एक थाने का दृश्य है। एक आम नागरिक एक छोटी सी शिकायत लेकर आया है। उसके पड़ोसी ने उसकी ज़मीन पर एक दीवार बढ़ा दी है, या किसी ने उसकी मोटरसाइकिल चुरा ली है, या कोई पुराना झगड़ा है जिसमें उसे डर है कि स्थिति बिगड़ सकती है।
वह थाने के दरवाज़े पर पहुंचता है। पहली नज़र, संदेह की। दूसरी नज़र, थकान की। फिर एक सिपाही उससे पूछता है, “क्या काम है?” वह अपनी बात कहता है। सिपाही उसे अंदर एक बेंच पर बैठने को कहता है। दो घंटे बीतते हैं। फिर एक उप निरीक्षक आता है, और उसकी पूरी बात फिर से सुनता है। उसमें से कुछ हिस्से चुनकर एक काग़ज़ पर लिखे जाते हैं, कुछ छूट जाते हैं। फिर कहा जाता है, “ठीक है, हम देखते हैं, फिर आइएगा।”
वह नागरिक चार घंटे बाद थाने से बाहर निकलता है। उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं है, कोई रसीद नहीं है, कोई शिकायत संख्या नहीं है। वह नहीं जानता कि उसकी बात कहीं दर्ज भी हुई है या नहीं। उसके मन में एक सोच है, जो वह पहले से ही जानता था, “थाने जाना बेकार है।”
यह दृश्य देश के लाखों थानों में, लाखों नागरिकों के साथ, हर महीने होता है। और इस दृश्य की जड़ें एक क़ानून में हैं जो 1861 का है। उस क़ानून को समझे बिना, आज के पुलिस अनुभव को समझना अधूरा है।
जो क़ानून 1857 के विद्रोह के बाद लिखा गया
पुलिस अधिनियम 1861 बना, 1857 के विद्रोह के चार साल बाद। यह संयोग नहीं था। उस विद्रोह ने अंग्रेज़ी सरकार को हिला दिया था, और उन्होंने यह तय किया कि उपनिवेश में एक ऐसी पुलिस बनाई जाए जो भविष्य में किसी भी संगठित विद्रोह को रोक सके।
इस सोच ने पुलिस की पूरी संरचना तय की। पुलिस को स्थानीय समुदाय की सेवा के लिए नहीं, बल्कि सरकार के नियंत्रण के लिए डिज़ाइन किया गया। उसकी जवाबदेही ज़िले के मजिस्ट्रेट को थी, जो ख़ुद अंग्रेज़ी सरकार का अधिकारी था। उसका मूल काम क़ानून तोड़ने वालों को पकड़ना नहीं, बल्कि सत्ता का इकबाल बनाए रखना था।
यह बात इस क़ानून के बहुत से प्रावधानों में साफ़ झलकती है। पुलिस के पास गिरफ़्तारी के विस्तृत अधिकार दिए गए। उसके पास तलाशी और ज़ब्ती की लगभग असीमित शक्ति दी गई। उसकी आंतरिक जांच एक उच्च अधिकारी ही करता था, यानी पुलिस ख़ुद पुलिस की निगरानी करती थी। नागरिक की कोई औपचारिक भूमिका इस ढांचे में नहीं थी।
यह क़ानून आज़ादी के बाद बदला नहीं गया। न ही उसमें कोई बुनियादी संशोधन हुआ। 1947 के बाद से, राज्यों ने अपने अपने पुलिस अधिनियम बनाए, पर लगभग सब उसी 1861 के ढांचे पर टिके। मतलब, उस सोच को जो उपनिवेशी सत्ता ने बनाई थी, उसी सोच पर आज भी हमारी पुलिस खड़ी है।
क्या इस ढांचे ने तय किया
इस क़ानूनी ढांचे ने कई चीज़ें तय कीं, जो आज के नागरिक अनुभव में सीधे झलकती हैं।
पहली, जवाबदेही ऊपर है, समुदाय को नहीं। एक पुलिस कांस्टेबल अपने काम के लिए अपने वरिष्ठ अधिकारी को जवाब देता है, उस मोहल्ले को नहीं जिसमें वह तैनात है। वह वरिष्ठ अधिकारी राज्य सरकार को जवाब देता है, समुदाय को नहीं। यह जवाबदेही की रेखा ऊपर की तरफ़ ही जाती है, कभी नीचे नहीं आती। नतीजा यह है कि पुलिस के लिए स्थानीय नागरिक का संतोष कोई मापदंड नहीं है।
दूसरी, पदसोपान सख़्त है। पुलिस की संरचना सेना जैसी है, जहां ऊपर के अधिकारी का आदेश ही अंतिम होता है। एक निचले स्तर के अधिकारी के लिए स्वतंत्र फ़ैसला लेना बहुत कठिन है। यह संरचना त्वरित आज्ञाकारिता के लिए अच्छी है, पर नागरिक की रोज़मर्रा की समस्याओं के लिए नहीं। हर छोटी सी शिकायत भी कई परतें चढ़कर ही ठीक हो सकती है।
तीसरी, राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए दरवाज़ा खुला है। क्योंकि पुलिस की पूरी जवाबदेही राज्य सरकार के पास है, इसलिए जो भी सत्ता में हो, वह पुलिस का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए कर सकता है। तबादला, प्रोन्नति, और तैनाती, ये सब राजनीतिक प्रभाव के अधीन हैं। यह बात किसी एक सरकार के बारे में नहीं है, यह संरचना ही ऐसी है।
चौथी, जांच और क़ानून व्यवस्था एक ही हाथ में। एक थाने का प्रभारी अधिकारी अपने इलाक़े में क़ानून व्यवस्था भी संभालता है, और अपराध की जांच भी करता है। ये दोनों काम बहुत अलग हैं, और इनकी मांगें अक्सर विरोधाभासी होती हैं। पर एक ही व्यक्ति को दोनों करने हैं, इसलिए जांच की गुणवत्ता अक्सर ध्यान का दूसरा क्रम बन जाती है।
ये चार बातें मिलकर वह माहौल बनाती हैं जिसमें एक आम नागरिक थाने जाने से बचता है, और जब जाता है तो उसका अनुभव लगभग वही होता है जो ऊपर वर्णित किया गया।
आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा रुका हुआ सुधार
2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने “प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ” मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला दिया। उस फ़ैसले में न्यायालय ने सात विशिष्ट निर्देश दिए, जिनका पालन सभी राज्यों को करना था।
इन निर्देशों में थे, पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति में एक स्वतंत्र प्रक्रिया, ज़िला स्तर के अधिकारियों का तय कार्यकाल ताकि उनका मनमाना तबादला न हो, जांच और क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी का अलगाव, हर ज़िले में एक पुलिस शिकायत प्राधिकरण जिसमें नागरिक प्रतिनिधि हों, और राज्य स्तर पर एक सुरक्षा आयोग। ये निर्देश एक बेहतर पुलिस की दिशा में एक मज़बूत क़दम थे।
बीस साल बाद, इन निर्देशों का कार्यान्वयन काग़ज़ पर तो लगभग हो गया है, पर ज़मीन पर बहुत अधूरा है। बहुत से राज्यों में शिकायत प्राधिकरण बने हैं, पर वे या तो कमज़ोर हैं, या उनमें ज़रूरी संसाधन नहीं हैं, या उनकी सिफ़ारिशों पर अमल बहुत कम होता है। तय कार्यकाल को अक्सर तकनीकी आधार पर दरकिनार कर दिया जाता है। यानी न्यायालय के निर्देश हैं, पर उनकी आत्मा अभी ज़मीन पर नहीं उतरी है।
यह आज़ादी के बाद का शायद सबसे महत्वपूर्ण रुका हुआ सुधार है, क्योंकि पुलिस वह संस्था है जिससे एक आम नागरिक का राज्य से सबसे पहला सामना होता है। अगर यह संस्था ठीक नहीं होगी, तो “राज्य” का अनुभव आम नागरिक के लिए कभी ठीक नहीं होगा।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह विरासत है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। पुलिस की यह दशा किसी एक की चूक नहीं है।
बहुत से पुलिस अधिकारी अच्छे हैं, ईमानदार हैं, मेहनती हैं, और मुश्किल हालात में काम करते हैं। समस्या व्यक्तियों में नहीं है, समस्या उस ढांचे में है जिसमें वे काम करते हैं। एक अच्छा अधिकारी भी अगर 1861 की संरचना में बैठा है, तो उसकी अच्छाई व्यवस्थागत सुधार नहीं ला सकती। और एक बुरा अधिकारी अगर उसी संरचना में है, तो उसकी बुराई के लिए कोई रोक नहीं है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। पिछले अठहत्तर सालों में हर पार्टी की सरकार आई, हर पार्टी ने पुलिस सुधार की बात की, और किसी की सरकार के अधीन भी यह सुधार पूरा नहीं हुआ। क्योंकि सत्ता में बैठी हर पार्टी को यह ढांचा सुविधाजनक लगता है, चाहे वह विपक्ष में रहते हुए कुछ भी कहती हो। यह दलगत आदत है, संरचनात्मक है।
प्लेटो ने कहा था कि एक नागरिक की राज्य पर भरोसे की पहली परीक्षा वह संस्था होती है जिससे उसका सबसे पहला और सबसे रोज़ का सामना है। हमारे यहां वह संस्था पुलिस है। और जब वह संस्था एक उपनिवेशी ढांचे पर खड़ी हो, तो नागरिक का भरोसा कैसे बने।
क्या किया जा सकता है
यह सुधार बड़ा है, और इसका मुख्य भार न्यायपालिका और राज्य सरकारों पर है। पर एक नागरिक के तौर पर कुछ ठोस बातें हैं।
पहली बात, 2006 के प्रकाश सिंह फ़ैसले को पढ़िए। यह सार्वजनिक है, और उसमें दिए गए सात निर्देश एक नागरिक के लिए सबसे ज़रूरी क़ानूनी जानकारी हैं। यह जानकारी एक रोज़मर्रा का संदर्भ बननी चाहिए।
दूसरी बात, अपने राज्य के पुलिस शिकायत प्राधिकरण का पता लगाइए। यह कहां बैठा है, इसके सदस्य कौन हैं, इसमें शिकायत कैसे करनी है। यह जानकारी अधिकांश नागरिकों को नहीं है, और इसी अज्ञान का फ़ायदा एक अधूरी संस्था को मिलता है। पूछने से, मांगने से, यह जानकारी सामने आती है।
तीसरी बात, अगर आपको थाने में अनुचित अनुभव हो, तो शांत और लिखित रूप से शिकायत दर्ज करवाइए। ज़बानी शिकायत अक्सर खो जाती है। लिखित में दर्ज होने पर, उसकी एक प्रति मांगिए। ज़रूरत पड़े तो उच्च अधिकारी के पास, और उसके आगे शिकायत प्राधिकरण के पास भी रास्ता खुला है। यह लंबा रास्ता है, पर यही रास्ता है।
चौथी बात, अपने जनप्रतिनिधि से पुलिस सुधार पर सवाल पूछिए। आपके राज्य ने 2006 के निर्देशों के तहत क्या किया है, क्या नहीं किया है, यह सूचना मांगिए। यह सूचना सार्वजनिक होनी चाहिए, और होनी ही है। पूछने से ही प्राथमिकता बनती है।
अंत में
एक देश जिसने अपनी आज़ादी की लड़ाई पुलिसी अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ी, उसी देश ने आज़ादी के बाद अपनी पुलिस को उसी उपनिवेशी क़ानून के तहत चलने दिया। यह सिर्फ़ क़ानूनी विडंबना नहीं है, यह एक राजनीतिक चुनाव है, जो हर सरकार ने किया, और जिसे हम नागरिकों ने भी होने दिया।
जब तक पुलिस की संरचना समुदाय के लिए नहीं बनेगी, सरकार के लिए नहीं, तब तक एक आम नागरिक का थाने का अनुभव यही रहेगा। और जब तक यह अनुभव यह रहेगा, तब तक हमारा लोकतंत्र अपनी सबसे पहली परीक्षा में अधूरा रहेगा।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने राज्य के पुलिस शिकायत प्राधिकरण का पता लगाना शुरू कीजिए। पिछले साल कितनी शिकायतें दर्ज हुईं, कितनों पर कार्रवाई हुई, कितनी अब भी लंबित हैं। ये आंकड़े छोटे लगते हैं, पर इन्हीं से एक संस्था की असली ईमानदारी पता चलती है। और जिस दिन यह जानकारी पर्याप्त नागरिकों के पास होगी, उस दिन 1861 की विरासत पर ईमानदार सवाल उठने शुरू होंगे।