एक गांव से क़रीब बारह किलोमीटर दूर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जिसे हम “पीएचसी” कहते हैं। एक छोटी सी इमारत, एक नर्स के लिए एक मेज़, दो तीन बिस्तर, और दीवार पर एक चार्ट जिस पर डॉक्टर का नाम लिखा है, “डॉ. अमुक, सप्ताह में सोमवार, बुधवार, और शुक्रवार।”
आज मंगलवार है। एक महिला अपने तीन साल के बच्चे को गोद में लिए केंद्र के दरवाज़े पर पहुंची है। बच्चे को बुख़ार है तीन दिनों से, अब साथ में लाल चकत्ते निकले हैं। उसके पति ने उसे यहां छोड़ दिया है, ख़ुद काम पर लौट गया है।
नर्स बाहर निकलती है। पूछती है, “क्या हुआ?” महिला बताती है। नर्स देखती है। चकत्ते, बुख़ार, सूजन, ये सब उसने पहचाने हैं, पर इसकी पुष्टि के लिए डॉक्टर की ज़रूरत है। और डॉक्टर आज नहीं हैं।
महिला पूछती है, “तो क्या करूं?”
नर्स कहती है, “ज़िला अस्पताल चली जाओ, या कल सुबह आ जाओ। डॉक्टर साहब वैसे भी पिछले दो हफ़्तों से नहीं आ रहे, उनका तबादला हुआ है, नया अभी आया नहीं।”
महिला बच्चे को लेकर खड़ी है। ज़िला अस्पताल पचास किलोमीटर दूर है। बस तीन बजे आएगी, फिर रात तक पहुंच पाएगी, फिर वहां की लाइन। उसके पास उतने पैसे भी नहीं हैं। वह वहीं केंद्र की सीढ़ी पर बैठ जाती है, बच्चे को सीने से लगाए।
यह दृश्य देश के हज़ारों पीएचसी में, हर हफ़्ते, किसी न किसी रूप में होता है। और इस दृश्य के पीछे एक संरचनात्मक सच है, जो हम अक्सर बातचीत में नहीं लाते।
जो अस्पताल नक़्शे पर है, और जो ज़मीन पर नहीं
सरकारी आंकड़ों में, देश के हर ब्लॉक में एक पीएचसी है, और उससे जुड़े कई उप केंद्र। यह संरचना दशकों में बनी है, और इसकी मात्रात्मक उपस्थिति बड़ी उपलब्धि है। पर मात्रा एक बात है, गुणवत्ता दूसरी।
बहुत से सरकारी और स्वतंत्र अध्ययनों ने यह दर्ज किया है कि देश के हज़ारों पीएचसी में डॉक्टर का पद ख़ाली है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत है। मतलब, जहां सौ विशेषज्ञ चाहिए, वहां बीस हैं।
इमारत बनी है, उपकरण कुछ हद तक मौजूद हैं, नर्स और सहायक स्टाफ़ अक्सर है, पर डॉक्टर नहीं। यह एक चुपचाप वाली विफलता है, क्योंकि यह आंकड़ों में “अस्पताल मौजूद” के रूप में दर्ज होती है, पर ज़मीनी अनुभव में “अस्पताल अनुपस्थित” के रूप में जीती जाती है। यह दूरी सबसे बड़ी है, और इसी दूरी में देश का एक बड़ा हिस्सा अपनी बीमारी भुगतता है।
डॉक्टर गांव क्यों नहीं जाते
यह सवाल पूछना ज़रूरी है, क्योंकि बिना समझे, सुधार संभव नहीं।
पहला कारण, प्रशिक्षण और तैनाती की दूरी। अधिकांश मेडिकल कॉलेज शहरों में हैं। एक डॉक्टर जो पांच साल शहर में पढ़ा, उसकी आदतें, उसका परिवार, उसके पेशेवर सपने, सब शहर से जुड़ गए हैं। उसके लिए अचानक एक दूर के गांव में जाकर एक छोटे से क्वार्टर में रहना एक बड़ा कूद है, जिसके लिए वह तैयार नहीं है।
दूसरा कारण, बुनियादी सुविधाओं का अभाव। एक डॉक्टर जो गांव जाता है, उसके बच्चों के लिए स्कूल कहां होगा। उसकी पत्नी का अगर अपना पेशा है, उसके लिए काम कहां होगा। उसके लिए अच्छी इंटरनेट सेवा, बैंक, मूल बाज़ार, यह सब अक्सर वहां नहीं है। यह सब उसकी निजी ज़रूरतें हैं, और ये सच में मायने रखती हैं।
तीसरा कारण, पेशेवर अकेलापन। एक विशेषज्ञ डॉक्टर के लिए, अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए, साथी विशेषज्ञों के साथ काम करना ज़रूरी है। एक अकेला डॉक्टर एक दूर के पीएचसी में, बिना सहयोगियों के, बिना उन्नत उपकरण के, बिना नए केसों की विविधता के, धीरे धीरे अपनी क्षमता खोता है। यह उसकी पेशेवर मौत के बराबर है, और कोई समझदार व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं करना चाहता।
चौथा कारण, अनुबंध और प्रोत्साहन की कमज़ोरी। बहुत से राज्यों ने ग्रामीण तैनाती को बढ़ाने के लिए विशेष अनुबंध और प्रोत्साहन शुरू किए हैं। पर इनमें से बहुत में जो वेतन है, वह शहरी निजी अभ्यास से बहुत कम है। एक नौजवान डॉक्टर के लिए, जिसने पांच साल की पढ़ाई पर लाखों ख़र्च किए हैं, यह आर्थिक रूप से समझ में आने वाला विकल्प नहीं है।
ये चारों कारण मिलकर एक ऐसी स्थिति बनाते हैं जिसमें ग्रामीण पीएचसी का डॉक्टर का पद एक अनचाहा पद बन जाता है। और जब पद अनचाहा हो, तो उसे भरना मुश्किल हो जाता है, चाहे आंकड़ों में कितनी भी प्रगति दिखाई जाए।
जो सेवा नर्स पर टिकी है
यहां एक बहुत ज़रूरी बात कहनी है, क्योंकि यह कहानी अधूरी रहती है अगर हम उन लोगों की बात नहीं करते जो पीएचसी को आख़िरकार चला रहे हैं।
हमारे ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की असली रीढ़ है, सहायक नर्स मिडवाइफ़, जिसे ANM कहा जाता है। और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, जिन्हें आशा कहा जाता है। और आंगनवाड़ी की कार्यकर्ता।
ये तीनों स्त्रियां हैं, ज़्यादातर स्थानीय हैं, अक्सर बहुत कम वेतन पर काम करती हैं, और अक्सर बिना नियमित प्रशिक्षण के बहुत से चिकित्सकीय निर्णय लेने को मजबूर हैं। एक नर्स जिसे चार साल का प्रशिक्षण मिला है, उसे अक्सर एक प्राथमिक चिकित्सक का काम करना पड़ता है, क्योंकि डॉक्टर नहीं है। एक आशा कार्यकर्ता को मातृत्व देखभाल, टीकाकरण, और बच्चों की पोषण निगरानी का काम करना है, और कई बार मानसिक स्वास्थ्य के संकेत भी पहचानने हैं।
ये स्त्रियां इस व्यवस्था को ज़मीन पर रखे हुए हैं। अगर वे न हों, तो ग्रामीण स्वास्थ्य का पूरा ढांचा रुक जाए। पर उनकी मेहनत को न तो उचित वेतन से, न उचित प्रशिक्षण से, न उचित कानूनी सुरक्षा से पहचाना जाता है। यह हमारी सबसे बड़ी छुपी हुई शोषण की कहानियों में से एक है, और इस पर बात कम होती है।
यह किसी की लापरवाही नहीं, यह नीति है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। ग्रामीण स्वास्थ्य की यह दशा किसी एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं है।
बहुत से डॉक्टर, नर्स, और अधिकारी इस व्यवस्था के भीतर ईमानदारी से काम कर रहे हैं। उन्हें कोसना आसान है, पर यह उत्तर नहीं है। समस्या व्यक्तियों में नहीं है, समस्या उस प्राथमिकता में है जो दशकों से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हमारा कुल ख़र्च देश के सकल घरेलू उत्पाद के दो प्रतिशत के आसपास या उससे नीचे रखती आई है।
जब कुल ख़र्च ही इतना कम हो, तब ग्रामीण स्वास्थ्य का हिस्सा और कम हो जाता है। और जब हिस्सा कम हो, तब उपयुक्त वेतन, प्रशिक्षण, और बुनियादी ढांचा खड़ा नहीं हो पाता। यह एक गणितीय समस्या है, जिसके पीछे एक नीतिगत चुनाव है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह अनुपात लगभग वैसा ही रहा है। समस्या नीयत में नहीं है, समस्या उस लंबे चले आ रहे चुनाव में है जो स्वास्थ्य को राज्य की प्राथमिक ज़िम्मेदारी नहीं, बाज़ार के हाथ में छोड़ी हुई सेवा मानती है।
अरस्तू ने कहा था कि एक स्वस्थ राज्य की पहचान वह यह है कि वह अपनी सबसे कमज़ोर परत के स्वास्थ्य की देखभाल करे। एक देश जिसकी आधे से ज़्यादा आबादी गांव में है, और जिसके गांव के पीएचसी में डॉक्टर नहीं है, उस देश का स्वास्थ्य ढांचा एक अधूरा वादा है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल केंद्र और राज्य दोनों के नीतिगत निर्णयों में है। पर एक नागरिक के तौर पर कुछ ठोस बातें हैं।
पहली बात, अपने ज़िले के पीएचसी की वास्तविक स्थिति जानिए। आपके ज़िले में कितने पीएचसी हैं, उनमें कितने डॉक्टर के पद हैं, कितने भरे हैं, कितने ख़ाली हैं। यह जानकारी सूचना के अधिकार से मांगी जा सकती है, और कई जगह राज्य स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर भी होती है। यह आंकड़ा अपने आप में एक नागरिक रिपोर्ट है।
दूसरी बात, अपनी आशा कार्यकर्ता और एएनएम को पहचानिए। अगर आप गांव में रहते हैं, तो ये आपकी सबसे पहली स्वास्थ्य कड़ी हैं। उनसे जान पहचान, उनके काम का सम्मान, और उनकी ज़रूरत पर उन्हें संगठनात्मक सहारा, यह सब छोटे क़दम हैं जो इस व्यवस्था को ज़िंदा रखते हैं।
तीसरी बात, अपने जनप्रतिनिधि से ग्रामीण स्वास्थ्य पर सवाल पूछिए। पिछले बजट में आपके राज्य ने ग्रामीण स्वास्थ्य पर कितना ख़र्च किया, कितने नए डॉक्टरों की भर्ती हुई, कितने पुराने पद रिक्त हैं। यह सवाल असुविधाजनक हैं, और इसीलिए ज़रूरी हैं।
चौथी बात, अगर आप ख़ुद एक चिकित्सा छात्र हैं, या किसी ऐसे परिवार से हैं, तो ग्रामीण सेवा को एक नकारात्मक मजबूरी नहीं, एक सक्रिय विकल्प की तरह सोचिए। कुछ डॉक्टरों ने इस रास्ते को चुना है, और उनके अनुभव से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यह कोई आदर्शवादी आह्वान नहीं है, यह एक यथार्थवादी प्रश्न है।
अंत में
एक देश जिसकी आबादी का बड़ा हिस्सा गांव में है, और जिसके गांव के अस्पताल में डॉक्टर नहीं है, वह देश एक चुपचाप वाली स्वास्थ्य आपदा में जी रहा है। यह आपदा अख़बार की पहली ख़बर नहीं बनती, क्योंकि यह धीरे होती है, बिखरी होती है, और इसके पीड़ित बिखरे होते हैं।
पर इसका पैमाना बड़ा है। हर साल लाखों लोग इलाज न मिलने से, या देर से मिलने से, अपनी जान खोते हैं। यह संख्या आधिकारिक नहीं है, क्योंकि इसे गिनने की हमारी आदत नहीं है। पर यह असली है, और इसका हर अंक एक परिवार है, एक बच्चा है, एक माता है, जो उस सीढ़ी पर बैठा था और कोई डॉक्टर नहीं आया।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने ज़िले के पीएचसी में डॉक्टर के पद की रिक्ति का प्रतिशत पूछना शुरू कीजिए। पिछले साल कितने पद ख़ाली रहे, कितनी देर तक रहे, कितनों में अब भी डॉक्टर नहीं है। यह छोटा सा सवाल है, पर इसमें एक पूरी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की असली कहानी छुपी है। और जिस दिन यह सवाल पर्याप्त नागरिक पूछेंगे, उस दिन उस सीढ़ी पर एक माता को इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा।