खेत के एक कोने में एक छोटी सी आकृति है। आठ साल का बच्चा। हाथ में एक छोटी सी छड़ी है, और वह बकरियों को एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हांक रहा है। दिन का समय है। उसी समय, उसके गांव के स्कूल में दूसरी कक्षा की पढ़ाई चल रही है। उसका नाम स्कूल के रजिस्टर में दर्ज है। पर वह वहां नहीं है।
उसकी माँ कहती है, “क्या करें, बकरियां तो किसी को संभालनी हैं। उसका भाई पंद्रह साल का है, वह दिहाड़ी पर गया है। पिता दूसरे राज्य में काम पर हैं। मैं घर का काम कर रही हूं। उसके अलावा कोई नहीं।”
बच्चे से पूछिए, स्कूल जाना अच्छा लगता है क्या। वह कहता है, “हां, पर वहां पढ़ाई कुछ ख़ास नहीं होती। टीचर अक्सर नहीं आते। और जो पढ़ाते हैं, वह मुझे समझ नहीं आता।”
यह बातचीत किसी एक बच्चे की नहीं है। यह कहानी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में, लाखों परिवारों में, हर सुबह दोहराई जाती है। और इस कहानी के पीछे दो सच्चाइयां हैं, जिन्हें साथ देखे बिना समस्या नहीं समझ आती।
35 लाख बच्चे जो स्कूल में नहीं हैं
एक हाल के अनुमान के अनुसार, छह से चौदह साल की उम्र के लगभग पैंतीस लाख बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं। यह संख्या बहुत बड़ी है, और यह उन देशों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है जो अपने आप को विकासशील कहते हैं।
स्कूल से बाहर होने के कई कारण हैं, जो आपस में जुड़े हैं।
पहला, ग़रीबी और बाल मज़दूरी। एक छोटा परिवार जिसकी रोज़ की आमदनी पर निर्भरता है, उसके लिए हर सक्षम हाथ रोज़ का सहारा है। आठ साल का बच्चा बकरियां चरा सकता है, खेत में बीज बो सकता है, घर के छोटे काम कर सकता है। यह काम अगर वह नहीं करेगा, तो परिवार की रोज़ी पर असर पड़ेगा। यह क्रूर सच है, और इसे नैतिक उपदेश से नहीं बदला जा सकता।
दूसरा, बाल विवाह, ख़ासकर लड़कियों के लिए। लड़कियों के लिए स्कूल छोड़ने का सबसे बड़ा कारण अक्सर शादी की तैयारी है। एक हाल का आंकड़ा बताता है कि लगभग उनतीस प्रतिशत लड़कियां प्राथमिक स्कूल पूरा करने से पहले स्कूल छोड़ देती हैं। यह आंकड़ा अपने आप में एक राष्ट्रीय शर्म है।
तीसरा, अधूरा स्कूल। बहुत से ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचा अधूरा है, टॉयलेट नहीं हैं, ख़ासकर लड़कियों के लिए, पीने का पानी नहीं है, शिक्षक अक्सर अनुपस्थित होते हैं। एक बच्चा जो ऐसे स्कूल जाए, और जिसे कुछ सीखने को न मिले, उसके परिवार को यह तर्क देना कठिन हो जाता है कि उसे स्कूल भेजने का क्या फ़ायदा।
चौथा, स्वास्थ्य और पोषण। एक बच्चा जो भूखा है, थका हुआ है, या नियमित बीमार रहता है, वह स्कूल में बैठ नहीं पाएगा, और बैठेगा तो सीख नहीं पाएगा। यह कारण अदृश्य है, पर शायद सबसे ज़्यादा प्रभावी है।
पांचवां, और हाल का, महामारी की लंबी छाया। 2020 और 2021 की लंबी स्कूल बंदी ने ग्रामीण बच्चों पर सबसे गहरा असर डाला। शहरी बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं से कुछ हद तक जुड़े रह सके। ग्रामीण बच्चों के पास न स्मार्टफ़ोन था, न नियमित इंटरनेट, न माता पिता की वह क्षमता जो उनके सीखने में सहारा दे सके। दो साल की पढ़ाई बीच में रुक गई, और जो बच्चे उस दौरान स्कूल से अलग हुए, उनमें से बहुत वापस लौटे ही नहीं। यह क्षति आंकड़ों में अभी पूरी तरह दर्ज नहीं हुई है, पर ज़मीन पर हर शिक्षक इसे महसूस करता है।
ये पांच कारण मिलकर वह स्थिति बनाते हैं जिसमें एक बच्चा स्कूल छोड़ता है, या स्कूल जाते हुए भी सीख नहीं पाता।
25 प्रतिशत जो स्कूल में हैं, पर पढ़ नहीं पा रहे
यहां एक और सच्चाई आती है, जो शायद उससे भी ज़्यादा चिंताजनक है।
स्वतंत्र संगठनों के नियमित अध्ययन यह दिखाते हैं कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के बहुत से बच्चे, जो स्कूल जा रहे हैं, उन्हें भी बुनियादी पढ़ना और गणित नहीं आता। एक अनुमान के अनुसार, तीन साल स्कूल जाने वाले लगभग पच्चीस प्रतिशत बच्चे एक सरल हिंदी का वाक्य ठीक से नहीं पढ़ पाते। पचास प्रतिशत के आसपास बच्चे एक सरल गणित का सवाल नहीं हल कर पाते।
यह आंकड़ा सिर्फ़ ख़राब नहीं है, यह विनाशकारी है। क्योंकि स्कूल का मूल काम सीखना सिखाना है। अगर एक बच्चा तीन साल स्कूल जाकर भी एक वाक्य नहीं पढ़ पा रहा, तो वह स्कूल अपना मूल काम नहीं कर रहा।
इसके कारण भी कई हैं। शिक्षकों की कमी, उनका अपर्याप्त प्रशिक्षण, बहुत बड़ी कक्षाएं जिनमें एक शिक्षक पर साठ से सौ बच्चे, और पाठ्यक्रम जो बच्चे की वास्तविक क्षमता से बहुत आगे चल रहा होता है। एक बच्चा जो पहली कक्षा में अक्षर भी नहीं सीख पाया, उसे दूसरी कक्षा में वाक्य पढ़ाने की कोशिश हो रही है। यह व्यवस्थागत असफलता है।
और इसका एक छुपा हुआ पहलू भी है। शहरी मध्यवर्गीय परिवार जब देखते हैं कि सरकारी स्कूल का स्तर इतना गिर गया है, तो वे अपने बच्चों को निजी स्कूल में डाल देते हैं। नतीजा यह है कि सरकारी स्कूल में अब अधिकांश वही बच्चे रह जाते हैं जिनके पास और कोई विकल्प नहीं। और जिस स्कूल से उन परिवारों ने हाथ खींच लिया है जिनके पास आवाज़ है, वहां सुधार की मांग भी कमज़ोर पड़ जाती है। यह दो भारत वाली समस्या की एक छुपी हुई परत है, और इसका सबसे बड़ा नुक़सान उन्हीं बच्चों को है जो स्कूल से बाहर हो जाते हैं।
जो बच्चा पीछे रह जाता है, और जिसे कोई अलग से सहारा नहीं मिलता, वह धीरे धीरे स्कूल से अपना मन हटाता जाता है। चौथी या पांचवीं कक्षा तक पहुंचते पहुंचते वह औपचारिक रूप से स्कूल छोड़ देता है। और तब वह उन पैंतीस लाख की संख्या में जुड़ जाता है।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह उपेक्षा है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। ग्रामीण शिक्षा की यह दशा किसी एक की चूक नहीं है।
बहुत से शिक्षक हैं जो अपनी क्षमता और संसाधन से बहुत आगे जाकर बच्चों को पढ़ाते हैं। बहुत से सरकारी कर्मचारी हैं जो ईमानदारी से काम करते हैं। समस्या व्यक्तियों में नहीं है, समस्या उस लंबी चली आ रही उपेक्षा में है जो शिक्षा को राष्ट्रीय बजट का एक छोटा हिस्सा बनाए रखती है, और जो शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम सुधार, और बुनियादी ढांचे पर ज़रूरी निवेश नहीं करती।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार ने शिक्षा पर बात की, बजट बढ़ाने का वादा किया, और अधिकांश ने उस वादे का बड़ा हिस्सा पूरा नहीं किया। समस्या नीयत में नहीं है, समस्या उस प्राथमिकता में है जो अल्पकालिक राजनीतिक लाभ देने वाली योजनाओं को दीर्घकालिक मानव पूंजी से ऊपर रखती है।
प्लेटो ने कहा था कि शिक्षा वह नींव है जिस पर एक नागरिक खड़ा होता है। एक बच्चा जिसे पढ़ना नहीं आता, वह एक नागरिक के तौर पर अधूरा रह जाएगा, चाहे आगे जीवन में कुछ भी हो। और जब लाखों बच्चे इस स्थिति में हों, तो पूरा देश एक पीढ़ी अधूरी रह जाता है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका मुख्य हल नीतिगत निवेश और शिक्षक प्रशिक्षण में है। पर कुछ ठोस बातें एक नागरिक के तौर पर ज़रूर हैं।
पहली बात, और सबसे प्रत्यक्ष, अगर आपके आसपास कोई बच्चा है, चाहे आपका हो, पड़ोसी का हो, या किसी मेहनतकश परिवार का, उसे एक छोटा सा पढ़ने का परीक्षण कीजिए। एक सरल हिंदी का वाक्य, उससे पढ़वाइए। एक सरल गुणा या भाग का सवाल पूछिए। अगर वह नहीं कर पाए, तो उसकी कक्षा और उसके स्कूल का नाम याद रखिए। यह छोटा सा कार्य आपको ख़ुद ज़मीन का अंदाज़ा देगा।
दूसरी बात, अपने ब्लॉक के शिक्षा अधिकारी के पास जाइए, और अपने ब्लॉक के सरकारी स्कूलों के बुनियादी साक्षरता के आंकड़े मांगिए। यह जानकारी सार्वजनिक है, या होनी चाहिए। पूछिए। यह सवाल जिस दिन हर ब्लॉक में पूछा जाएगा, उस दिन इस आंकड़े को सुधारना प्राथमिकता बनेगी।
तीसरी बात, अगर आप किसी समूह या संगठन से जुड़े हैं, तो स्थानीय स्कूलों में पढ़ने के पूरक कार्यक्रम चलाने की संभावना देखिए। बहुत से शहर और गांव में नागरिक समूहों ने इस तरह के “पढ़ाई के बाद” वाले कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए हैं, और इनका असर सच में होता है।
चौथी बात, बाल विवाह को सिर्फ़ क़ानूनी अपराध नहीं, सामाजिक मुद्दे की तरह उठाइए। अगर आपके आसपास किसी लड़की के विवाह की तैयारी हो रही है जिसकी पढ़ाई अधूरी है, तो उस परिवार से बातचीत में, उस लड़की के अपने अधिकार के बारे में बात कीजिए। यह कठिन बातचीत है, पर इससे बचना उस लड़की का भविष्य छीनना है।
अंत में
एक देश जो अपने पैंतीस लाख बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाता, और जो स्कूल में हैं उनमें से एक चौथाई को पढ़ना नहीं सिखा पाता, उस देश की कोई भी आर्थिक उपलब्धि अधूरी है। क्योंकि अगले बीस साल की पीढ़ी आज इन्हीं कक्षाओं में बैठी है, और इन्हीं की क्षमता पर भविष्य का देश खड़ा होगा।
जो बच्चा आज खेत में बकरियां चरा रहा है, उसके बीस साल बाद के अनुभव के लिए हम सब ज़िम्मेदार होंगे। और जो बच्चा आज स्कूल में बैठा है पर एक वाक्य नहीं पढ़ पा रहा, उसकी असफलता हमारी असफलता है, उसकी नहीं।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने पड़ोस के एक बच्चे से एक वाक्य पढ़वाना शुरू कीजिए। दूसरी कक्षा का बच्चा, तीसरी कक्षा का बच्चा, चौथी कक्षा का बच्चा। उसे जो आता है और जो नहीं आता, वह आंकड़ा अपने पास रखिए। यह छोटा सा सर्वेक्षण है, पर इसमें एक पूरी शिक्षा व्यवस्था की असली कहानी छुपी है। और जिस दिन यह कहानी पर्याप्त नागरिकों के सामने होगी, उस दिन शिक्षा के सरकारी दावों और ज़मीनी अनुभव की दूरी कम होनी शुरू होगी।