अगर आप किसी भी शाम किसी भी मध्यमवर्गीय कॉलोनी के व्हाट्सऐप ग्रुप में झांकें, तो एक बात तय है। शिकायतें होंगी। सड़क की, ट्रैफिक की, बिजली की, टैक्स की, महंगाई की, भ्रष्टाचार की। आदमी दिन भर काम करता है, ईमानदारी से टैक्स भरता है, और बदले में जो चाहिए वह नहीं मिलता। बात सही भी है, और गुस्सा जायज़ भी।
लेकिन एक और बात है जो उसी आदमी के बारे में सच है, और जिस पर शायद ही कोई बात होती है। चुनाव के दिन वही व्यक्ति मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचता। नगर निगम की बैठकें खुली होती हैं, वह नहीं जाता। आरडब्ल्यूए के चुनाव में सिर्फ शिकायत करने वाले लोग खड़े हो जाते हैं, बाकी कहते हैं समय नहीं है। उसके इलाके के विधायक की हाज़िरी क्या है, उसने सदन में कौन से सवाल पूछे, यह वह नहीं जानता। उसके सांसद ने पिछले पांच साल में कौन से बिल पर क्या वोट दिया, इसमें उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है।
यह विरोधाभास भारत के सबसे ज़रूरी सवालों में से एक है। और इसे समझे बिना बाकी कुछ नहीं समझा जा सकता।
अरस्तू ने जो कहा था
ढाई हज़ार साल पहले अरस्तू ने एक किताब लिखी थी, राजनीति। उस किताब में उन्होंने एक बहुत सीधी बात कही थी, जिसे आज तक राजनीतिशास्त्र की सबसे गहरी अंतर्दृष्टि माना जाता है।
उन्होंने कहा कि हर समाज में तीन वर्ग होते हैं। बहुत अमीर, बहुत गरीब, और बीच वाले। अरस्तू का तर्क था कि सबसे स्थिर शासन वही होता है जहां बीच का वर्ग सबसे बड़ा हो, और सबसे सक्रिय भी हो। उनका कहना था कि बहुत अमीर शासन को अपनी सुविधा के लिए मोड़ देते हैं, और बहुत गरीब अपनी मजबूरी में जो कोई भी राहत दे, उसके पीछे चले जाते हैं। बीच वाला वर्ग, अगर वह जागरूक हो, अगर वह संवाद में हो, अगर वह सवाल पूछे, तो वही दोनों छोरों को नियंत्रण में रखता है।
अरस्तू ने यह भी कहा था कि अगर बीच का वर्ग चुप हो जाए, या राजनीति से दूर हो जाए, तो शासन अनिवार्य रूप से बिगड़ता है। दोनों छोरों में से कोई एक हावी हो जाता है, और बाकी सब बस तमाशा देखते हैं।
अब इसी बात को आज के भारत पर रखकर देखिए।
भारत का मध्यवर्ग और उसकी अजीब चुप्पी
पिछले तीन दशकों में भारत में एक बड़ा मध्यवर्ग खड़ा हुआ है। संख्या के अलग अलग अनुमान हैं, लेकिन यह तय है कि करोड़ों लोग आज ऐसी ज़िंदगी जीते हैं जो उनके माता पिता ने नहीं जी थी। पक्की नौकरी, अपना घर या किराये का फ्लैट, अपनी गाड़ी, बच्चों की निजी स्कूली शिक्षा, साल में एक छुट्टी।
यह वर्ग देश की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, और देश के कुल आयकर का अनुपातिक रूप से बहुत बड़ा हिस्सा देता है। यह वही वर्ग है जिसकी शिकायतें टीवी पर सबसे ज़्यादा सुनी जाती हैं, जिसके ट्वीट सबसे ज़्यादा रीट्वीट होते हैं, और जो लगभग हर सार्वजनिक बहस में आवाज़ देता है।
लेकिन इसी वर्ग की एक और पहचान है। चुनाव के दिन इसका मतदान प्रतिशत बाकी सब वर्गों से कम होता है। शहरी मध्यवर्गीय निर्वाचन क्षेत्रों में अक्सर मतदान 50 प्रतिशत के आसपास या उससे नीचे रहता है, जबकि ग्रामीण और गरीब बस्तियों में यह 70 से 80 प्रतिशत तक चला जाता है। यानी जो लोग सबसे ज़्यादा शिकायत करते हैं, वही लोग सबसे कम वोट देते हैं।
यह क्यों है। इसके पीछे कई कारण हैं, और ये कारण भारत के लोकतंत्र को समझने की कुंजी हैं।
चुप्पी के पीछे की सोच
पहला कारण है यह विश्वास कि वोट देने से कुछ नहीं बदलता। मध्यवर्गीय आदमी अक्सर कहता है कि सारे नेता एक जैसे हैं, इसलिए वोट देने का क्या फायदा। यह बहुत बड़ी फिसलन है। अगर सच में सारे एक जैसे हैं, तो भी जो थोड़े बहुत बेहतर हैं उन्हें चुनना बेहतर है। और अगर सब एक जैसे लगते हैं तो शायद इसलिए कि कोई भी वर्ग उन्हें अलग होने के लिए मजबूर नहीं कर रहा। यह दलील एक बहाना है, तर्क नहीं।
दूसरा कारण है यह आदत कि सरकारी सेवाओं से दूर रहो। मध्यवर्ग ने अपने लिए एक समानांतर देश बनाया है। सरकारी अस्पताल खराब है तो निजी अस्पताल जाते हैं। सरकारी स्कूल खराब है तो निजी स्कूल जाते हैं। सरकारी बिजली अनियमित है तो जनरेटर या इन्वर्टर लगवाते हैं। सरकारी पानी पीने लायक नहीं है तो आरओ लगवाते हैं। सरकारी पुलिस से बात नहीं होती तो निजी सोसायटी गार्ड पर निर्भर हो जाते हैं।
इस आदत का एक राजनीतिक असर है, जो आमतौर पर देखा नहीं जाता। जब एक पूरा वर्ग सरकारी सेवाओं से बाहर निकल जाता है, तो उसकी राजनीतिक दिलचस्पी भी उन सेवाओं को सुधारने में खत्म हो जाती है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि सरकारी स्कूल कैसा है, क्योंकि उसके बच्चे वहां नहीं पढ़ते। उसे फर्क नहीं पड़ता कि सरकारी अस्पताल कैसा है, क्योंकि वह बीमा खरीद चुका है। नतीजा यह कि गरीब का अनुभव और मध्यवर्ग का अनुभव इतना अलग हो जाता है कि एक ही देश में रहते हुए वे दो अलग देशों में रह रहे होते हैं।
तीसरा कारण है समय का बहाना। मध्यवर्गीय आदमी अक्सर कहता है कि मुझे काम पर जाना है, बच्चों को पढ़ाना है, ईएमआई भरनी है, राजनीति में पड़ने का समय कहां। यह बात सच भी है, और बहाना भी है। काम सबको करना है। ईएमआई बहुतों पर है। लेकिन हर पांच साल में एक दिन वोट के लिए, हर महीने एक घंटा अपने इलाके के बारे में पढ़ने के लिए, और कभी कभी एक शाम स्थानीय बैठक के लिए, यह समय निकाला जा सकता है। नहीं निकाला जाता, क्योंकि यह प्राथमिकता नहीं है।
चौथा कारण है यह सोच कि राजनीति गंदी चीज़ है। मध्यवर्गीय परिवारों में बच्चों को अक्सर सिखाया जाता है कि अच्छे बच्चे राजनीति में नहीं जाते। डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो, एमबीए करो, विदेश जाओ, स्टार्टअप करो, सब ठीक है। लेकिन राजनीति में मत जाना, वहां सब बेईमान हैं। यह सोच अपने आप में एक चक्र पैदा करती है। जब अच्छे लोग राजनीति में नहीं जाते, तो राजनीति वैसी ही रहती है। फिर लोग कहते हैं देखो, राजनीति गंदी है। यह आत्म पुष्टि करने वाला तर्क है, जिसे अरस्तू ने पहचान लिया होता।
जो खाली जगह बनती है, उसमें कौन भरता है
मध्यवर्ग की चुप्पी सिर्फ खुद उसके लिए नुकसान नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र की संरचना को बदल देती है।
अरस्तू की भाषा में, जब बीच का वर्ग पीछे हट जाता है, तो दोनों छोर हावी हो जाते हैं। एक तरफ बहुत साधन सम्पन्न लोग और संगठित हित समूह होते हैं, जो नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने का तरीका जानते हैं और जिनके पास इसके लिए समय भी है और संसाधन भी। दूसरी तरफ बहुत बड़ी संख्या में वे लोग होते हैं जो अपनी रोज़मर्रा की मजबूरी में जो भी राहत मिले उसी पर निर्भर हो जाते हैं, और जिनका वोट ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
इन दोनों के बीच जो खाली जगह है, वही जगह मध्यवर्ग की होनी चाहिए थी। लंबी सोच की जगह, ढांचागत सुधार की जगह, संस्थाओं को मज़बूत करने की जगह, जवाबदेही मांगने की जगह। यह वह वर्ग है जिसके पास साधन भी हैं, समय निकालने की क्षमता भी है, और सबसे ज़रूरी, जिसके वोट को किसी एक तरफ बंधी हुई वफादारी से नहीं तोला जा सकता।
जब यह वर्ग चुप रहता है, तो राजनीति दो छोरों की लड़ाई बन जाती है। बहुत साधन सम्पन्न बनाम बहुत मजबूर। बीच की आवाज़ खत्म। और जो शासन इस तरह चलता है, वह न ढांचागत सुधारों पर ध्यान देता है, न लंबी अवधि की योजनाओं पर। वह चुनावी समीकरण पर ध्यान देता है, क्योंकि चुनाव वही जीतेगा जो दोनों छोरों में से एक को साध ले।
यह अरस्तू की भविष्यवाणी का ही दूसरा रूप है, ढाई हज़ार साल बाद, भारत में सच होता हुआ।
एक उदाहरण से बात समझिए
मान लीजिए किसी शहर में कूड़े की समस्या है। नगर निगम कूड़ा नहीं उठा रहा। अब इस समस्या के तीन संभावित रास्ते हैं।
पहला रास्ता, मध्यवर्गीय कॉलोनी निजी कूड़ा उठाने वाली कंपनी रख लेती है, अपनी जेब से। समस्या उनकी तरफ से हल। बाकी शहर का कूड़ा वैसे ही पड़ा रहता है।
दूसरा रास्ता, गरीब बस्ती में लोग नगर निगम के पार्षद से जाकर मिलते हैं, धरना देते हैं, मीडिया को बुलाते हैं, अगले चुनाव में उसका वोट तय करते हैं इसी मुद्दे पर। पार्षद को मजबूरी में काम करना पड़ता है।
तीसरा रास्ता, मध्यवर्गीय निवासी पार्षद की हाज़िरी, उसकी जवाबदेही, और निगम के बजट पर लगातार सवाल पूछते हैं, आरटीआई लगाते हैं, स्थानीय बैठकों में जाते हैं, अगले चुनाव में सुनिश्चित करते हैं कि वोट प्रतिशत ज़्यादा हो। इससे ढांचागत बदलाव आता है, क्योंकि निगम को पता चलता है कि एक संगठित और लगातार बोलने वाला वर्ग उसे देख रहा है।
देश में पहला रास्ता सबसे ज़्यादा चलता है। तीसरा रास्ता सबसे कम। यह संयोग नहीं है।
मध्यवर्ग खुद से क्या पूछ सकता है
अगर आप यह लेख पढ़ रहे हैं और अपने आप को इस वर्ग में पाते हैं, तो कुछ सवाल अपने आप से पूछने लायक हैं।
पिछले चुनाव में आपने वोट दिया था या नहीं। अगर नहीं, तो क्यों।
आपके विधायक का नाम क्या है। आपके सांसद का नाम क्या है। उन्होंने पिछले पांच साल में आपके इलाके के लिए क्या किया, इसकी एक सूची आप बना सकते हैं या नहीं।
आपके इलाके का नगर निगम पार्षद कौन है। उसकी आख़िरी बैठक कब हुई थी, उसमें क्या तय हुआ।
आपके बच्चे के स्कूल या आपके मोहल्ले के सरकारी स्कूल के बीच कितना फासला है। आप उस सरकारी स्कूल के बारे में कुछ जानते हैं या नहीं।
अगर इनमें से ज़्यादातर सवालों का जवाब “पता नहीं” है, तो यह व्यक्तिगत कमी नहीं है। यह एक पूरे वर्ग की आदत है। और आदत बदली जा सकती है, अगर पहचानी जाए।
अंत में
लोकतंत्र वहां काम करता है जहां बीच का वर्ग सक्रिय हो। न केवल अपने हितों के लिए, बल्कि पूरे समाज की दिशा पर ध्यान देने के लिए। भारत में यह वर्ग आकार में बड़ा हो चुका है, साधन में सम्पन्न हो चुका है, लेकिन भागीदारी में सबसे पीछे है।
यह विरोधाभास हमेशा नहीं रह सकता। या तो यह वर्ग धीरे धीरे जागेगा और अपनी जगह लेगा, या यह वर्ग धीरे धीरे यह पाएगा कि उसकी शिकायतें सुनने वाला कोई नहीं है, क्योंकि उसने खुद कभी सुनने लायक आवाज़ नहीं उठाई।
अरस्तू ने पहले ही चेतावनी दे दी थी। जो वर्ग चुप रहता है, उसकी जगह कोई और ले लेता है। और जब जगह कोई और ले लेता है, तब शिकायत करने का अर्थ नहीं रह जाता।
बात सिर्फ वोट देने की नहीं है। बात अपने इलाके के बारे में जानने की है। अपने जनप्रतिनिधि का काम का हिसाब रखने की है। स्थानीय बैठकों में आवाज़ रखने की है। बच्चों को यह सिखाने की है कि राजनीति गंदी नहीं है, राजनीति में हमारी अनुपस्थिति गंदी है।
व्हाट्सऐप पर शिकायत आसान है। नगर निगम की बैठक में सवाल पूछना मुश्किल है। लोकतंत्र दूसरे रास्ते पर बनता है, पहले पर नहीं।
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