Baklolz | बकलोल्ज़

ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

बात पर पाबंदी, कलम पर कैंची, और सभा पर लाठी: 174 साल तक भारत की आवाज़ कैसे दबाई गई

रात के दो बजे का दृश्य कल्पना कीजिए, 1878 का एक छोटा सा कस्बा। एक छपाई की मशीन एक तंग गली में चल रही है। पीठ पर पसीना है, उंगलियों पर स्याही है, और एक छोटा सा अख़बार छप रहा है। दरवाज़े पर दस्तक होती है। तीन सिपाही अंदर आते हैं। मशीन सील कर दी जाती है, सीसे के टाइप ज़ब्त कर लिए जाते हैं, और संपादक को रात ही रात ज़िले के दफ़्तर ले जाया जाता है। उस पर मुक़दमा चलेगा। उसका जुर्म, “विदेशी सरकार के प्रति असंतोष फैलाना।”

अब दूसरा दृश्य कल्पना कीजिए, 1919 का। एक छोटे शहर का चौक है, जहां कुछ नागरिक एक नए क़ानून के विरोध में जमा हो रहे हैं। कोई हथियार नहीं, कोई पथराव नहीं, बस एक सभा। एक मजिस्ट्रेट का आदेश पढ़ा जाता है, चार से ज़्यादा लोगों के एकत्र होने पर रोक है। लाठी चार्ज होती है। कुछ लोग गिरफ़्तार होते हैं, कुछ घायल, कुछ भाग जाते हैं।

ये दोनों दृश्य 174 साल के एक लंबे इतिहास के दो छोटे अंश हैं। 1773 से 1947 तक, अंग्रेज़ी राज में भारत की आवाज़ को दबाने के जितने तरीक़े बने, उनकी एक पूरी सूची है, और वह सूची अपने आप में एक चेतावनी है। यह लेख उसी सूची का है।

जो पहला हथियार था: छपाई पर पहरा

अंग्रेज़ी राज को सबसे पहले जिस चीज़ ने डराया, वह थी छपाई की मशीन। एक मशीन जो शहर में बैठकर हज़ार पन्ने एक दिन में निकाल सकती थी, वह सत्ता के लिए एक नई तरह की चुनौती थी। इसी डर से, छपाई पर नियंत्रण का इतिहास उपनिवेशी क़ानून का सबसे पुराना अध्याय है।

1799 में, गवर्नर जनरल वेलेज़ली के समय, छपाई के लिए पूर्व अनुमति का नियम लागू हुआ। कोई भी अख़बार बिना सरकार की मंज़ूरी के नहीं निकल सकता था। 1823 में, एक अध्यादेश के तहत सब अख़बारों को लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया। 1857 के विद्रोह के बाद, “गैगिंग एक्ट” 1857 आया, जिसने भारतीय भाषाओं के अख़बारों पर सीधी रोक लगा दी।

पर सबसे क्रूर 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट था, जो लॉर्ड लिटन के समय में लाया गया। इस क़ानून का साफ़ मक़सद था, भारतीय भाषाओं के अख़बारों को निशाना बनाना। अंग्रेज़ी अख़बार इसके दायरे से बाहर थे। एक स्थानीय भाषा का संपादक, जिसका अख़बार सरकार को आपत्तिजनक लगता, उसे ज़मानत के तौर पर बड़ी रक़म जमा करनी पड़ती। दूसरी “ग़लती” पर वह रक़म ज़ब्त हो जाती, और छपाई की मशीन भी। इस क़ानून के तहत बहुत से छोटे अख़बार बंद हुए, और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को एक झटका लगा जिससे उसे उबरने में दशकों लगे।

1908 में, एक और क़ानून आया, समाचार पत्र (अपराध को उकसाने वाले) अधिनियम। उसी साल, भारतीय आपराधिक क़ानून संशोधन अधिनियम भी आया, जिसने “गैरक़ानूनी संगठनों” की पहचान करने का अधिकार सरकार को दिया। 1910 में, भारतीय प्रेस अधिनियम आया, जिसने नई सुरक्षा जमा राशि की शर्तें बढ़ाईं। 1931 में, प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम आया, जो अब तक का सबसे व्यापक था, और इसने मूल रूप से किसी भी प्रकाशन को बंद करने का अधिकार राज्यपाल को दे दिया।

जोड़कर देखिए। 150 साल में, दर्जनों क़ानून, हर बार एक नई परत, हर बार एक नया अधिकार। और हर परत के बाद, छोटे और बड़े, अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा के, सैंकड़ों अख़बार बंद हुए, उनके संपादक जेल गए, और उनकी मशीनें ज़ब्त हुईं।

क़ानून जो बोलने को अपराध बना देते थे

छपाई के साथ साथ, बोलने पर भी क़ानूनी पकड़ बनाई गई। यह पकड़ कई धाराओं में फैली थी, और इनमें से कई आज भी हमारे क़ानून की किताब में हैं।

1870 में भारतीय दंड संहिता में धारा 124A जोड़ी गई, राजद्रोह की। इसका दायरा ऐसा था कि “घृणा”, “अवमानना”, या “असंतोष” की कोई भी सार्वजनिक अभिव्यक्ति इसके दायरे में आ सकती थी। इस धारा का इस्तेमाल अगले 77 सालों में लगभग हर बड़े स्वतंत्रता संग्रामी पर हुआ।

धारा 153A भी इसी कड़ी का हिस्सा थी, जो “विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता” को अपराध बनाती थी। इसकी परिभाषा इतनी व्यापक थी कि एक भाषण जो किसी मुद्दे पर सख़्त था, उसे आसानी से इसके दायरे में लाया जा सकता था।

1927 में, धारा 295A जोड़ी गई, जिसमें “धार्मिक भावनाओं को आहत करने” का अपराध शामिल था। इसकी शुरुआत एक विवादास्पद पुस्तक के मामले से हुई थी, पर इसका इस्तेमाल आगे चलकर बहुत व्यापक रहा।

इन धाराओं के अलावा, सरकार के पास और भी कई हथियार थे। राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 ने सरकार से जुड़ी किसी भी जानकारी को साझा करना अपराध बना दिया। डाक एवं टेलीग्राफ़ अधिनियम 1885 (जो आज भी मूल रूप से लागू है) ने सरकार को संदेशों को रोकने और पढ़ने का अधिकार दिया।

मतलब, एक नागरिक अगर बोलना चाहे, तो उसके सामने धाराओं का एक पूरा जाल था। एक भाषण कई धाराओं में फंस सकता था। और हर धारा के तहत, सबूत और इरादे की जांच अदालत में होती, जिसके लिए सालों लग सकते थे, और जिसके दौरान वह नागरिक जेल में रहता।

जब सभा करना ही गुनाह बन गया

बोलने और छापने के बाद, तीसरा हथियार था सभा पर पाबंदी। और इसका सबसे पुराना उपकरण आज भी हमारे क़ानून में है, धारा 144 दंड प्रक्रिया संहिता।

1861 में, 1857 के विद्रोह के सिर्फ़ चार साल बाद, यह धारा बनी। इसने एक मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया कि वह “क़ानून और व्यवस्था की आशंका” के आधार पर किसी भी क्षेत्र में सार्वजनिक एकत्र पर रोक लगा सके। उसे न्यायिक मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं थी, सिर्फ़ उसकी अपनी “आशंका” काफ़ी थी।

1908 का भारतीय आपराधिक क़ानून संशोधन अधिनियम और भी आगे गया। इसने सरकार को यह अधिकार दिया कि वह किसी भी संगठन को “गैरक़ानूनी” घोषित कर दे। उसके बाद उस संगठन का सदस्य होना अपने आप में अपराध बन जाता। बहुत से क्रांतिकारी समूह इसी क़ानून के तहत बैन हुए, और उनके सदस्य गिरफ़्तार हुए।

1915 में, पहले विश्व युद्ध के दौरान, भारत रक्षा अधिनियम पास हुआ। इसने सरकार को व्यापक अधिकार दिए, बिना मुक़दमे के नज़रबंदी, सार्वजनिक सभा पर रोक, अख़बारों की सेंसरशिप। यह क़ानून युद्ध के बाद भी रहा, बस उसका नाम बदला।

1919 में सबसे कुख्यात क़ानून आया, रॉलेट एक्ट, जिसे आधिकारिक तौर पर “अराजकीय और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम” कहा गया। इसने पुलिस को यह अधिकार दिया कि वह बिना वारंट के गिरफ़्तार करे, बिना मुक़दमे के दो साल तक जेल में रखे, और बिना अपील के सज़ा सुनाए। इसी क़ानून के विरोध में अप्रैल 1919 का जलियांवाला बाग़ हुआ, जब एक शांतिपूर्ण सभा पर बिना चेतावनी के गोलियां चलीं, और सैकड़ों मारे गए।

1939 में, दूसरे विश्व युद्ध के साथ, भारत रक्षा अधिनियम और भारत रक्षा नियम फिर लागू हुए। इन नियमों के तहत, हज़ारों नेता, नागरिक, और सामान्य लोग बिना मुक़दमे के जेल भेजे गए।

बिना मुक़दमे के जेल: एक अंग्रेज़ी रिवाज़

यहां एक ऐसी बात कहनी ज़रूरी है, जो शायद उपनिवेशी क़ानूनी ढांचे की सबसे काली परत है, बिना मुक़दमे के नज़रबंदी।

1818 में, अंग्रेज़ी सरकार ने “रेगुलेशन III” पास किया। इस क़ानून ने राज्यपाल को यह अधिकार दिया कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना किसी आरोप के, बिना किसी मुक़दमे के, और बिना किसी निश्चित अवधि के जेल में रख सकता है। बस यह कह देना ज़रूरी था कि उस व्यक्ति की रिहाई से “राज्य को ख़तरा” हो सकता है।

इस क़ानून का इस्तेमाल अगले 130 सालों में सैंकड़ों बार हुआ। 1916 में, ब्रिटिश थियोसोफ़िस्ट और होम रूल लीग की संस्थापक एनी बेसेंट को इसी तरह के क़ानूनी ढांचे के तहत आंतरिक निर्वासन में रखा गया। 1907 में, लाला लाजपत राय और सरदार अजीत सिंह को बर्मा भेजा गया, बिना मुक़दमे के।

रॉलेट एक्ट के तहत 1919 में और भी व्यापक रूप से इस अधिकार का इस्तेमाल हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, इस तरह की नज़रबंदी एक रोज़मर्रा का प्रशासनिक उपकरण बन गई। एक नागरिक, जिसने कोई अपराध नहीं किया, जिसका कोई मुक़दमा नहीं हुआ, सालों जेल में रह सकता था, सिर्फ़ इस आधार पर कि किसी अधिकारी को उसकी आज़ादी “असुविधाजनक” लग रही थी।

यह सिर्फ़ क़ानून की एक धारा नहीं थी, यह एक पूरी प्रशासनिक संस्कृति थी। और इस संस्कृति में, नागरिक की स्वतंत्रता हमेशा एक अधूरी चीज़ रही, जिसे राज्य कभी भी वापस ले सकता था।

कुछ नाम जो भुलाए नहीं जा सकते

इस पूरे इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके बयान आज भी पढ़े जाने चाहिए, क्योंकि वे सिर्फ़ ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं हैं, वे एक न्यायशास्त्रीय परंपरा हैं।

तिलक का 1908 का बयान

बाल गंगाधर तिलक पर तीन बार राजद्रोह का मुक़दमा चला। 1908 में बंबई उच्च न्यायालय में उन्हें छह साल की काले पानी की सज़ा सुनाई गई। अदालत में जब उन्हें अंतिम शब्द कहने को कहा गया, तब उन्होंने कहा,

“In spite of the verdict of the jury, I maintain that I am innocent. There are higher Powers that rule the destiny of things, and it may be the will of Providence that the cause which I represent may prosper more by my suffering than by my remaining free.”

गांधी का 1922 का बयान

चौदह साल बाद, मोहनदास करमचंद गांधी पर एक अदालत में धारा 124A के तहत मुक़दमा चला। उन्होंने सज़ा से पहले अदालत में कहा,

“Section 124A under which I am happily charged is perhaps the prince among the political sections of the Indian Penal Code designed to suppress the liberty of the citizen. Affection cannot be manufactured or regulated by law.”

भगत सिंह का 1929 का बयान

1929 में, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में दो बम फेंके, जान बूझकर ऐसी जगह जहां कोई हताहत न हो। उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, गिरफ़्तार हुए, और अदालत में अपना उद्देश्य स्पष्ट किया। उनके लिखित बयान में एक पंक्ति आज भी पढ़ी जाती है,

“बहरों को सुनाने के लिए आवाज़ बहुत बुलंद होनी चाहिए।”

इन तीनों बयानों में एक बात साझा है। तीनों ने अदालत में अपनी सज़ा को टालने की कोशिश नहीं की, अपनी आवाज़ को रिकॉर्ड कराने की कोशिश की। तीनों ने यह माना कि उस समय की सत्ता उन्हें अपराधी ठहराएगी, पर इतिहास उनके साथ खड़ा होगा। और इतिहास सच में उनके साथ खड़ा रहा।

इन तीनों के अलावा, सैकड़ों नाम हैं जो इस इतिहास में दर्ज हैं। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना मोहम्मद अली, सुभाष चंद्र बोस, चित्तरंजन दास, मदनमोहन मालवीय, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, ये सब के सब इन्हीं क़ानूनों के तहत जेल काटी, अनेक बार, और लंबे समय तक।

जो हम आज़ादी के बाद नहीं बदल पाए

यहां अब इस लेख का सबसे ज़रूरी हिस्सा आता है, क्योंकि अगर यह सब इतिहास में बंद होता, तो इसे केवल इतिहास की तरह पढ़ा जा सकता था। पर असली बात यह है कि इन क़ानूनों में से कई आज भी हमारे साथ हैं।

धारा 144 आज भी दंड प्रक्रिया संहिता में मौजूद है, और इसका इस्तेमाल देश के विभिन्न क्षेत्रों में अब भी होता है। टेलीग्राफ़ अधिनियम 1885 की धारा 5(2) के तहत आज भी इंटरनेट बंद किया जाता है। पुलिस अधिनियम 1861 के मूल ढांचे पर आज भी हमारी पुलिस खड़ी है। अदालत की अवमानना का सिद्धांत आज भी 1773 की Regulating Act की वंशावली में है।

राजद्रोह की धारा 124A पर 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई, पर 2023 की भारतीय न्याय संहिता में एक नई धारा आई, जिसका ढांचा कई जगहों पर पहले से बड़ा है। प्रेस से जुड़े क़ानूनी ढांचे के बहुत से तत्व सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और प्रसारण विनियमन के नए नियमों में बैठे हुए हैं।

मतलब, जिन क़ानूनों के ख़िलाफ़ हमारे बुज़ुर्ग जेल गए, उन क़ानूनों का बड़ा हिस्सा आज भी, एक स्वतंत्र देश में, हमारे साथ है। बस अब इन्हें चलाने वाले अंग्रेज़ नहीं हैं, हम ख़ुद हैं।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। पिछले अठहत्तर सालों में हर सरकार के अधीन ये क़ानून रहे हैं, और हर सरकार के अधीन इनका इस्तेमाल कुछ न कुछ रहा है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस उपनिवेशी ढांचे में है जिसे हमने आज़ादी के बाद ईमानदारी से समीक्षा नहीं की।

अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक स्वस्थ राज्य की पहचान उसके क़ानूनों के स्वरूप से होती है। एक राज्य जो अपने नागरिकों को दबाने के लिए दूसरे राज्य के बनाए गए हथियार रखे, वह राज्य अपने नागरिकों से एक छुपा हुआ रिश्ता रखता है। उस रिश्ते की समीक्षा हर पीढ़ी का काम है।

अंत में

174 साल का यह इतिहास सिर्फ़ अंग्रेज़ी राज की कहानी नहीं है। यह उस ढांचे की कहानी है जिसमें राज्य के पास नागरिक की आवाज़ को रोकने के लिए सौ हथियार थे, और नागरिक के पास इन हथियारों से अपनी रक्षा करने के लिए लगभग कुछ नहीं था।

जब हमने आज़ादी पाई, तब हमारे संविधान ने नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए, जो उस उपनिवेशी असंतुलन को संतुलित करते थे। पर साथ ही, उन उपनिवेशी क़ानूनों को भी रहने दिया गया, जो उस असंतुलन को कायम रखते थे। यह दोहरापन हमारे क़ानूनी ढांचे की एक चुपचाप वाली विशेषता है, और हर बार जब कोई नागरिक अपनी आवाज़ की क़ानूनी सीमा से टकराता है, तब वह दोहरापन सामने आता है।

ताली बजाना बंद कीजिए, इन क़ानूनों के नाम और तारीख़ें जानना शुरू कीजिए। ऊपर जो पूरी सूची आपने पढ़ी, उसमें से कितने नियम आज भी हमारे साथ हैं, यह अपने आप से पूछिए। ये केवल तारीख़ें नहीं हैं। ये उन क़ानूनों के नाम हैं जिनके नीचे लाखों भारतीयों की आवाज़ें दबाई गईं, और इनमें से जो आज भी हमारे साथ हैं, वे आज भी काम कर रहे हैं। यह जानना, और इस पर सवाल पूछना, हर उस नागरिक का कर्तव्य है जो ख़ुद को इन क़ानूनों के तहत आज़ाद मानता है।

Baklolz | बकलोल्ज़

बकलोल्ज़ एक हिंदी पत्रिका है। शोर के बीच ठहरी हुई सोच, हर लेख एक नागरिक सवाल, बिना खेमेबाज़ी।

साथ चलिए

© 2026 Baklolz | बकलोल्ज़