एक गांव है, देश के किसी कोने में। पांच साल पहले एक बड़ी ख़बर आई थी कि इस गांव में बिजली पहुंच गई। फीता काटा गया था, तस्वीरें छपी थीं, और राज्य के सरकारी काग़ज़ में यह गांव “विद्युतीकृत” की सूची में जोड़ा गया था। मतलब, अब इस गांव के सब घरों में बिजली है।
आज इस गांव की एक रात देखिए। शाम सात बजे लाइन गई। आठ बजे आई, साढ़े आठ फिर गई। नौ बजे एक हल्की बत्ती जली, जो आधे घंटे चली। उसके बाद बारह बजे तक पूरा अंधेरा। दस साल का बच्चा अपनी मां की मोमबत्ती की रौशनी में बस्ता खोलकर पढ़ रहा है। पंद्रह साल की बेटी अपने मोबाइल की टॉर्च की रौशनी में अगले दिन के स्कूल के लिए तैयार होने की कोशिश कर रही है। माता पिता थके हुए हैं, क्योंकि दिन भर का खाना पकाना धुएं में हुआ था, उसमें भी आधा बिजली के बंद रहने के कारण।
यह वही गांव है जो सरकारी काग़ज़ में “100 प्रतिशत विद्युतीकृत” है। यानी काग़ज़ पर बिजली है, ज़मीन पर अंधेरा है।
घोषणा और मीटर के बीच की यह दूरी, यही इस लेख की कहानी है। और यह दूरी देश के लाखों गांवों में, और हज़ारों मोहल्लों में, हर रात एक अलग रूप में दिखती है।
“बिजली पहुंची” का असली मतलब
पहले इस बात को समझ लीजिए, क्योंकि यहीं से समस्या शुरू होती है।
जब सरकारी काग़ज़ में किसी गांव को “विद्युतीकृत” कहा जाता है, तो उसका मतलब आम तौर पर यह नहीं होता कि वहां हर घर में हर समय बिजली है। उसका मतलब बहुत कम होता है। मूल परिभाषा कुछ इस तरह की है, गांव की सीमा के भीतर बिजली का खंभा और तार पहुंच गया है, एक सार्वजनिक संस्थान जैसे स्कूल या पंचायत भवन में बिजली कनेक्शन है, और गांव के दस प्रतिशत घरों में कनेक्शन है। बस। इतने के साथ गांव “विद्युतीकृत” मान लिया जाता है।
मतलब, अगर एक गांव में सौ घर हैं, और दस घरों में मीटर लगा है, और बाक़ी नब्बे घरों में नहीं, तब भी वह गांव सरकारी सूची में “विद्युतीकृत” है। यह कोई धोखा नहीं है, यह एक प्रशासनिक परिभाषा है। पर इस परिभाषा और एक नागरिक की उम्मीद के बीच जो दूरी है, वह बहुत बड़ी है।
एक आम नागरिक जब सुनता है कि उसके गांव में बिजली पहुंच गई, तो वह यह समझता है कि अब उसके घर में चौबीस घंटे बत्ती जलेगी। उसकी पत्नी पंखा चला सकेगी, उसके बच्चे रात में पढ़ सकेंगे। यह उम्मीद ग़लत नहीं है, बल्कि यही उम्मीद होनी चाहिए। पर परिभाषा और उम्मीद के बीच यह जो खाई है, वह नागरिक के लिए सबसे थका देने वाली है।
जुड़ाव और उपभोग में फ़र्क़
मान लीजिए कि आपके घर में मीटर लग गया है। अब क्या असली बिजली मिलने लगी? यह भी एक अलग सवाल है।
पहली कमी, घंटे की। बहुत से ग्रामीण इलाक़ों में बिजली दिन में कुछ घंटे ही आती है। अधिकतर रात के समय कटौती होती है, और कई बार दिन में भी लंबी कटौती होती है। आधिकारिक रिपोर्ट में जो “औसत आपूर्ति” का आंकड़ा है, वह असली अनुभव से बहुत दूर होता है, क्योंकि वह आंकड़ा कई जगहों से जोड़कर औसत निकालता है, और औसत किसी के साथ नहीं रहता।
दूसरी कमी, गुणवत्ता की। जो बिजली आती है, अक्सर उसका वोल्टेज इतना कम या इतना अनियमित होता है कि एक पंखा ठीक से नहीं चलता, एक बल्ब टिमटिमाता है, और एक टीवी कई बार ख़राब हो जाता है। ज़्यादा वोल्टेज भी ख़तरनाक है, कम भी। बिजली के होने का मतलब यह नहीं कि उसका इस्तेमाल हो सके।
तीसरी कमी, बिल और जमा राशि की। कई गांवों में कनेक्शन तब मिलता है जब परिवार पहले एक भारी जमा राशि चुकाए। यह राशि एक छोटे किसान के लिए महीनों की मज़दूरी के बराबर हो सकती है। फिर बिल आता है, और बिल कई बार उन घंटों का भी होता है जिसमें बिजली थी ही नहीं, क्योंकि मीटर की रीडिंग ठीक से नहीं की जाती। बिल नहीं चुकाया, तो कनेक्शन कट जाता है। यानी जुड़ने का अधिकार आधिकारिक है, पर जुड़े रहने का अधिकार आर्थिक है।
ये तीनों मिलकर वह बनाते हैं जिसे हम कहते हैं, “बिजली है, पर है नहीं।”
कौन हारता है, सबसे ज़्यादा
बिजली की अनियमितता का असर सब पर एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग सबसे ज़्यादा हारते हैं।
छात्र, क्योंकि उनकी पढ़ाई का सबसे बड़ा समय शाम और रात का होता है। एक बच्चा जो दिन भर खेत में या स्कूल में था, उसकी होमवर्क की रौशनी रात की होती है। अगर वह रौशनी मोमबत्ती है, या मोबाइल की टॉर्च है, तो उसकी आंखें ख़राब होती हैं, उसकी पढ़ाई धीमी होती है, और लंबे समय में वह पीछे रह जाता है। शहर का बच्चा एक अलग गति से पढ़ता है, गांव का अलग। यह “अलगता” किसी की क्षमता का नहीं, बिजली के स्विच का है।
महिलाएं, क्योंकि रसोई का काम, और शाम के बाद के बहुत से काम, उन्हीं के ज़िम्मे होते हैं। अंधेरे में खाना पकाना, धुएं में बैठना, और गर्मी में बिना पंखे के काम करना, यह सब उनके स्वास्थ्य पर असर डालता है। यह एक छुपा हुआ बोझ है, जिसका कोई आंकड़ा नहीं।
छोटे व्यवसाय, क्योंकि एक छोटी सी आटा चक्की, एक तेल का कोल्हू, एक छोटा सा कारख़ाना, ये सब बिजली पर निर्भर हैं। जब बिजली अनियमित होती है, तो छोटा व्यवसाय खड़ा नहीं हो पाता। यह उस “आर्थिक प्रगति” को भीतर से तोड़ता है, जिसकी बात सरकारी काग़ज़ में बार बार होती है।
सरकारी सेवा, क्योंकि अस्पताल के लिए शीत श्रृंखला चाहिए, ताकि टीके और दवाएं सुरक्षित रहें। स्कूल में रौशनी चाहिए, ताकि पढ़ाई हो सके। पुलिस चौकी में कंप्यूटर चलना चाहिए, ताकि शिकायत दर्ज हो। अनियमित बिजली इन सबको कमज़ोर करती है, और यह कमज़ोरी फिर नागरिक पर ही पड़ती है।
यह किसी एक की कमी नहीं, यह आर्थिक ढांचा है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। बिजली की यह दशा किसी एक कंपनी, एक सरकार, या एक अधिकारी की कमी नहीं है।
इसके पीछे एक पूरी आर्थिकी है। बिजली बनाने का ख़र्च है, उसे ले जाने का ख़र्च है, उसे बांटने का ख़र्च है। बिजली बांटने वाली कंपनियां, जिन्हें डिसकॉम कहते हैं, अधिकांश राज्यों में लंबे समय से घाटे में हैं। एक तरफ़ कुछ क्षेत्रों में बिजली मुफ़्त या सस्ती देनी होती है, दूसरी तरफ़ बिजली बनाने का ख़र्च बढ़ता जाता है। इस घाटे को कौन भरे, यह सवाल हर सरकार के सामने आता है, और किसी सरकार के पास इसका पूरा जवाब नहीं रहा।
घाटे की कंपनी अच्छा निवेश नहीं कर सकती, अच्छी मरम्मत नहीं कर सकती, अच्छा कर्मचारी नहीं रख सकती। नतीजा यह कि लाइन गिरती है, ट्रांसफ़ार्मर जलते हैं, मरम्मत में दिन लगते हैं, और ग्राहक अंधेरे में बैठा रहता है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार ने कोशिश की, कुछ रास्तों से, पर बुनियादी ढांचे की यह कमी पूरी तरह नहीं भर पाई। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस आर्थिक डिज़ाइन में है जो बिजली को एक राजनीतिक उपहार और एक तकनीकी सेवा, दोनों एक साथ बनाने की कोशिश करती है, और इसलिए दोनों में आधी आधी सफल होती है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल सरकार और बाज़ार दोनों के मिले जुले प्रयास से आएगा। पर एक नागरिक के तौर पर भी कुछ ठोस बातें हैं।
पहली बात, अपने इलाक़े की असली आपूर्ति घंटे जानिए। बिजली विभाग की वेबसाइट पर यह जानकारी होनी चाहिए। नहीं है, तो सूचना के अधिकार से मांगिए। यह छोटा सा क़दम है, पर यह आंकड़ा जब लोग रोज़ देखने लगते हैं, तो विभाग पर एक दबाव बनता है।
दूसरी बात, अपने मीटर का बिल हर महीने ध्यान से देखिए। उसमें जो इकाइयां दर्ज हैं, वे आपके असली उपभोग से मेल खाती हैं या नहीं, यह जांचिए। ग़लत बिल बहुत आम है, और ग़लत बिल का सीधा असर ग़रीब परिवार पर सबसे ज़्यादा होता है। शिकायत का रास्ता हर डिसकॉम के पास है, पर अधिकांश लोग जानते नहीं, या इस्तेमाल नहीं करते।
तीसरी बात, अगर आपके पास संसाधन हों, तो रूफ़टॉप सोलर एक विकल्प है, ख़ासकर ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में। यह आपकी अपनी बिजली की सुरक्षा है, और लंबे समय में किफ़ायती भी। पर यह कोई जादू नहीं है, यह एक निवेश है, जो हर के लिए संभव नहीं। इसलिए सिर्फ़ इसी पर निर्भर मत रहिए।
चौथी बात, और यह सबसे ज़रूरी, अपनी पंचायत, नगर निगम, या जनप्रतिनिधि से नियमित आपूर्ति की मांग कीजिए, ख़ासकर शाम और रात के घंटों में। मुफ़्त बिजली का वादा सुनने से पहले यह पूछिए कि भरोसेमंद बिजली का वादा क्या है। यह सवाल असहज है, और इसीलिए ज़रूरी है।
अंत में
घोषणा बत्ती जलाने का काम कर सकती है, पर अंधेरा भगाने का काम मीटर पर असली बिजली से होता है। एक देश जिसने अपनी सूची में हर गांव को “विद्युतीकृत” लिखा है, उसकी कसौटी सूची नहीं है, कसौटी वह बच्चा है जिसकी रात आज भी मोबाइल की टॉर्च में बीतती है।
यह कहानी अंधेरे की है, पर यह सिर्फ़ अंधेरे की नहीं है। यह उस फासले की है जो हमारी सरकारी घोषणाओं और हमारे रोज़मर्रा के बीच बनी रहती है। और जब तक यह फासला नहीं पटेगा, तब तक हम “विकसित” होने का दावा अधूरा करेंगे।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े की असली आपूर्ति का घंटा गिनना शुरू कीजिए। पिछले महीने वास्तव में कितने घंटे बिजली रही, यह आंकड़ा अपने पास रखिए। यह छोटा सा अनुशासन एक बड़ी मांग की बुनियाद है, और हर बुनियाद इन्हीं छोटे आंकड़ों से बनती है।