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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

गांव में कृषि की वापसी: जब विकास उल्टा चलता है

एक गांव है, देश के किसी एक हिस्से में। पंद्रह साल पहले इस गांव से जवान लड़के निकले थे। कोई शहर में फ़ैक्ट्री में लगा, कोई सिक्योरिटी गार्ड बना, कोई बड़े मॉल में बिजली मरम्मत का काम सीख गया, कोई डिलीवरी का काम करने लगा। हर महीने थोड़ा थोड़ा पैसा गांव लौटता था। गांव के घर पक्के हुए, बच्चों की पढ़ाई थोड़ी बेहतर हुई, खेत के बग़ल में एक छोटी सी दुकान खुली। यह सब एक धीमी, ठोस तरक़्क़ी थी।

पिछले कुछ साल से उल्टा हो रहा है। शहर में फ़ैक्ट्री का काम कम हुआ है, गाड़ी देने वाली कंपनी ने राइडर की संख्या घटा दी है, मॉल का बिजली मरम्मत वाला अब महीने भर का काम महीने में दस दिन पाता है। एक एक करके वे लड़के गांव लौट रहे हैं। उनके पास उतनी बचत नहीं है कि कुछ नया शुरू करें, उतनी डिग्री नहीं है कि कहीं और बड़े पद पर लग जाएं। इसलिए वे वही करते हैं जो उनके पिता करते थे, खेत संभालते हैं।

आधिकारिक आंकड़े देखें, तो इस गांव में “रोज़गार” बढ़ गया है। पहले एक आदमी खेत में था, अब दो हैं। कागज़ पर यह वृद्धि है। पर असल में यह एक चुपचाप वाली वापसी है। और देश के बहुत से गांवों में यही हो रहा है। यही इस लेख का विषय है।

जो आंकड़े बताते हैं

हाल के सरकारी आंकड़ों में एक चीज़ साफ़ है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि का हिस्सा कुल रोज़गार में बढ़ रहा है। मतलब, गांव में जो लोग काम कर रहे हैं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा अब फिर से खेत में लौट गया है। यह बढ़ोतरी इतनी छोटी नहीं है कि नज़र में न आए। यह आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, और देश के कुल आर्थिक चित्र पर इसका असर है।

समानांतर में, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोज़गार भी बढ़ रहा है। पर “स्वरोज़गार” शब्द एक नक़ली राहत देता है। यह जब बढ़ता है क्योंकि लोग ख़ुद के व्यवसाय में नए अवसर देख रहे हैं, तब वह असली स्वरोज़गार है। पर जब यह बढ़ता है क्योंकि नियमित नौकरी मिल नहीं रही, और लोग किसी न किसी छोटी सी गतिविधि को “अपना धंधा” कह रहे हैं, तब यह स्वरोज़गार नहीं है, यह छुपी हुई बेरोज़गारी है।

जब इन दोनों आंकड़ों को साथ मिलाकर देखो, ग्रामीण रोज़गार बढ़ा है, पर बढ़ा है अधिकांश रूप से कम उत्पादकता वाले क्षेत्र में, तब असली तस्वीर साफ़ होती है। यह बढ़ोतरी आर्थिक प्रगति का संकेत नहीं है, यह संकट का छुपा हुआ रूप है।

विकास का असली पैमाना

यहां एक बुनियादी आर्थिक बात समझ लेनी ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना यह विश्लेषण अधूरा है।

किसी भी देश का आर्थिक विकास एक तय रास्ते से चलता है। जब देश शुरू होता है, तो उसकी अधिकांश आबादी कृषि में होती है। फिर धीरे धीरे आबादी कृषि से निकलकर निर्माण, उद्योग, और सेवाओं की तरफ़ जाती है। इस यात्रा में दो चीज़ें होती हैं। पहली, इन नए क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति उत्पादकता ज़्यादा होती है, इसलिए कुल अर्थव्यवस्था बढ़ती है। दूसरी, कृषि में जो लोग रह जाते हैं, उनके पास ज़्यादा ज़मीन और बेहतर साधन होते हैं, इसलिए उनकी आय भी बढ़ती है।

यह यात्रा एक तरफ़ की होती है। अगर यह यात्रा उल्टी होने लगे, यानी अगर लोग वापस कृषि में लौटने लगें, तो दोनों चीज़ें उल्टी होती हैं। उत्पादकता गिरती है, और एक खेत पर ज़्यादा लोगों का दबाव बनता है, जिससे प्रति व्यक्ति आय भी गिरती है। यह आर्थिक भाषा में “विउद्योगीकरण” का संकेत है, और यह विकास का उल्टा है।

हमारे यहां जो हो रहा है, वह अभी पूरा विउद्योगीकरण नहीं है, यह बात स्पष्ट रहे। हमारे उद्योग और सेवाएं अभी भी कुल अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हैं। पर एक चेतावनी संकेत ज़रूर है, और यह संकेत हम सब को पढ़ना चाहिए।

क्यों यह उल्टा हो रहा है

इसके कारण कई हैं, और सब आपस में जुड़े हैं।

पहला, विनिर्माण की धीमी रफ़्तार। हमारे यहां छोटे और मध्यम उद्योगों की पिछले कुछ सालों से कठिन स्थिति है। कोरोना का असर अभी पूरी तरह से उतरा नहीं है, वैश्विक मांग की अनिश्चितता बढ़ी है, और कई पुराने औद्योगिक केंद्रों में नए निवेश रुके हैं। नतीजा यह है कि नई फ़ैक्ट्रियों में जो रोज़गार पैदा होना चाहिए था, वह नहीं हो रहा। और जो लोग पहले से वहां थे, उनकी संख्या कम हो रही है।

दूसरा, सेवाओं की चुप हो गई हायरिंग। सूचना तकनीक, बैंकिंग, और दूसरी कार्यालयीन सेवाओं में हायरिंग की रफ़्तार पिछले दो सालों में धीमी हुई है। यह बड़ा क्षेत्र है, और इसमें जो धीमापन आता है, उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। शहरी मध्यवर्गीय नौकरियां जो पहले गांव से आए नौजवानों के लिए एक उम्मीद थीं, वह उम्मीद कम हुई है।

तीसरा, अनौपचारिक क्षेत्र की कमज़ोरी। एक बड़ा हिस्सा हमारे यहां सिक्योरिटी गार्ड, डिलीवरी, कूरियर, सेल्स बॉय, और इस तरह के कामों में लगा है। ये अनौपचारिक काम हैं, कम सुरक्षा वाले हैं, पर बहुत लोगों को रोज़गार देते हैं। पिछले कुछ सालों में इन कामों में भी मांग कम हुई है, ख़ासकर बड़े शहरों के बाहरी हिस्सों में।

चौथा, छोटे शहरों की कमज़ोर अर्थव्यवस्था। एक नौजवान अगर अपने गांव से निकलकर तीन सौ किलोमीटर दूर के बड़े शहर में जाता है, तो वह बहुत बड़ा छलांग है। उसके बजाय अगर वह पास के छोटे शहर में, ज़िला मुख्यालय में, या उसी पट्टी के क़स्बे में काम पा सकता, तो छलांग छोटी होती, सहारा ज़्यादा होता, और वापसी की नौबत कम आती। पर हमारे यहां छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ दशकों में कमज़ोर हुई है, क्योंकि निवेश के अधिकांश पैसे बड़े शहरों में चले गए। यह असमानता अब वापसी के रूप में सामने आ रही है।

यह किसी एक की कमी नहीं, यह वैश्विक झुकाव और स्थानीय कमज़ोरी है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। यह जो उल्टा हो रहा है, यह किसी एक सरकार, एक नीति, या एक उद्योग की चूक नहीं है।

वैश्विक स्तर पर पिछले कुछ सालों में विनिर्माण और सेवाओं दोनों में मंदी रही है। हमारी अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया से जुड़ी है, इसलिए इसका असर हम पर भी पड़ा। स्थानीय स्तर पर, हमारे यहां छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए माहौल मज़बूत नहीं रहा। ये दोनों चीज़ें मिलकर वह स्थिति बना रही हैं जिसमें लोग गांव लौट रहे हैं।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। पिछले बीस सालों में कई सरकारें आईं, कई नीतियां चलीं, और सबने अपने तरीक़े से कोशिश की। पर बुनियादी ढांचा जो लाखों गांवों को छोटे शहरों से, और छोटे शहरों को बड़े उद्योगों से जोड़ता, वह पूरा खड़ा नहीं हुआ। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस प्राथमिकता में है जो ज़मीनी आर्थिक ढांचे से ज़्यादा बड़े आंकड़ों पर ध्यान देती है।

अरस्तू ने कहा था कि एक स्वस्थ राज्य अपनी जनसंख्या को धीरे धीरे ऊपर की तरफ़ ले जाता है, यानी कम उत्पादकता वाले कामों से ज़्यादा उत्पादकता वाले कामों में। अगर यह यात्रा रुक जाए, या उल्टी हो जाए, तो यह संकेत है कि कुछ बुनियादी बात ठीक नहीं है।

क्या किया जा सकता है

यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल नीतियों, उद्योगों, और निवेश से आएगा। पर एक नागरिक के तौर पर कुछ ठोस बातें हैं।

पहली बात, असली आंकड़ा जानिए। आपके ज़िले में, आपके राज्य में, पिछले पांच साल में कितने लोग गांव से शहर गए, और कितने वापस लौटे, यह आंकड़ा सार्वजनिक है, या होना चाहिए। पूछिए। यह सवाल ज़रूरी है, क्योंकि बिना इस के, “हमारे यहां विकास हो रहा है” का दावा हमेशा अधूरा रहेगा।

दूसरी बात, छोटे शहरों के विकास की मांग कीजिए, बड़े शहरों के नहीं। एक नौजवान को तीन सौ किलोमीटर दूर बड़े शहर जाने पर मजबूर करने के बजाय, उसे तीस किलोमीटर दूर ज़िला मुख्यालय में सम्मानजनक काम मिल जाए, यह असली विकास होगा। यह सोच नीति की भाषा में अभी पीछे है, पर इसकी मांग नागरिकों से उठनी चाहिए।

तीसरी बात, अगर आपके पास निवेश की क्षमता है, तो छोटे शहरों और क़स्बों के व्यवसायों पर ध्यान दीजिए। बड़ी कंपनी के शेयर ख़रीदना आसान है, पर स्थानीय छोटे उद्यम में निवेश ज़मीन पर असर डालता है। यह सब के लिए संभव नहीं, पर जिनके लिए संभव है, उनके लिए यह एक नागरिक कर्तव्य भी है, और एक समझदार आर्थिक फ़ैसला भी।

चौथी बात, गांव लौटे नौजवानों को मत हंसाइए। उन्हें “हार कर लौटा” मत कहिए। उन्होंने कोशिश की, बाज़ार ने उन्हें वापस भेजा, और यह बाज़ार के बारे में बात कह रहा है, उनके बारे में नहीं। उनसे बात कीजिए कि उन्होंने क्या सीखा, क्या नहीं सीखा, और अब अगर गांव में ही कुछ करना हो, तो क्या संभव है। यह छोटा सा सम्मान बहुत बड़ा होता है, और कई बार इसी सम्मान से नए स्थानीय उद्यम जन्म लेते हैं।

अंत में

विकास की कहानी आगे की होनी चाहिए। जब वह पीछे की हो जाए, तो वह विकास नहीं है, वह उल्टी कहानी है। आज देश के बहुत से गांवों में यह उल्टी कहानी चुपचाप चल रही है, और हमारे आंकड़ों की भाषा इसे “रोज़गार में वृद्धि” कहकर छुपा देती है।

जो नौजवान आज खेत पर लौटा है, उसे आज शायद यह न दिखे कि वह एक बड़े संरचनात्मक संकेत का हिस्सा है। पर पच्चीस साल बाद जब वह अपने बच्चे को सलाह देगा, उसकी सलाह उस अनुभव से बनेगी जो उसने इस वापसी में सीखा। और एक पूरी पीढ़ी के पीछे लौटने का असर अगली पीढ़ी के सपनों पर पड़ता है।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े का असली रोज़गार आंकड़ा पूछना शुरू कीजिए। कितने लोग पिछले साल आए, कितने गए। कितने लोगों ने नौकरी छोड़ी, कितनों ने पाई। यह छोटे से सवाल हैं, पर इन्हीं से एक देश की आर्थिकी की असली दिशा पता चलती है। और जो दिशा पता चलने पर असहज लगे, उसे पहचानना ही पहली ज़िम्मेदारी है।

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