याद कीजिए कि आपको गाड़ी चलाने का लाइसेंस कैसे मिला था। ज़्यादातर लोगों का जवाब लगभग एक जैसा होगा, और उस जवाब में एक चेहरा ज़रूर आएगा। परिवहन कार्यालय के बाहर खड़ा एक आदमी, जो आपके पूछने से पहले ख़ुद चलकर आपके पास आ गया था। उसने आपसे फ़ॉर्म नहीं मांगा, उसने आपकी परेशानी मांगी। फिर उसने एक रक़म बताई, और एक तारीख़, और कहा, आप बस उस दिन आ जाइएगा, बाक़ी हो जाएगा।
और हो भी गया। शायद टेस्ट हुआ ही नहीं। शायद हुआ तो नाम का, जहां गाड़ी दस क़दम आगे ले जाकर वापस लाने को टेस्ट कह दिया गया। तीन दिन बाद एक प्लास्टिक का कार्ड हाथ में था, जिस पर लिखा था कि आप गाड़ी चलाने के योग्य हैं। उस कार्ड ने यह कभी जांचा ही नहीं कि आप सच में योग्य हैं या नहीं।
यह कोई बड़ी घटना नहीं है। यही तो सबसे ख़तरनाक बात है। यह इतनी सामान्य है कि हम इस पर रुकते भी नहीं। लेकिन अगर एक पल रुककर इस छोटी सी बात को ठीक से देखें, तो इसमें पूरा देश दिखाई देता है।
वह आदमी जो ख़ुद चलकर आपके पास आता है
उस बिचौलिए के बारे में सोचिए। वह कौन है, और वहां क्यों है।
वह कोई अपराधी नहीं लगता। वह एक सेवा देता है, और बहुत कुशलता से देता है। वह जानता है कि कौन सी खिड़की कब खुलती है, कौन सा काग़ज़ कहां फंसता है, किस मेज़ पर बात रुकती है। उसका होना इस बात का सबूत है कि सीधा रास्ता इतना मुश्किल बना दिया गया है कि एक पूरा पेशा सिर्फ़ उस रास्ते को छोटा करने पर ज़िंदा है।
यह बहुत ज़रूरी बात है। बिचौलिया समस्या नहीं है, वह लक्षण है। वह वहां इसलिए नहीं है कि लोग बेईमान हैं। वह वहां इसलिए है कि ईमानदार रास्ता जान बूझकर, या लापरवाही से, इतना थका देने वाला बना दिया गया है कि उस पर चलना मूर्खता जैसा लगने लगता है। जब किसी व्यवस्था के सही दरवाज़े के बाहर एक आदमी कुर्सी डालकर बैठ सके, और सालों बैठा रहे, तो वह आदमी उस व्यवस्था की असलियत है, अपवाद नहीं।
और यह भी सोचिए कि उसने जो रक़म ली, वह सिर्फ़ उसकी जेब में नहीं रुकती। उसका एक हिस्सा आगे जाता है, किसी मेज़ तक, किसी हस्ताक्षर तक, किसी मुहर तक। बिचौलिया अकेला नहीं कमाता, वह एक पूरी अनदेखी परत को चलाता रहता है, जो ठीक उसी सीधे रास्ते के बग़ल में बैठी है जिसे मुश्किल बना दिया गया है। इसीलिए यह परत कभी अपने आप ख़त्म नहीं होती। इसके ख़त्म होने में बहुत सारे लोगों का नुक़सान है, और इसके बने रहने में सबकी थोड़ी थोड़ी सुविधा।
जब सही रास्ता ही असामान्य लगने लगे
अब उस इंसान के बारे में सोचिए जो बिचौलिए को मना कर देता है। जो कहता है कि नहीं, मैं ख़ुद टेस्ट दूंगा, ठीक से दूंगा, जैसे होना चाहिए वैसे।
ज़्यादातर जगहों पर इस इंसान को अजीब निगाह से देखा जाता है। उसे लगता है मानो वह कुछ ग़लत कर रहा है। उसका काम सबसे आख़िर में होता है, उसे सबसे ज़्यादा चक्कर लगवाए जाते हैं, और आसपास के लोग उसे समझाते हैं कि बेकार में परेशान क्यों हो रहे हो, सब ऐसे ही कराते हैं।
यहीं असली चोट है। समस्या सिर्फ़ यह नहीं कि ग़लत रास्ता आसान है। समस्या यह है कि सही रास्ता असामान्य बना दिया गया है। एक समाज में जब ईमानदारी एक असुविधा बन जाए, और चतुराई एक समझदारी, तो वहां हर नागरिक धीरे धीरे यह सीख लेता है कि नियम तोड़ने वाला बेवक़ूफ़ नहीं होता, नियम मानने वाला होता है। यह सीख एक टेस्ट से शुरू होती है, पर एक टेस्ट पर रुकती नहीं।
और इसका असर सिर्फ़ उस एक दिन का नहीं होता। जो इंसान एक बार यह मान ले कि सीधा रास्ता सिर्फ़ नासमझ लोगों के लिए है, वह यह समझ हर जगह अपने साथ ले जाता है, अपने काम में, अपने लेन देन में, अपने बच्चों के सामने। एक छोटी खिड़की पर सीखी गई यह बात धीरे धीरे एक पूरे समाज का सामान्य ज्ञान बन जाती है। और जिस समाज का सामान्य ज्ञान यह हो कि नियम मानना घाटे का सौदा है, वहां फिर कोई बड़ा नियम भी ज़्यादा देर नहीं टिकता।
यह भ्रष्टाचार नहीं, यह सिखाई गई आदत है
इसे हम आम तौर पर भ्रष्टाचार कह देते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। यह शब्द बहुत छोटा है इस चीज़ के लिए।
भ्रष्टाचार लगता है किसी एक के लालच की बात है। लेकिन यहां जो हो रहा है वह किसी एक का लालच नहीं है, वह एक पूरी आदत है जो पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जाती है। बच्चा अपने माता पिता को यह करते देखता है, और सीख लेता है कि छोटे काम ऐसे ही होते हैं। बड़ा होकर वह भी वही करता है, और अगली पीढ़ी को यही सिखाता है। किसी ने यह तय नहीं किया था, फिर भी सबने मिलकर यह बना लिया। यही ढांचे की बनावट है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर तरफ़, हर समय यह छोटी खिड़की वैसी ही रही है। समस्या किसी व्यक्ति की नीयत में ढूंढना सबसे आसान बहाना है, क्योंकि इससे ढांचे को देखने से बच जाते हैं। असली सवाल यह है कि एक पूरे समाज ने यह कैसे मान लिया कि बुनियादी कामों के लिए एक छोटा रास्ता ख़रीदना सामान्य है, और इस मानने की क़ीमत क्या है।
एक छोटे टेस्ट से निकलता बड़ा सवाल
अब उस सवाल पर आइए जिसके लिए यह पूरी बात है।
गाड़ी चलाने का टेस्ट पांच मिनट का काम है। उसमें जांचना सिर्फ़ इतना है कि एक इंसान सड़क पर दूसरों की जान के लिए ख़तरा तो नहीं। यह व्यवस्था का सबसे सरल कामों में से एक है। अब ठंडे दिमाग़ से सोचिए। अगर हम यह पांच मिनट का टेस्ट ईमानदारी से नहीं करा पाते, तो उन कामों का क्या जो इससे कहीं बड़े और कठिन हैं।
जो व्यवस्था यह तय नहीं कर पाती कि सड़क पर कौन गाड़ी चलाने लायक़ है, उससे हम उम्मीद करते हैं कि वह पुल सुरक्षित बनाएगी, इमारतों के नक़्शे ठीक से जांचेगी, दवाओं की गुणवत्ता परखेगी, खाने में मिलावट रोकेगी। वही श्रृंखला, वही खिड़कियां, वही बिचौलिए, बस दांव बहुत बड़ा।
इस बात पर एक पल और ठहरिए। जिस खिड़की पर पांच मिनट का टेस्ट एक औपचारिकता बन गया, ठीक वैसी ही और खिड़कियां भी हैं। एक इमारत का नक़्शा जिस मेज़ पर पास होता है। एक पुल की मज़बूती जिस दफ़्तर में काग़ज़ पर जांची जाती है। एक दवा की गुणवत्ता जिस प्रक्रिया से गुज़रती है। हर जगह वही लंबा रास्ता, और उसके ठीक बग़ल में बैठा वही छोटा रास्ता। फ़र्क़ बस इतना है कि ड्राइविंग टेस्ट में चूक की क़ीमत अक्सर एक आदमी चुकाता है, और इन बड़ी खिड़कियों में वही चूक की क़ीमत कभी कभी एक पूरा शहर चुकाता है।
सुकरात बहुत पहले यही करता था, वह बाज़ार में खड़ा होकर सबसे मामूली सी चीज़ पर सवाल पूछता था, और उस छोटे सवाल के पीछे से पूरा सच निकल आता था। ड्राइविंग टेस्ट हमारा वही मामूली सवाल है। उसका जवाब हमें वह बताता है जो कोई आंकड़ा नहीं बताता।
इसलिए यह टेस्ट सिर्फ़ एक लाइसेंस के बारे में नहीं है। यह इस बारे में है कि हम जिन सब चीज़ों पर रोज़ भरोसा करके जीते हैं, उनकी जांच असल में कितनी सच्ची है।
क्या किया जा सकता है
यहां सलाह आसान नहीं है, क्योंकि अकेले इंसान के लिए सीधा रास्ता सच में मुश्किल होता है। फिर भी कुछ ठोस है।
पहली बात, अगली बार जब आपके या आपके परिवार के किसी सदस्य को ऐसा कोई काम कराना हो, तो एक बार सीधा रास्ता आज़माकर देखिए। और चलते हुए ध्यान से देखिए कि व्यवस्था किस किस मोड़ पर आपको बिचौलिए की तरफ़ धकेलती है। यह देखना ख़ुद एक काम है, क्योंकि जो हम रोज़ देखते हैं उसे हम देखना बंद कर देते हैं।
दूसरी बात, जो आपने देखा, उसे कम से कम एक और इंसान को ठीक से बताइए। मज़ाक में नहीं, शिकायत में नहीं, सच की तरह। हर ग़लत आदत इसी पर ज़िंदा रहती है कि सब उसे जानते हैं पर कोई उसे ज़ोर से नाम नहीं देता। नाम देना छोटा क़दम लगता है, पर आदत वहीं से कमज़ोर होनी शुरू होती है।
और एक बात इन सबसे ऊपर। जो इंसान सीधा रास्ता चुनता है, उसे अकेला मत छोड़िए। अगर आपके सामने कोई बिना बिचौलिए के काम कराने की कोशिश कर रहा है और इसीलिए उसे परेशान किया जा रहा है, तो उस पल चुप मत रहिए। अकेला ईमानदार आदमी थककर हार जाता है, पर जब दो लोग एक साथ खड़े हो जाएं, तो वही टेढ़ी खिड़की थोड़ी सीधी होने लगती है। बड़ा बदलाव किसी बड़े आंदोलन से पहले इन्हीं छोटे पलों में शुरू होता है।
तीसरी बात, इसे एक नागरिक माप की तरह इस्तेमाल कीजिए। जब कोई बड़े विकास की, बड़ी योजनाओं की बात करे, तो अपने आप से यह छोटा सवाल पूछिए, इनके यहां वह पांच मिनट का टेस्ट सच में होता है या नहीं। अगर सबसे छोटा काम ईमानदारी से नहीं होता, तो बड़े वादों को भी उसी तराज़ू पर तौलिए।
अंत में
हम सोचते हैं कि उस दिन हमने बस एक लाइसेंस लिया था। असल में उस दिन हमने एक और चीज़ ले ली थी, यह सीख कि जांच एक औपचारिकता है, और चतुर वही है जो उसे छोटा रास्ता देकर निपटा दे। यही असली लाइसेंस है जो हम हर खिड़की पर साथ लेकर चलते हैं।
जिस बच्चे ने अपने बड़ों को यह छोटा रास्ता लेते देखा, उससे तीस साल बाद यह मत पूछिए कि वह नियम क्यों नहीं मानता। यह पूछिए कि उसे पहली बार किसने सिखाया कि नियम मानना मूर्खता है, और तब हम कहां देख रहे थे।
ताली बजाना बंद कीजिए, सवाल पूछना शुरू कीजिए। अगली बार जब वह आदमी ख़ुद चलकर आपके पास आए, उसे मना करने से पहले एक पल यह ज़रूर सोचिए कि वह वहां क्यों है। उस एक सवाल में, उस पांच मिनट के टेस्ट में, पूरा देश खड़ा है।