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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

धारा 144: एक उपनिवेशी हथियार जो आज भी काम कर रहा है

एक शहर है। शाम का समय है। कुछ नागरिक एक पार्क में जमा होने वाले थे, एक छोटी सी सभा के लिए। विषय क़ानूनी था, किसी राजनीतिक दल की रैली नहीं, किसी विवाद की भीड़ नहीं। सिर्फ़ कुछ नागरिक एक मुद्दे पर बात करने के लिए, शायद एक सार्वजनिक स्मरण के लिए, शायद किसी कविता पाठ के लिए।

सुबह से एक नोटिस लग गया। पुलिस आयुक्त ने एक आदेश जारी किया है। आदेश में लिखा है कि अगले सात दिनों के लिए पूरे शहर में चार या उससे ज़्यादा लोगों के एकत्र होने पर रोक है। आधार है, “क़ानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका।” यह आदेश एक धारा के तहत है, जिसका नंबर हम सब ने एक न एक बार सुना है, धारा 144।

यह आदेश पहली बार नहीं लगा है। पिछले पांच साल में, इस शहर में, यह दर्जनों बार लग चुका है। कभी एक छोटे विरोध से पहले, कभी किसी फ़ैसले के आने पर, कभी किसी राजनीतिक यात्रा से पहले, कभी किसी त्योहार पर। हर बार वही तर्क, क़ानून और व्यवस्था। हर बार वही धारा।

यह धारा कहां से आई, और इसका मूल इस्तेमाल किसके लिए था, यह जानना उतना ही ज़रूरी है जितना आज इसे इस्तेमाल होते देखना।

1861 की ज़मीन

धारा 144 दंड प्रक्रिया संहिता का हिस्सा है। मूल दंड प्रक्रिया संहिता 1861 में बनी, यानी 1857 के विद्रोह के ठीक चार साल बाद। यह संयोग नहीं है। 1857 के बाद अंग्रेज़ी सरकार ने यह तय किया कि उपनिवेश में जो भी क़ानूनी ढांचा हो, वह इस तरह से बनाया जाए कि भविष्य में कोई भी ऐसा विद्रोह दोबारा खड़ा न हो सके।

इस सोच का सीधा नतीजा थी एक ऐसी धारा जो प्रशासन को बिना अदालत की मंज़ूरी के, सिर्फ़ “आशंका” के आधार पर, सार्वजनिक एकत्र को रोकने का अधिकार दे। यह आज़ादी से पहले उपनिवेशी प्रशासन का सबसे सुविधाजनक हथियार था। किसी भी सभा को, किसी भी जुलूस को, किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शन को इसी धारा के तहत रोका जा सकता था, और रोका गया। स्वतंत्रता आंदोलन के बहुत से प्रमुख क्षणों के पहले या बाद में, यह धारा लगी थी।

जब 1973 में दंड प्रक्रिया संहिता का नया रूप आया, तब भी यह धारा वही रही। शब्दों में कुछ बदलाव हुआ, पर मूल अधिकार वही था। आज, जब 2023 में नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता आई, तो यह धारा अब 163 के नाम से जानी जाती है, पर इसका मूल ढांचा अब भी 1861 की ज़मीन पर खड़ा है।

क्या लिखा है, और कैसे इस्तेमाल होता है

इस धारा के तहत एक ज़िला मजिस्ट्रेट या उप जिलाधिकारी एक “आदेश” जारी कर सकता है, अगर उसे लगे कि कोई स्थिति “मानव जीवन, स्वास्थ्य, या सुरक्षा” को ख़तरा हो सकती है, या “सार्वजनिक शांति” भंग कर सकती है। आदेश अधिकतम दो महीने के लिए लगाया जा सकता है, और इसके तहत आदमी इकट्ठा होना, हथियार ले जाना, और बहुत से अन्य कार्य अस्थायी रूप से प्रतिबंधित हो जाते हैं।

यह क़ानून का इरादा यह था कि असाधारण परिस्थितियों में, जब कोई वास्तविक तत्काल ख़तरा हो, तब एक प्रशासनिक अधिकारी जल्दी क़दम उठा सके। पर आज की वास्तविकता यह है कि बहुत से प्रशासन इसे एक रोज़मर्रा का उपकरण मानने लगे हैं।

देश के बहुत से ज़िलों में, सालभर साढ़े तीन सौ दिनों से ज़्यादा इस तरह का कोई न कोई आदेश लगा रहता है। यह आंकड़ा कोई दूर का नहीं है, यह सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज है। एक धारा जो असाधारण परिस्थितियों के लिए बनी थी, वह अब साधारण प्रशासनिक आदत बन गई है। और जब असाधारण, साधारण बन जाए, तब उसका असली अर्थ बदल जाता है।

जब आज़ाद नागरिक पर वही हथियार चले, जो उपनिवेशी पर चला था

यहां एक ऐसी बात आती है, जिस पर रुकना ज़रूरी है।

1861 की उस सरकार के लिए यह क़ानून समझ में आता था। उनके लिए स्थानीय नागरिक एक संदेहास्पद विषय था, उसकी हर सभा एक संभावित विद्रोह थी, और उसे रोकना उनकी सत्ता की ज़रूरत थी।

आज की सरकार उसी क़ानून को क्यों इस्तेमाल करती है? यह सवाल अक्सर नहीं पूछा जाता, पर यह सबसे बुनियादी सवाल है।

एक स्वतंत्र देश में, अपने ही नागरिकों की सभा को रोकने का तर्क बहुत स्पष्ट और बहुत संकीर्ण होना चाहिए। एक नागरिक की सभा का अधिकार लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार है। उसे रोकने का अधिकार राज्य के पास तभी होना चाहिए जब कोई असली, तत्काल, और दर्ज ख़तरा हो। पर हमारे यहां यह उल्टा हो गया है। आज प्रशासन के पास यह सोचने का कारण है कि सभा “हो सकता है कि ख़तरनाक हो”, और इसी “हो सकता है” के आधार पर वह सभा रोक देता है।

यह उपनिवेशी सोच है, जो आज भी हमारे क़ानूनी ढांचे का हिस्सा है। और इसका असर यह है कि नागरिक धीरे धीरे यह मान लेता है कि बिना अनुमति के सभा करना अपराध है। यह मान लेना ख़ुद एक उपनिवेशी हार है।

अनुराधा भसीन में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा था

2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसला दिया, जिसे “अनुराधा भसीन” मामले के नाम से जाना जाता है। उस फ़ैसले में न्यायालय ने धारा 144 के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं।

पहली, यह कि इस धारा का इस्तेमाल असहमति को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। दूसरी, यह कि आदेश जारी करते समय कारण लिखित में दर्ज होने चाहिए, और वे कारण विशिष्ट होने चाहिए, सामान्य नहीं। तीसरी, यह कि आदेश आनुपातिक होने चाहिए, यानी जो ख़तरा है, उसी के अनुपात में हो, और उसे न्यायिक समीक्षा के लिए उपलब्ध होना चाहिए।

यह दिशानिर्देश स्पष्ट थे। पर पांच साल बाद, ज़मीन पर इनका कितना पालन हो रहा है, यह एक खुला सवाल है। बहुत से आदेशों में अभी भी “क़ानून और व्यवस्था की आशंका” जैसे सामान्य शब्द लिखे होते हैं। बहुत कम आदेशों में कोई विशिष्ट कारण दर्ज होता है। और न्यायिक समीक्षा के रास्ते अक्सर इतने लंबे होते हैं कि आदेश की अवधि ही ख़त्म हो जाती है, और मामला निरर्थक हो जाता है।

यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच की दूरी है, जो हमारी न्याय व्यवस्था की एक चुपचाप वाली विफलता है।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह आदत है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। धारा 144 का दुरुपयोग किसी एक की साज़िश नहीं है।

यह उपनिवेशी क़ानूनी विरासत का एक स्वाभाविक नतीजा है। एक प्रशासक के लिए यह सबसे आसान उपकरण है। एक मिनट में आदेश तैयार हो जाता है, अमल में आ जाता है, और किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। उसका इस्तेमाल न करना एक सक्रिय निर्णय है, और सक्रिय निर्णय लेने में जोखिम होता है। इसलिए जो प्रशासन जोखिम से बचना चाहता है, वह इसे डिफ़ॉल्ट उपकरण बना लेता है।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर राज्य, हर सरकार के अधीन, यह धारा इसी तरह से इस्तेमाल हुई है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस उपनिवेशी ढांचे में है जिसने प्रशासन को नागरिक से ऊपर का दर्जा दे रखा है, और जिसमें नागरिक की सहमति की कोई औपचारिक भूमिका नहीं है।

अरस्तू ने कहा था कि एक नागरिक का अधिकार सभा करने का है, बहस करने का है, और निर्णय की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का है। एक नागरिक जिसकी सभा प्रशासन की पूर्व अनुमति पर निर्भर हो, वह आधा नागरिक है। यह बात आज भी उतनी ही सच है, और शायद पहले से ज़्यादा।

क्या किया जा सकता है

यह क़ानून बड़ा है, और इसकी समीक्षा संसद और न्यायपालिका के हाथ में है। पर कुछ ठोस बातें एक नागरिक के तौर पर ज़रूर हैं।

पहली बात, अनुराधा भसीन का फ़ैसला पढ़िए। यह सार्वजनिक है, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध है। उसमें न्यायालय ने जो दिशानिर्देश दिए हैं, वे एक नागरिक के लिए हथियार हैं। जब आपके इलाक़े में धारा 144 का आदेश लगे, तो उसके कारण क्या हैं, यह जानने का आपका अधिकार है। पूछिए।

दूसरी बात, अपने ज़िला प्रशासन से पिछले एक साल के सभी धारा 144 आदेशों की प्रति मांगिए, सूचना के अधिकार के तहत। आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि साल में कितनी बार आदेश लगे, और कितने में कोई विशिष्ट कारण लिखा था। यह आंकड़ा अपने आप में एक नागरिक रिपोर्ट है।

तीसरी बात, अगर आपकी कोई सभा, कोई स्मरण, कोई कार्यक्रम धारा 144 के कारण रोका जाए, तो उच्च न्यायालय में रिट याचिका का रास्ता खुला है। यह लंबा है, महंगा हो सकता है, पर यह असली रास्ता है। कुछ नागरिक समूह और स्वतंत्र वकील इस तरह के मामलों में मदद करते हैं। यह जानकारी एकत्र कीजिए, और रखिए।

चौथी बात, अपने जनप्रतिनिधि से इस धारा पर बहस की मांग कीजिए। यह दलगत मुद्दा नहीं है, यह नागरिक का मुद्दा है। हर पार्टी का नेता जब विपक्ष में होता है, तब इस धारा का दुरुपयोग कहता है। जब वही पार्टी सत्ता में आती है, तब वही धारा वैसा ही इस्तेमाल होती है। यह दलगत आदत है, और इसे बदलने के लिए जनप्रतिनिधियों पर सीधा नागरिक दबाव चाहिए।

अंत में

एक क़ानून जो 1861 में, एक विद्रोह के तुरंत बाद, उपनिवेशी सत्ता को सुविधा देने के लिए बना था, वह आज भी एक स्वतंत्र देश के नागरिक की सभा को रोकने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। यह सिर्फ़ क़ानूनी सच नहीं है, यह एक मानसिक सच भी है। हमने अपनी आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी, अपने नागरिक को इस उपनिवेशी संदेह की दृष्टि से देखना नहीं छोड़ा है।

एक देश जो अपने नागरिक को सभा करने के लिए हर बार पुलिस से अनुमति लेने को कहे, वह उस उपनिवेशी सोच के सबसे क़रीब है जिससे आज़ाद होने के लिए हमारे बुज़ुर्गों ने इतनी क़ुर्बानी दी थी।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े के पिछले एक साल के धारा 144 आदेशों का हिसाब मांगना शुरू कीजिए। कितने आदेश लगे। कितनों में कारण लिखा था। कितनों को कोई नागरिक चुनौती दे पाया। ये छोटे छोटे आंकड़े हैं, पर इन्हीं से एक उपनिवेशी विरासत की असली तस्वीर बनती है। और जिस दिन यह तस्वीर पर्याप्त लोगों के सामने होगी, उस दिन इस धारा पर ईमानदार बहस की शुरुआत होगी।

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