जुलाई की एक रात है। एक गांव का मामला। एक आठ साल का बच्चा अचानक पेट पकड़कर रोने लगा। बुख़ार बढ़ रहा है, उसकी आंखों के नीचे काले धब्बे आ रहे हैं। उसके माता पिता समझ रहे हैं कि यह कोई आम पेट दर्द नहीं है, यह कुछ और है। अपेंडिक्स, या कुछ ज़रूरी, जिसके लिए अस्पताल चाहिए।
घर से सबसे पास का अस्पताल पंद्रह किलोमीटर दूर है। पर बारिश तीन दिनों से लगातार हो रही है, और गांव से जो सड़क निकलती है, वह कच्ची है। उसके दो हिस्सों में बीच में दो छोटे नाले बहते हैं, जो आज एक बड़ी धारा बन गए हैं। एक ट्रैक्टर भी अभी पार नहीं कर सकता।
पिता पंचायत में जाते हैं। सरपंच कहता है, “क्या किया जाए, मौसम ख़राब है, सब रुक गया है। सुबह तक देखो।” पिता वापस आता है। माता रो रही है। दो पड़ोसी भी आ गए हैं। आख़िर में, वे चार लोग, एक चारपाई पर बच्चे को बिठाकर, उसे कंधे पर उठाकर पैदल चल पड़ते हैं। बारिश में, कीचड़ में, अंधेरे में।
अस्पताल पहुंचने में चार घंटे लगते हैं। बच्चा बच जाता है, सर्जरी होती है, ठीक हो जाता है। पर सब कुछ इस आधार पर निर्भर था कि चार पड़ोसी मिल गए, बच्चा वहां तक पहुंच गया, और डॉक्टर मौजूद था। अगर इनमें से एक भी न होता, तो कहानी अलग होती।
यह कहानी एक गांव की है। पर ऐसी कहानियां देश के लाखों गांवों में, हर बारिश के तीन महीनों में, किसी न किसी रूप में होती हैं। और इसके पीछे एक पुरानी, चुपचाप वाली समस्या है, जिसका नाम है, सड़क।
“सड़क है” का असली मतलब क्या होता है
जब सरकारी आंकड़ों में किसी गांव को “सड़क से जुड़ा” कहा जाता है, तो उसका मतलब अक्सर वह नहीं होता जो एक आम नागरिक समझता है।
ग्रामीण सड़कों की दो श्रेणियां हैं। पहली, “सब मौसम” वाली सड़क, जो साल के बारह महीने उपयोग में आती है। यह आम तौर पर पक्की होती है, ज़्यादातर डामर या कंक्रीट की, और इसमें ज़रूरी पुलिया और जल निकासी होती है। दूसरी, “हर मौसम नहीं” वाली सड़क, जो शुष्क मौसम में चलती है, पर बारिश में या तो कीचड़ में बदल जाती है, या किसी नाले में डूब जाती है, या ख़ुद ही धंस जाती है।
देश की कुल ग्रामीण सड़कों का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी दूसरी श्रेणी में आता है। एक हाल की रिपोर्ट में पाया गया कि सत्ताईस लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़क “ख़राब स्थिति” में है, और इनमें से अधिकांश “हर मौसम” वाली नहीं है। यानी, ये सड़कें नक़्शे पर हैं, सरकारी आंकड़े में हैं, पर बारिश के तीन महीनों में ये ग़ायब हो जाती हैं।
यह वह दूरी है जो आंकड़ों और अनुभव के बीच में है। एक आदमी जो शहर में बैठकर ग्रामीण विकास की रिपोर्ट पढ़ रहा है, उसके लिए “सड़क से जुड़ा गांव” का मतलब है, उस गांव तक कभी भी पहुंचा जा सकता है। एक माता जो उसी गांव में रहती है, उसके लिए “सड़क से जुड़ा गांव” का मतलब है, कि मानसून के तीन महीनों को छोड़कर, उसका गांव बाक़ी समय जुड़ा रहता है। इन दोनों समझ में एक पूरी ज़िंदगी का फ़र्क़ है।
मानसून जब गांव को काट देता है
जब एक गांव बारिश में कट जाता है, तो इसका असर सिर्फ़ “असुविधा” नहीं होता। यह कई अलग अलग जीवनों पर अलग अलग तरह से पड़ता है।
आपातकालीन स्वास्थ्य पर, क्योंकि बच्चे का अचानक बुख़ार, गर्भवती महिला का प्रसव, बूढ़े का दिल का दौरा, ये सब बारिश का इंतज़ार नहीं करते। और जब सड़क न हो, तो ये सब आपातकाल देरी से अस्पताल पहुंचते हैं, या नहीं पहुंचते। कितने अकालमौत इसी “देरी” का नतीजा हैं, यह आंकड़ा कोई नहीं रखता।
पढ़ाई पर, क्योंकि गांव से जुड़ा माध्यमिक स्कूल अक्सर पड़ोसी क़स्बे में होता है। बच्चे रोज़ साइकिल से जाते हैं। बारिश में रास्ता बंद, तो पढ़ाई बंद। हफ़्तों की अनुपस्थिति बच्चों को पीछे डाल देती है, और कई जगहों पर यह दीर्घकालिक स्कूल छोड़ने का कारण भी बनती है।
बाज़ार और आजीविका पर, क्योंकि गांव की उपज जब बारिश में मंडी नहीं पहुंच पाती, तो वह सड़ जाती है। दूध, सब्ज़ी, फल, ये सब समय के मामले हैं। हर बारिश में लाखों किसान अपनी उपज का एक हिस्सा सिर्फ़ रास्ते की वजह से खोते हैं।
सूचना और सरकारी सेवा पर, क्योंकि पटवारी, अधिकारी, और सरकारी सेवाएं जो बाहर से आती हैं, बारिश में रुक जाती हैं। राशन कार्ड का काम, पेंशन की प्रक्रिया, सूचना के आदान प्रदान, ये सब तीन महीनों के लिए ठहर जाते हैं।
मनरेगा और मज़दूरी पर, क्योंकि कई जगह मनरेगा का काम पास के ब्लॉक मुख्यालय से तय होता है, और जब रास्ता बंद हो तो काम की मांग दर्ज करवाना भी कठिन हो जाता है। एक मज़दूर जो रोज़ की दिहाड़ी पर निर्भर है, उसके लिए तीन महीने का यह व्यवधान ख़ुद एक ग़रीबी का ताला है।
ये सब असर मिलकर एक स्थिति बनाते हैं जिसमें मानसून केवल मौसम नहीं रह जाता, यह एक पूरी आर्थिक और सामाजिक रुकावट बन जाता है।
जो योजना ने किया, और जो रह गया
यह बात ईमानदारी से कहना ज़रूरी है। पिछले दो दशकों में, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना नाम की एक राष्ट्रीय परियोजना ने ग्रामीण सड़क निर्माण पर बहुत बड़ा काम किया है। बहुत से गांव जो पहले बिल्कुल बिना सड़क के थे, उन्हें पहली बार सड़क से जोड़ा गया। यह असली उपलब्धि है, और इसकी पहचान ज़रूरी है।
पर इस उपलब्धि की एक सीमा थी। योजना का मुख्य लक्ष्य था एक तय आबादी के ऊपर वाले गांवों को पहली बार सड़क से जोड़ना। यह काम बहुत हद तक पूरा हुआ। पर “हर मौसम” की सड़क बनाना, उसकी नियमित मरम्मत करना, उसकी जल निकासी को बनाए रखना, यह काम योजनाबद्ध रूप से कम हुआ। और छोटे बस्तियां, छोटे टोले, छोटी आदिवासी बस्तियां, जिनकी आबादी तय सीमा से कम थी, वे अक्सर इस योजना के दायरे में नहीं आईं।
मतलब, पहली परत का काम बहुत हुआ, पर मरम्मत और दूसरी परत का काम पीछे रह गया। और यह वही क्षेत्र है जहां बारिश के तीन महीने सबसे ज़्यादा भुगते जाते हैं।
यह किसी की लापरवाही नहीं, यह प्राथमिकता का प्रश्न है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। ग्रामीण सड़कों की यह दशा किसी एक की चूक नहीं है।
मरम्मत का काम राजनीतिक रूप से कम लोकप्रिय है। एक नई सड़क का उद्घाटन होता है, टेप कटता है, तस्वीर बनती है। एक पुरानी सड़क की मरम्मत में यह सब नहीं होता, इसलिए राजनीतिक प्रोत्साहन कम है। और जब प्रोत्साहन कम हो, तो ध्यान कम हो जाता है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह पैटर्न रहा है, उद्घाटन को प्राथमिकता, मरम्मत को नज़रअंदाज़। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस राजनीतिक तर्क में है जो दृश्य उपलब्धियों को अदृश्य देखभाल से ऊपर रखता है।
अरस्तू ने कहा था कि एक राज्य की पहचान उन चीज़ों की रोज़ की देखभाल से होती है जिन पर लोग रोज़ चलते हैं। एक देश जिसकी सड़कें बनती हैं पर साथ साथ नहीं चलतीं, उस देश की एकता एक मौसमी चीज़ बन जाती है, बारह महीनों की नहीं।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल नीतिगत प्राथमिकता बदलने में है। पर कुछ ठोस बातें एक नागरिक के तौर पर ज़रूर हैं।
पहली बात, अपने इलाक़े की मानसून में कटने वाली सड़कों की सूची बनाइए। आपके ब्लॉक में कौन कौन सी सड़क हर बारिश में बंद होती है, कितने दिन के लिए, और इसके कारण कौन से गांव कटते हैं। यह जानकारी अक्सर पंचायत के पास होती है, पर औपचारिक रूप से दर्ज नहीं होती। उसे दर्ज करवाइए।
दूसरी बात, अपने ज़िले की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की वार्षिक रिपोर्ट मांगिए। कितनी सड़क बनी, कितने पर मरम्मत हुई, कितनी “हर मौसम” वाली हुई, यह जानकारी सूचना के अधिकार से उपलब्ध है। यह आंकड़ा नीतिगत बहस में एक हथियार है।
तीसरी बात, अपने जनप्रतिनिधि से मरम्मत के लिए बजट की मांग कीजिए, सिर्फ़ नई सड़क के लिए नहीं। यह माप अक्सर चुनाव में नहीं आती, क्योंकि मरम्मत की तस्वीर बनती नहीं। पर इसकी मांग नागरिक से ही उठनी होगी।
चौथी बात, अगर आपके गांव में आपातकालीन स्थिति में सड़क की कमी से कोई नुक़सान हो, उसका दस्तावेज़ बनाइए, उसे पंचायत में दर्ज करवाइए, और स्थानीय मीडिया तक पहुंचाइए। यह दस्तावेज़ अकेले शायद कुछ न बदले, पर मिलकर ये बहुत सारे दस्तावेज़ एक पूरी कहानी बनाते हैं।
अंत में
एक देश जिसका विकास उसके सबसे पिछड़े गांव की पहुंच से नहीं नापा जाए, वह विकास अधूरा है। बारह महीने की सड़क एक सुविधा नहीं है, यह नागरिकता का सबसे बुनियादी ढांचा है। एक नागरिक जिसे अपने बच्चे के बुख़ार के समय भी अस्पताल नहीं पहुंचने दिया जा सकता, उसकी नागरिकता मौसमी है।
यह कहानी सिर्फ़ डामर और कंक्रीट की नहीं है। यह उस सोच की है जो “जोड़ना” और “जुड़ा रखना” को एक ही समझ लेती है। ये दो बहुत अलग काम हैं, और दूसरा अक्सर ज़्यादा कठिन है।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने ब्लॉक की मानसून में बंद होने वाली सड़कों का हिसाब रखना शुरू कीजिए। कितनी बंद होती हैं, कितने दिन के लिए, कितने गांव कटते हैं, और कितने आपातकालीन मामले उस दौरान देर से अस्पताल पहुंचते हैं। यह छोटा सा आंकड़ा है, पर इसमें एक पूरी ग्रामीण नागरिकता की असली कहानी छुपी है। और जिस दिन यह कहानी पर्याप्त नागरिकों के सामने होगी, उस दिन उद्घाटन से मरम्मत की तरफ़ नीति की दिशा बदलनी शुरू होगी।