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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

एक देश जो इंजीनियर बनाता है, और चीज़ें नहीं बनाता

एक नौजवान है। उम्र चौबीस। पिछले महीने एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली। पहली नौकरी मिल गई, एक बड़ी सेवा कंपनी में। अब वह एक बड़े शहर में रहता है, अच्छी सैलरी पाता है।

उसका रोज़ का काम क्या है? वह एक ऐसे सॉफ़्टवेयर के कुछ हिस्सों पर लिखता है, जो एक विदेशी कंपनी के लिए बन रहा है। उस सॉफ़्टवेयर का पूरा नक़्शा वह कभी नहीं देखता। वह उसका उपयोग कभी नहीं करता। उसका कोई पड़ोसी उसका उपयोग नहीं करता।

पांच साल बाद वह एक वरिष्ठ इंजीनियर है। अच्छा कमाता है, गाड़ी ख़रीद ली है, परिवार बस गया है। पर एक छोटा सा सवाल अगर उससे पूछा जाए, “तुमने पिछले पांच साल में क्या बनाया?” तो वह घबरा जाता है। उसने सच में कुछ बनाया? वह नहीं जानता।

यह कोई एक नौजवान की कहानी नहीं है। यह देश के लाखों इंजीनियरों की कहानी है। हम हर साल लाखों इंजीनियर बनाते हैं। पर हम चीज़ें नहीं बनाते। यह विरोधाभास हमारी अर्थव्यवस्था और हमारी पहचान, दोनों की सबसे चुपचाप वाली समस्या है।

इंजीनियर की बहुतायत, सामान की कमी

हर साल हमारे यहां लगभग पंद्रह लाख इंजीनियरिंग की डिग्रियां बनती हैं। यह संख्या दुनिया में सबसे बड़ी है, या उसके आसपास है। हमारे पास लाखों इंजीनियर हैं, और हर साल लाखों और जुड़ते हैं।

अब अपने घर के चारों ओर देखिए।

आपका फ़ोन कहां बना है? शायद चीन में, शायद वियतनाम में, कुछ हिस्से शायद भारत में जोड़े गए हैं। पर असली डिज़ाइन और तकनीक विदेशी है।

आपकी कार के अंदर के सबसे जटिल हिस्से कहां बने हैं? इंजन का इलेक्ट्रॉनिक्स, गियर का तंत्र, सुरक्षा का सिस्टम, ये अधिकांश आयात होते हैं, चाहे गाड़ी कितनी भी “भारतीय” क्यों न दिखे।

आपके अस्पताल में जो जांच की मशीन है, सीटी स्कैन, एमआरआई, अल्ट्रासाउंड, ये कहां बनी हैं? लगभग हमेशा बाहर से आई हैं।

आपकी टीवी, आपका लैपटॉप, आपका कैमरा, आपकी प्रिंटर, आपका वाशिंग मशीन का मूल मोटर, इन सबमें “मेक इन इंडिया” का लेबल हो सकता है, पर असली डिज़ाइन और तकनीक अक्सर बाहर की है।

देश जो इंजीनियर बनाता है, इतने सारे, और देश जो ख़रीदता है, क़रीब क़रीब सब कुछ। यह विरोधाभास कैसे बनता है, यह असली सवाल है।

सेवा की अर्थव्यवस्था का जाल

इसका जवाब हमारी पिछले तीस साल की अर्थव्यवस्था में है।

जब 1990 के दशक में देश का दरवाज़ा खुला, तो हमारे यहां जो बाज़ार ने सबसे ज़्यादा माना, वह था सूचना तकनीक की सेवा का बाज़ार। मतलब, विदेशी कंपनियों के लिए सॉफ़्टवेयर लिखना, उनकी समस्याओं को हल करना, उनके सिस्टम का प्रबंधन करना। यह बहुत बड़ा बाज़ार बना, बहुत सारी नौकरियां पैदा हुईं, और हमारी आर्थिकी का एक पूरा हिस्सा इसी पर खड़ा हो गया।

यह बुरी बात नहीं है। सेवा का बाज़ार वैध है, और इसमें बहुत मेहनत है, बहुत कौशल है। पर इसके साथ एक छुपी हुई क़ीमत भी आती है। हमारी सबसे होशियार युवा प्रतिभाएं, हर साल, इसी रास्ते पर खींची जाती हैं। क्योंकि वहां पैसे हैं, स्थिरता है, और एक तय रास्ता है। जो दूसरा रास्ता हो सकता था, यानी अपने देश के लिए चीज़ें बनाना, उसमें न उतना पैसा है, न उतनी स्थिरता, न उतना तय रास्ता।

नतीजा यह है कि हमारे सबसे होशियार इंजीनियर जीवन भर दूसरों की समस्याएं हल करते रह जाते हैं, और अपने देश की समस्याएं हल करने का काम किसी और के लिए छूट जाता है। और जब बहुत सारी होशियार प्रतिभाएं किसी एक दिशा में खींची जाएं, तो दूसरी दिशा कमज़ोर रह जाती है। यह क़ुदरत का नियम है।

जब एक देश चीज़ें नहीं बनाता

अब उस सवाल पर आइए जो इस लेख का असली सवाल है। एक देश जो चीज़ें नहीं बनाता, उसके साथ क्या होता है?

पहली बात, वह आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर हो जाता है। हर वह उत्पाद जो हम आयात करते हैं, उसके लिए हमें विदेशी मुद्रा देनी पड़ती है। यह मुद्रा कहां से आती है? या तो हमारी सेवाओं से, या हमारे प्रवासियों के पैसे से, या क़र्ज़ से। इन तीनों में से कोई भी स्थायी नहीं है, सब बाहरी हालात पर निर्भर हैं।

दूसरी बात, वह तकनीकी रूप से कमज़ोर रह जाता है। चीज़ बनाने का अनुभव कोई किताब में नहीं मिलता। वह तभी आता है जब हाथ काम करते हैं, मशीनें चलती हैं, ग़लतियां होती हैं, सीखा जाता है, और अगली पीढ़ी और बेहतर बनाती है। जिस देश में यह श्रृंखला नहीं चलती, उसके इंजीनियर तो होते हैं, पर इंजीनियरिंग नहीं होती।

तीसरी बात, और यह सबसे गंभीर है, वह रणनीतिक रूप से असुरक्षित रह जाता है। एक देश जिसकी रक्षा तकनीक, चिकित्सा तकनीक, संचार तकनीक, सब बाहर से आती है, उस देश की स्वतंत्रता हमेशा अधूरी रहती है। संकट के समय वह जिसके ऊपर निर्भर है, वह अगर अपनी सप्लाई बंद कर दे, तो पूरा देश अटक जाता है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है, हाल के सालों में हम सबने यह कई बार देखा है।

अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक स्वस्थ राज्य वही है जो अपनी बुनियादी ज़रूरतें ख़ुद पैदा कर सके। उसने यह कृषि के संदर्भ में कहा था, पर बात आज भी उतनी ही सच है। आज की बुनियादी ज़रूरतें कृषि के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण, संचार, और रक्षा तकनीक भी हैं। जो देश इन्हें अपने भीतर पैदा नहीं कर सकता, वह अधूरा है।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह बाज़ार है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। यह जो हुआ, यह किसी ने तय करके नहीं किया।

कोई आदेश नहीं निकला कि हम चीज़ें न बनाएं। कई सरकारों ने इसके लिए कोशिशें कीं, अलग अलग योजनाओं से, अलग अलग प्रोत्साहन से। पर बाज़ार का पूरा ढांचा सेवा की तरफ़ झुका हुआ था, और बाज़ार के झुकाव को बदलना धीमा काम है। पच्चीस साल में जो आदत बनी, वह दस साल में नहीं बदल सकती।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह झुकाव कमोबेश वैसा ही रहा है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस वैश्विक अर्थव्यवस्था में है जिसने एक समय पर सेवा को सबसे ज़्यादा इनाम दिया, और हमने उस इनाम को सबसे अच्छी तरह से लिया। यह न ग़लती थी, न अपराध। यह बाज़ार था।

पर बाज़ार बदलता है। और जो बाज़ार पच्चीस साल पहले सेवा की तरफ़ था, वह आज नई तकनीक, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, बायोटेक की तरफ़ बढ़ रहा है। जो देश इस नए बाज़ार के लिए अपने इंजीनियरों को तैयार करेंगे, वे अगले तीस साल में आगे रहेंगे। जो नहीं करेंगे, वे पिछले रास्ते पर अटके रहेंगे।

क्या किया जा सकता है

यह सवाल कई परतों पर है, और एक नागरिक के हाथ में पूरी नहीं है। पर कुछ ठोस बातें हर वह व्यक्ति कर सकता है जो यह सच्चाई पहचानता है।

पहली बात, अगर आप छात्र हैं या आपके परिवार में कोई छात्र है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करने से पहले, या उसके दौरान, एक छोटा सा सवाल अपने आप से पूछिए। “मुझे कौन सी नौकरी मिलेगी” का सवाल हम सब पूछते हैं। उसके साथ “मैं क्या बनाऊंगा” का सवाल भी जोड़िए। दूसरा सवाल कठिन है, क्योंकि इसका जवाब आसान नहीं है, और इसके रास्ते में अनिश्चितता ज़्यादा है। पर इस सवाल के बिना, इंजीनियरिंग की डिग्री सिर्फ़ एक टिकट रह जाती है, असली शिल्प नहीं बनती।

दूसरी बात, अपने कॉलेज से अनुप्रयोगात्मक पाठ्यक्रम की मांग कीजिए। आज हमारे कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में जो पढ़ाया जाता है, वह 1990 के दशक की किताबों से बहुत आगे नहीं है। आधुनिक उद्योग की ज़रूरतें वहां तक नहीं पहुंची हैं। एक छात्र समूह अगर अपने कॉलेज से नियमित रूप से यह मांग करे कि नवीनतम तकनीकें पाठ्यक्रम में जोड़ी जाएं, तो वह बदलाव संभव है। यह छोटा सा क़दम है, पर यही क़दम मिलकर बड़े बदलाव बनाते हैं।

तीसरी बात, उपभोक्ता के तौर पर ध्यान दीजिए कि क्या आयातित है, क्या देशी है। हर सामान ख़रीदते समय यह सोचना संभव नहीं, पर बड़े सामान, ख़ासकर तकनीकी सामान, ख़रीदते समय यह सवाल पूछिए। यह एक छोटी सी आदत है, पर हर आदत मिलकर एक बाज़ार बनाती है। और बाज़ार ही उत्पादक को तय करता है।

चौथी बात, अगर आप ख़ुद इंजीनियर हैं, और आप सेवा के क्षेत्र में हैं। अपने पेशे को ग़लत मत मानिए, यह वैध है और ज़रूरी है। पर अगर आपके पास समय और संसाधन हों, तो किसी एक छोटे प्रोजेक्ट पर सोचिए जो आपके अपने देश के लिए कुछ बनाए। एक छोटी सी सेवा, एक छोटा सा उत्पाद, एक छोटा सा हल। यह आपकी सेवा की नौकरी के साथ ही चल सकता है, और यही छोटे छोटे प्रयास मिलकर एक उत्पादक संस्कृति बनाते हैं।

अंत में

इंजीनियर की पहचान उसके पद से नहीं होती, उसके बनाए हुए से होती है। एक देश जो इंजीनियरों की डिग्रियां बांटता है पर चीज़ें नहीं बनाता, उस देश के पास इंजीनियर हैं, पर इंजीनियरिंग नहीं। यह अंतर सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, पर एक पीढ़ी के बाद इसका असर बहुत बड़ा हो जाता है।

अगले तीस साल की दुनिया में जो देश आगे रहेंगे, वे वही होंगे जिन्होंने अपने युवाओं को सिर्फ़ डिग्री नहीं, शिल्प सिखाया। जिन्होंने अपने कारख़ानों में अपने इंजीनियरों को काम पर रखा। जिन्होंने आयात की जगह उत्पादन को प्राथमिकता दी।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने आसपास की चीज़ों को ध्यान से देखना शुरू कीजिए। पिछले महीने आपने जो भी ख़रीदा, उसमें से कितना यहां बना था, और कितना बाहर का था। यह छोटा सा सर्वेक्षण आपके अपने घर में एक देश की पूरी आर्थिकी की झलक देता है। और इस झलक से बहुत बातें साफ़ हो जाती हैं। फिर अगला सवाल अपने आप उठ खड़ा होता है, यह कब तक चलेगा, और हम कब इस झुकाव को बदलने की बात करेंगे।

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