सुबह के पांच बजे एक शहर जाग जाता है, जब बाक़ी देश अभी सो रहा होता है। गलियों में लड़के और लड़कियां, पीठ पर बैग, हाथ में एक मुड़ा हुआ टाइम टेबल, लाइब्रेरी की एक सीट की तरफ़ भागते हुए। एक चाय की दुकान, जहां बातचीत का विषय सिर्फ़ एक है, इस बार कट ऑफ़ कितना जाएगा। एक फोटोकॉपी की दुकान, जो रात दो बजे तक खुली रहती है, क्योंकि नोट्स की मांग कभी ख़त्म नहीं होती। एक हॉस्टल का कमरा, जिसमें एक खिड़की, एक मेज़, और दीवार पर एक तारीख़ लिखी है, जिस दिन परिणाम आना है।
यह कोई एक शहर नहीं है। देश में ऐसे कई शहर हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था एक ही चीज़ पर टिकी है, सरकारी नौकरी की तैयारी। हॉस्टल, मेस, लाइब्रेरी, फोटोकॉपी, टेस्ट सीरीज़, सब इसी एक धंधे के हिस्से हैं। और इन शहरों में जो सबसे ज़्यादा बिकता है, वह किताब नहीं है। वह उम्मीद है।
जो बिकता है, वह ज्ञान नहीं
एक कोचिंग संस्थान जब आपको दाख़िला देता है, तो आपको लगता है कि आप पढ़ाई ख़रीद रहे हैं। असल में आप एक कहानी ख़रीद रहे हैं। कहानी यह है, कि एक साल कड़ी मेहनत कीजिए, और आपकी पूरी ज़िंदगी बदल जाएगी। यह कहानी इतनी बार दोहराई जाती है कि वह सच लगने लगती है।
ध्यान दीजिए कि बेचा क्या जा रहा है। ज्ञान तो आज लगभग मुफ़्त है। एक मोबाइल फ़ोन पर हर विषय का बेहतरीन व्याख्यान पड़ा है। फिर लोग लाखों रुपये क्यों ख़र्च करते हैं। इसलिए नहीं कि कोचिंग के पास कोई गुप्त ज्ञान है। इसलिए कि कोचिंग एक चीज़ बेचती है जो मोबाइल नहीं बेच सकता, यह भरोसा कि अभी हार मानने की ज़रूरत नहीं है। यह उम्मीद का विस्तार बेचती है। और जिस समाज में सम्मानजनक नौकरी इतनी कम हो, वहां उम्मीद सबसे महंगी चीज़ बन जाती है।
यह बात किसी एक संस्थान के ख़िलाफ़ नहीं है। बहुत से शिक्षक ईमानदार हैं, बहुत से छात्र सच में आगे बढ़ते हैं। बात इस ढांचे की है, जिसमें एक नौजवान की सबसे गहरी ज़रूरत, कुछ बन जाने की ज़रूरत, एक उत्पाद में बदल जाती है।
टॉपर की तस्वीर, और जो उसमें नहीं हैं
हर कोचिंग शहर का चेहरा एक जैसा होता है। बड़े बड़े होर्डिंग, जिन पर पिछले साल के सफल छात्रों की मुस्कुराती तस्वीरें। नाम, रैंक, और नीचे संस्थान का नाम। यह तस्वीरें हर मोड़ पर हैं, हर दीवार पर हैं, हर अख़बार के पहले पन्ने पर हैं।
अब एक सीधा सवाल पूछिए। उस तस्वीर में जो दस चेहरे हैं, उस बैच में कुल कितने बैठे थे। दस हज़ार? बीस हज़ार? वह संख्या किसी होर्डिंग पर नहीं लिखी होती। सफल चेहरा दिखता है, बाक़ी की पूरी भीड़ अदृश्य रहती है।
यह कोई धोखा नहीं, यह विज्ञापन का सबसे पुराना नियम है। आप वही दिखाते हैं जो बिकता है। लेकिन इसका असर गहरा है। एक सत्रह साल का बच्चा, जो पहली बार उस शहर आता है, हर दीवार पर सफलता देखता है। उसे लगता है, यह तो सबके साथ हो रहा है, मेरे साथ भी होगा। उसे यह कोई नहीं बताता कि होर्डिंग पर एक चेहरा आने के लिए हज़ारों चेहरों का उसी बैच में रह जाना ज़रूरी है। यही इस गणित की बनावट है।
यह धंधा तभी चलता है जब सपना अधूरा रहे
यह इस पूरे विषय का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, और सबसे कम कहा जाता है।
एक सामान्य धंधे में, ग्राहक की समस्या हल हो जाए, तो धंधा सफल माना जाता है। डॉक्टर का मरीज़ ठीक हो जाए, तो डॉक्टर अच्छा माना जाता है। लेकिन तैयारी की अर्थव्यवस्था इस नियम से उलटी चलती है। यहां अगर हर छात्र पहले ही साल सफल हो जाए, तो पूरा शहर बंद हो जाएगा। हॉस्टल ख़ाली हो जाएंगे, मेस के बर्तन रुक जाएंगे, फोटोकॉपी की मशीनें ठंडी पड़ जाएंगी। इस पूरी व्यवस्था की कमाई इस बात पर टिकी है कि छात्र हर साल लौटकर आता रहे।
इसका मतलब यह नहीं कि कोई बैठकर साज़िश कर रहा है कि छात्र फेल हो। ऐसा कोई नहीं करता। बात इससे गहरी है। बात यह है कि जब एक पूरे शहर की रोज़ी रोटी इस पर निर्भर हो कि अगला बैच भी आए, तो उस शहर में कहीं भी किसी की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वह छात्र को सच बताए। सच यह है कि सीटें बहुत कम हैं, उम्मीदवार बहुत ज़्यादा, और अधिकांश को, चाहे वे कितनी भी मेहनत करें, यह नौकरी नहीं मिलेगी, क्योंकि गणित ही ऐसा है। यह सच कोई नहीं बेचता, क्योंकि यह बिकता नहीं।
और फिर बनता है “एक साल और” का जाल। पहला साल गया, मन कहता है, इस बार तैयारी अधूरी थी, एक साल और। दूसरा साल गया, अब तक इतना लगा चुके हैं कि छोड़ना मूर्खता लगती है, एक साल और। तीसरा साल गया, अब उम्र का दबाव, परिवार का सवाल, और वही जवाब, एक साल और। जितना ज़्यादा लगा चुके होते हैं, छोड़ना उतना ही कठिन लगता है। यह मनोविज्ञान का जाना पहचाना जाल है, और यहां यह एक पूरी पीढ़ी पर लगा हुआ है।
असली क़ीमत, जो फ़ीस की रसीद पर नहीं लिखी
लोग सोचते हैं कि कोचिंग की क़ीमत वह है जो फ़ीस की रसीद पर लिखी है। यह सबसे छोटी क़ीमत है।
सबसे बड़ी क़ीमत समय की है। बीस से अट्ठाईस साल, यह जीवन के सबसे ऊर्जावान साल हैं। यही वह उम्र है जब इंसान कौशल सीखता है, जोखिम लेता है, कुछ नया बनाता है। इन सालों को अगर एक इंतज़ार में लगा दिया जाए, तो जो गया वह सिर्फ़ समय नहीं, वह संभावना है। एक अर्थव्यवस्था जो अपने लाखों सबसे ऊर्जावान युवाओं को उनके सबसे अच्छे सालों में सिर्फ़ प्रतीक्षा करवा रही है, वह एक छिपा हुआ नुक़सान उठा रही है जो किसी बजट में नहीं दिखता।
एक और क़ीमत है, पहचान की। जो नौजवान सालों तक सिर्फ़ “तैयारी कर रहा है” बनकर जीता है, उसकी पूरी पहचान एक नतीजे पर टिक जाती है। वह बेटा नहीं, दोस्त नहीं, इंसान नहीं, बस एक उम्मीदवार बनकर रह जाता है। और जब पहचान इतनी संकरी हो जाए, और नतीजा हाथ न आए, तो भीतर जो टूटता है, वह दिखता नहीं। यह दबाव कई बार गहरे मानसिक तनाव में बदल जाता है। इसे आंकड़ों में गिनना मुश्किल है, पर इसे अनदेखा करना और भी ख़तरनाक है। इसीलिए हर परिवार का यह काम है कि वह नतीजे से पहले इंसान को देखे, बच्चे से नियमित बात करे, और ज़रूरत पड़ने पर बिना झिझक पेशेवर मदद ले।
प्लेटो ने बहुत पहले कहा था कि कोई समाज जिस तरह अपने युवाओं को गढ़ता है, वैसा ही वह समाज बन जाता है। अगर हम एक पूरी पीढ़ी को यह सिखा रहे हैं कि उसकी पूरी क़ीमत एक परीक्षा परिणाम है, तो हम सिर्फ़ कुछ करियर ख़राब नहीं कर रहे, हम यह तय कर रहे हैं कि वह पीढ़ी आगे चलकर किस तरह सोचेगी।
यह किसी का षड्यंत्र नहीं, यह ढांचा है
यह पूछना ज़रूरी है कि यह पूरा ढांचा खड़ा क्यों हुआ।
पहला कारण, सम्मानजनक नौकरियों की भारी कमी। औपचारिक क्षेत्र में स्थायी नौकरियां बहुत कम हैं, और जो हैं उनमें सरकारी नौकरी को सुरक्षा और इज़्ज़त दोनों मिलती है। इसलिए लाखों लोग एक ही दरवाज़े पर खड़े हो जाते हैं। दूसरा कारण, हमारी सामान्य शिक्षा जो डिग्री तो देती है, पर रोज़गार के लायक़ कौशल नहीं देती। तीसरा कारण, पूरे रास्ते में कहीं कोई ईमानदार मार्गदर्शन नहीं है, जो किसी छात्र को समय रहते यह कह सके कि शायद यह रास्ता तुम्हारे लिए नहीं है, कोई और रास्ता देखो।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक इलाक़े की बात नहीं है। हर तरफ़, हर समय यही ढांचा रहा है। समस्या किसी व्यक्ति की नीयत में नहीं है, समस्या उस बनावट में है जिसमें इतने सारे लोग इतने कम दरवाज़ों के सामने खड़े कर दिए गए हैं, और किसी पर यह ज़िम्मेदारी नहीं डाली गई कि वह उन्हें सच बताए।
क्या किया जा सकता है
जवाब सीधा है, हालांकि लागू करना मुश्किल।
पहली बात, ईमानदार आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए। जो संस्थान टॉपर की तस्वीर उतने बड़े होर्डिंग पर लगाता है, उसे उतने ही बड़े अक्षरों में यह भी लिखना चाहिए कि उस बैच में कुल कितने छात्र थे, और उनमें से कितनों का अंतिम चयन हुआ। सफलता का चेहरा दिखाना है, तो उसके नीचे का हर अंक भी दिखाइए। यह एक छोटी सी बात है, पर यह पूरी बहस को बदल देती है, क्योंकि यह सवाल को “प्रेरणा” से हटाकर “अनुपात” पर ले आती है।
दूसरी बात, परिवारों के लिए। तैयारी शुरू करने से पहले एक सीमा तय कीजिए, समय की भी और पैसे की भी। दो साल, या जो भी ठीक लगे, पर एक तय सीमा। और साथ में एक दूसरा रास्ता हमेशा खुला रखिए, कोई कौशल, कोई छोटा काम, कोई पढ़ाई जो आगे काम आए। एक ही दरवाज़े पर पूरी ज़िंदगी दांव पर लगाना उस व्यवस्था पर भरोसा है जो आज भरोसे लायक़ नहीं है।
तीसरी बात, नागरिक के तौर पर। अगली बार जब कोई कहे कि फ़लां शहर में लाखों बच्चे तैयारी कर रहे हैं, तो उसे उपलब्धि मत मानिए। यह पूछिए कि उनमें से कितनों को आख़िर में काम मिला, और बाक़ी कहां गए। यह सवाल असहज है, इसीलिए ज़रूरी है। जिस समाज में लाखों युवाओं का सबसे अच्छा समय इंतज़ार में जा रहा हो, और कोई इसका हिसाब न मांगे, वह समाज ख़ुद से एक बड़ा झूठ बोल रहा है।
अंत में
उम्मीद बुरी चीज़ नहीं है। उम्मीद के बिना कोई नौजवान सुबह पांच बजे नहीं उठता। समस्या उम्मीद नहीं है, समस्या वह ढांचा है जिसने उम्मीद को एक धंधा बना दिया, और सच बताने की ज़िम्मेदारी किसी के कंधे पर नहीं रखी।
एक बच्चा जो सत्रह साल की उम्र में, हर दीवार पर सफलता की तस्वीर देखकर, एक शहर में आता है, और सत्ताईस की उम्र में, बिना उस तस्वीर में आए, ख़ाली हाथ लौटता है, उससे एक सवाल मत पूछिए कि तुमने मेहनत क्यों नहीं की। यह सवाल पूछिए कि उससे सच किसने छुपाया, और क्यों।
ताली बजाना बंद कीजिए, सवाल पूछना शुरू कीजिए। अगली बार जो होर्डिंग सफलता का चेहरा दिखाए, उससे पूछिए कि उस बैच में कुल कितने थे। यह छोटा सा सवाल है, पर जिस दिन यह लाखों मुंह से एक साथ उठेगा, उस दिन उम्मीद का यह कारख़ाना सच बोलने पर मजबूर होगा।