Baklolz | बकलोल्ज़

ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

जलाऊ लकड़ी का धुआं, और एक औरत की पूरी ज़िंदगी

सुबह के साढ़े पांच बजे का समय है। एक गांव की एक मिट्टी की रसोई। एक महिला घुटनों के बल बैठी है, एक चूल्हे के सामने। चूल्हे में लकड़ी है, थोड़ी सी कोई पुरानी पत्तियां, और थोड़ा सा गोबर का उपला। आग धीरे धीरे जल रही है। पीछे से धुआं उठ रहा है, और रसोई के ऊंचे कोने तक भर रहा है। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि कोई खिड़की नहीं है, सिर्फ़ एक छोटा सा दरवाज़ा।

उसकी आंखों में पानी है। पिछले बीस साल से यह उसकी हर सुबह है। उसे यह आदत हो गई है, इस अर्थ में कि वह बिना रोए काम कर लेती है, पर आदत होने का मतलब यह नहीं कि उसका शरीर इसे सह रहा है। उसकी सांस अब बाक़ी महिलाओं से छोटी है, उसकी छाती में अक्सर खांसी रहती है, और उसकी आंखों का सफ़ेद हिस्सा थोड़ा हल्का पीला हो गया है।

उसकी सास इसी तरह गई थी, बीस साल पहले। बहुत से डॉक्टर तब “बूढ़ी थीं, चली गईं” कहकर बात ख़त्म कर देते थे। आज विज्ञान बता रहा है कि उसकी मौत और इस धुएं का सीधा रिश्ता था। और अब उसकी अपनी पीढ़ी उसी रास्ते पर चल रही है।

यह एक महिला की कहानी नहीं है। यह देश की उन करोड़ों महिलाओं की कहानी है, जिनकी पूरी ज़िंदगी एक चूल्हे के सामने बीतती है, और जिनके शरीर का सबसे बड़ा बोझ एक ऐसा धुआं है, जिसे हम सरकारी आंकड़ों में नहीं गिनते।

“विद्युतीकरण” के बाद भी क्यों लकड़ी

यहां पहले एक भ्रम तोड़ना ज़रूरी है, क्योंकि बहुत से लोग सोचते हैं कि बिजली पहुंच गई तो रसोई का धुआं ख़त्म हो गया होगा।

बिजली रसोई के लिए बहुत कम इस्तेमाल होती है। रोज़ का खाना पकाने के लिए या तो रसोई गैस चाहिए, या लकड़ी, या उपला, या मिट्टी का तेल। बिजली से चूल्हा चलाना देश के ज़्यादातर परिवारों के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं है, और तकनीकी रूप से भी कई जगह बिजली की आपूर्ति इतनी अनियमित होती है कि उस पर रोज़ की रसोई नहीं चल सकती।

पिछले एक दशक में, उज्ज्वला नाम की एक योजना के तहत करोड़ों परिवारों को रसोई गैस का कनेक्शन दिया गया। यह एक बड़ा क़दम था, और इसकी पहचान ज़रूरी है। पर इस योजना का एक छुपा हुआ पक्ष यह है कि कनेक्शन देना एक बात है, और सिलेंडर का दोबारा भरवाना दूसरी।

रसोई गैस का सिलेंडर भरवाने का जो ख़र्च है, वह एक छोटे ग्रामीण परिवार के लिए हर महीने एक बड़ी रक़म है। बहुत से परिवारों ने पहली बार जब कनेक्शन लिया, तब कुछ महीने इस्तेमाल किया, फिर ख़र्च न उठा पाने के कारण वापस लकड़ी पर लौट गए। आंकड़ों में उनके पास “गैस कनेक्शन” है, ज़मीन पर उनकी रसोई में आज भी लकड़ी जलती है।

मतलब, कनेक्शन और उपयोग में फिर वही फ़र्क़ है जो हम बार बार देखते हैं। और इस फ़र्क़ की क़ीमत सबसे ज़्यादा महिलाओं की सेहत पर पड़ती है।

धुएं की क़ीमत: एक छिपी हुई बीमारी

विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई स्वतंत्र अध्ययनों ने यह बार बार दिखाया है कि बंद रसोई में लकड़ी, उपला, या मिट्टी के तेल से जलने वाली आग का धुआं, सेहत के लिए बहुत हानिकारक है। उसका असर कई स्तरों पर पड़ता है।

श्वसन तंत्र पर। चूल्हे का धुआं फेफड़ों के लिए बहुत बारीक कणों का स्रोत है, जो आम सिगरेट के धुएं से कई गुना ज़्यादा हानिकारक हो सकते हैं। बंद रसोई में रोज़ कई घंटे बिताने वाली महिला, बिना सिगरेट पिए ही पुरानी श्वसन रोगों की शिकार होती है।

हृदय और रक्त वाहिनी तंत्र पर। लंबे समय तक इस धुएं के संपर्क में रहने वाली महिलाओं में उच्च रक्तचाप, हृदय की कमज़ोरी, और दिल का दौरा पड़ने का जोखिम स्पष्ट रूप से ज़्यादा होता है। यह आंकड़े सिर्फ़ अनुमान नहीं हैं, ये नियंत्रित अध्ययनों में सिद्ध हुए हैं।

आंखों पर। चूल्हे के सामने बीस साल बैठने वाली महिलाओं में मोतियाबिंद की दर ग़ैर सम्पर्क में रहने वाली महिलाओं से कई गुना ज़्यादा है।

छोटे बच्चों पर। माँ जब चूल्हे पर हो, तो अक्सर छोटा बच्चा उसकी गोद में या पास में होता है। उस बच्चे के विकसित हो रहे फेफड़ों पर असर पड़ता है, जो जीवन भर रहता है।

ये सब असर मिलकर एक छुपा हुआ रोग बोझ बनाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य आंकड़ों में अक्सर “ख़राब सेहत”, “बुढ़ापे की कमज़ोरी”, या “अज्ञात बीमारी” के नाम से दर्ज होते हैं। उनके पीछे की असली वजह को कभी नाम नहीं मिलता।

समय की क़ीमत: आधी ज़िंदगी जो दर्ज नहीं होती

एक और कीमत है जो धुएं की कहानी का हिस्सा है, और जिसे हम कम मानते हैं। यह कीमत है समय की।

एक ग्रामीण महिला जो लकड़ी पर रसोई पकाती है, उसे यह लकड़ी कहीं से लानी होती है। आज के समय में जब आसपास के जंगल कम हो रहे हैं, यह लकड़ी अक्सर बहुत दूर से लानी होती है। बहुत सी महिलाएं हर हफ़्ते कई घंटे, कई बार पूरे दिन, लकड़ी की तलाश में बिताती हैं।

इसके बाद रसोई का असली काम। चूल्हा जलाना धीमी प्रक्रिया है। आग पकड़ने में समय लगता है, सही तापमान तक पहुंचने में समय लगता है, बीच में राख निकालनी होती है। एक भोजन जो रसोई गैस पर तीस मिनट में पक सकता है, चूल्हे पर दो घंटे में पकता है।

इन सब को जोड़ें, तो एक ग्रामीण महिला अपने हर हफ़्ते के तीस चालीस घंटे सिर्फ़ ईंधन और रसोई से जुड़े कामों में देती है। यह समय उसके अपने आराम का नहीं है, उसकी सेहत के लिए नहीं है, उसकी पढ़ाई या काम के लिए नहीं है। यह समय एक छुपा हुआ श्रम है, जिसे न मज़दूरी मिलती है, न मान्यता।

अर्थशास्त्र में इस तरह के काम को “अवैतनिक देखभाल श्रम” कहा जाता है। पूरी दुनिया में महिलाएं इस काम का बड़ा हिस्सा करती हैं, और हमारे यहां यह अनुपात और बड़ा है। जब तक यह श्रम दिखाई नहीं देता, तब तक इसे कम करने की कोई नीति भी पूरी नहीं हो सकती।

यह किसी की उपेक्षा नहीं, यह आधी आबादी की अदृश्यता है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। चूल्हे का धुआं, इसकी सेहत की क़ीमत, और इस पर लगने वाला समय, ये सब बातें किसी एक की चूक से नहीं हैं।

ये सब बातें एक पुरानी आदत का नतीजा हैं जो महिलाओं के काम को “घरेलू” मानती है, और इसलिए सार्वजनिक नीति का विषय नहीं मानती। एक रसोई में बीस साल बैठी महिला की धीमी मौत आंकड़ों में नहीं आती, क्योंकि उसका कारण रसोई नहीं, कोई अन्य “बीमारी” दर्ज होता है। एक महिला का तीस घंटे का साप्ताहिक श्रम कहीं नहीं गिना जाता, क्योंकि वह “उसका ही तो काम है” वाली पुरानी सोच के तहत आता है।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह अदृश्यता बनी रही है। समस्या नीयत में नहीं है, समस्या उस पारंपरिक सोच में है जो आधी आबादी के रोज़ के अनुभव को कभी राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बनाती।

अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक राज्य की स्वस्थता उसकी सबसे कमज़ोर परत की देखभाल से नापी जाती है। पर उससे भी पहले की बात यह है कि राज्य देखे किसको। एक देश जो अपनी आधी आबादी की रोज़ की मेहनत को नहीं देखता, उसकी सेहत के असर को नहीं नापता, उसका बजट महिलाओं के सबसे बुनियादी अनुभव के लिए नहीं बनता।

क्या किया जा सकता है

यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल आर्थिक, सामाजिक, और तकनीकी सब स्तर पर है। पर कुछ ठोस बातें एक नागरिक के तौर पर ज़रूर हैं।

पहली बात, उज्ज्वला योजना की असली प्रगति का आंकड़ा मांगिए। आपके ज़िले में कितने कनेक्शन दिए गए, कितने परिवार नियमित रूप से सिलेंडर भरवा रहे हैं, कितने वापस लकड़ी पर लौट गए। यह आंकड़ा सूचना के अधिकार से उपलब्ध है। केवल कनेक्शन की संख्या से नीति की सफलता नहीं नापी जा सकती, सिलेंडर के नियमित भरवाने की दर असली पैमाना है।

दूसरी बात, अगर आप किसी ग्रामीण परिवार से जुड़े हैं, या वहां रहते हैं, तो अपनी रसोई की हवा पर ध्यान दीजिए। एक छोटा सा वेंटिलेशन, एक खिड़की, एक एग्ज़ॉस्ट पंखा, ये सब कुछ छोटे क़दम हैं जो भारी अंतर ला सकते हैं। यह सब भी संसाधन की मांग है, पर शुरुआत है।

तीसरी बात, अपनी परिवार की महिलाओं के समय का हिसाब रखिए, और उसका सम्मान कीजिए। यह एक छोटा बदलाव लगता है, पर परिवार के स्तर पर यह दृष्टि बदले, तो उसका असर पीढ़ियों में दिखता है। बच्चियों को यह सीखाना कि रसोई के समय को भी एक काम की तरह माना जाए, यह उन्हें अपनी अगली पीढ़ी के लिए अलग प्राथमिकता बनाने की शक्ति देता है।

चौथी बात, अपने जनप्रतिनिधि से रसोई गैस की दीर्घकालिक सब्सिडी पर सवाल पूछिए। एक उज्ज्वला कनेक्शन का दीर्घकालिक मूल्य तभी है जब हर महीने सिलेंडर भरवाना संभव हो। अगर इसकी क़ीमत एक ग़रीब परिवार के पहुंच से बाहर है, तो पूरी योजना का असली असर अधूरा है।

अंत में

एक देश की असली कहानी उसके सरकारी पन्नों में नहीं, उसकी रसोइयों में लिखी है। और इन रसोइयों की कहानी आधे आबादी की है, जिसे हमने सदियों से देखना सीखा नहीं।

एक महिला जो हर सुबह धुएं में बैठती है, उसकी सेहत हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य चर्चा का हिस्सा नहीं है। उसका साप्ताहिक तीस घंटे का श्रम हमारे आर्थिक आंकड़ों में नहीं है। उसकी पच्चीस साल की चुपचाप सहन की हुई बीमारियां हमारे रोग बोझ की रिपोर्ट में नहीं हैं। यह अदृश्यता अपने आप में एक नीतिगत विफलता है।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने परिवार की बूढ़ी महिलाओं से उनके ज़मीनी अनुभव के बारे में पूछना शुरू कीजिए। पच्चीस साल पहले रसोई कैसी थी, धुआं कितना था, सांस कैसी थी। यह बातचीत सिर्फ़ एक स्मरण नहीं है, यह एक नागरिक दस्तावेज़ है। और जब बहुत से लोग ये दस्तावेज़ बनाएंगे, तब वह अदृश्य कहानी पहली बार राष्ट्रीय बहस में आने लगेगी।

Baklolz | बकलोल्ज़

बकलोल्ज़ एक हिंदी पत्रिका है। शोर के बीच ठहरी हुई सोच, हर लेख एक नागरिक सवाल, बिना खेमेबाज़ी।

साथ चलिए

© 2026 Baklolz | बकलोल्ज़