुत पहले की है, पर आज पहले से ज़्यादा सच है। एक देश जो अपनी लड़कियों को घर पर बैठाए रखे, सिर्फ़ इसलिए कि शहर के डिज़ाइन में सुरक्षित यात्रा नहीं है, सम्मानजनक बीच का काम नहीं है, या परिवार की प्राथमिकता का संतुलन ठीक नहीं है, वह देश अपनी क्षमता का आधा ही जी रहा है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल सरकार, समाज, और परिवार तीनों के बदलने से आएगा। पर कुछ ठोस बातें हैं जो हर परिवार और हर नागरिक कर सकता है।
पहली बात, अपने परिवार में। अगर आपके घर में कोई लड़की है जो काम तलाश रही है, तो उसके काम के सवाल को उसी गंभीरता से लीजिए जिस गंभीरता से एक बेटे की कोचिंग को लिया जाता है। उसके लिए सुरक्षित यात्रा का इंतज़ाम कीजिए, उसके लिए वेतन की तय अपेक्षाएं बनाइए, उसके लिए शादी की उम्र को करियर के साथ संतुलित कीजिए। यह छोटी सी बात लगती है, पर एक परिवार में यह छोटी सी सोच बदले, तो लाखों परिवारों में बदलाव शुरू होता है।
दूसरी बात, बुनियादी ढांचे की मांग कीजिए। महिला रोज़गार के लिए “कौशल प्रशिक्षण” नहीं, बल्कि सुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल के पास सस्ती दिनभर की देखभाल, और कार्यस्थल पर मूल क़ानूनी सुरक्षा, ये तीन चीज़ें सबसे ज़रूरी हैं। ये कौशल से कहीं ज़्यादा अहम हैं, क्योंकि कौशल हो भी, और ये तीन न हों, तो रोज़गार नहीं चलेगा।
तीसरी बात, अपने ज़िले का आंकड़ा मांगिए। आपके ज़िले में पंद्रह से उनतीस साल की लड़कियों की रोज़गार दर क्या है, यह सूचना सार्वजनिक है, या होनी चाहिए। पूछिए। यह सवाल जिस दिन हर ज़िले के स्तर पर पूछा जाने लगेगा, उस दिन यह आंकड़ा सिर्फ़ रिपोर्ट का हिस्सा नहीं, राजनीतिक प्राथमिकता बनेगा।
चौथी बात, यदि आप नियोक्ता हैं या निर्णायक स्थिति में हैं। यह सोचिए कि आपके यहां की नौकरियां एक लड़की के लिए वास्तव में सुलभ हैं या नहीं। शाम छह बजे की शिफ़्ट है तो सुरक्षित घर पहुंचाने का बंदोबस्त है या नहीं। एक हफ़्ते की छुट्टी मांगी तो “वैसे ही चली जाएगी” वाली नज़र है या नहीं। ये छोटे छोटे फ़ैसले आपके हाथ में हैं, और हर एक का असर एक नौजवान महिला के पूरे करियर पर पड़ सकता है।
अंत में
बेरोज़गारी के आंकड़े में कई कहानियां छुपी होती हैं। पर एक कहानी जो सबसे चुपचाप वाली है, वह उन लाखों लड़कियों की है जो काम चाहती हैं, पर पा नहीं रहीं। उनकी असफलता नहीं है, यह बात समझना ज़रूरी है। उनके सामने वह संरचना नहीं है जो उनके भाइयों के सामने भी अधूरी है, पर बहनों के सामने और अधूरी है।
एक पीढ़ी जो स्कूल पास कर चुकी है, कॉलेज पास कर चुकी है, पर काम पर नहीं पहुंच पा रही, उसका अनुभव सिर्फ़ आर्थिक नुक़सान नहीं है, यह आत्मविश्वास का धीमा क्षरण भी है। पंद्रह से उनतीस की उम्र वह समय है जब इंसान दुनिया में अपनी जगह बनाता है। उसी समय अगर वह घर पर बैठा रहे, तो जो खो जाता है, उसकी क़ीमत बहुत बड़ी होती है, चाहे वह किसी आंकड़े में दिखे या नहीं।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने आसपास की उन लड़कियों का काम पूछना शुरू कीजिए जो अब घर पर हैं। तीन साल पहले उनकी पढ़ाई पूरी हुई थी, आज वे क्या कर रही हैं, और क्यों। यह सवाल असहज है, और इसीलिए ज़रूरी है। इस सवाल का जवाब ही उस संरचना का असली नक़्शा है जिसे बदलने की ज़रूरत है।