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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

शौचालय जो बन गया, और जो अब भी इस्तेमाल नहीं होता

सुबह के पांच बजे का दृश्य है, एक गांव का। एक आदमी अपने घर से निकलकर पीछे के खेत की तरफ़ चल रहा है। हाथ में एक छोटा लोटा है। यह उसकी हर सुबह की दिनचर्या है।

उसके घर के पीछे, एक छोटी सी ईंट की संरचना खड़ी है। चार दीवारें, एक टीन की छत, एक दरवाज़ा। यह एक शौचालय है, जो दो साल पहले एक सरकारी योजना के तहत बनाया गया था। फ़ीता काटा गया था, तस्वीरें खींची गई थीं, और गांव को आधिकारिक रूप से “खुले में शौच मुक्त” घोषित किया गया था।

पर वह शौचालय आज भी ख़ाली है। उसके दरवाज़े पर ताला नहीं है, पर पिछले दो साल में उसका इस्तेमाल शायद ही किसी ने किया है। पानी का जो टैंक उसके बग़ल में है, उसमें पानी कभी नहीं पहुंचा। सेप्टिक टैंक की सफ़ाई एक बार भी नहीं हुई। और सबसे ज़रूरी, गांव में इस संरचना के साथ कोई नई आदत नहीं जुड़ी।

यह दृश्य कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। एक हाल के अध्ययन में पाया गया कि लगभग छियासठ प्रतिशत लोग, जिनके पास अपने घर का शौचालय है, फिर भी खुले में शौच जाते हैं। यह आंकड़ा हैरान करने वाला है, पर यह असली है, और यह एक बहुत गहरी कहानी कहता है, जिसे हम अक्सर नहीं सुनते।

निर्माण और उपयोग में जो फ़र्क़ है

पिछले एक दशक में, देश ने स्वच्छता पर एक बहुत बड़ा अभियान चलाया। करोड़ों शौचालय बनाए गए। हर गांव, हर ब्लॉक, हर ज़िले को क्रमशः खुले में शौच मुक्त घोषित किया गया। बहुत से पुरस्कार बंटे, बहुत से समारोह हुए, और एक राष्ट्रीय उपलब्धि का एलान हुआ।

यह उपलब्धि असली थी। शौचालय का निर्माण अपने आप में एक बड़ा क़दम है, और इसे कमतर आंकना ग़लती होगी। पर निर्माण और उपयोग दो अलग बातें हैं, और इस फ़र्क़ पर ध्यान नहीं दिया गया।

एक शौचालय अगर बना है, पर इस्तेमाल नहीं होता, तो वह एक ख़ाली ईंट का ढांचा है, स्वच्छता की कोई इकाई नहीं। उसकी मौजूदगी से न तो जल जनित रोग कम होते हैं, न महिलाओं की रात की असुरक्षा कम होती है, न बच्चों के दस्त की दर बदलती है। ये सब परिणाम तब आते हैं जब शौचालय का इस्तेमाल नियमित और सर्वव्यापी हो।

मतलब, स्वच्छता का असली पैमाना संरचना की मौजूदगी नहीं है, उसका रोज़ का उपयोग है। और इस पैमाने पर, हम जितना सोचते हैं उससे बहुत पीछे हैं।

पानी, सेप्टिक टैंक, और रखरखाव

यहां एक बहुत व्यावहारिक बात कहनी ज़रूरी है, जो अक्सर बहस से छूट जाती है।

एक शौचालय चलने के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी हैं। पहली, पानी। दूसरी, एक काम करता हुआ सेप्टिक टैंक या सीवर कनेक्शन। तीसरी, उसकी नियमित सफ़ाई और रखरखाव। इन तीनों के बिना, चाहे कितनी भी सुंदर इमारत हो, वह काम नहीं करेगा।

ज़मीनी सच यह है कि देश के बहुत से ग्रामीण घरों में पानी का स्थिर कनेक्शन नहीं है। एक नल जो दिन में एक घंटा चलता है, उससे शौचालय के लिए पानी अलग रखना मुश्किल है। एक हैंडपंप जो बहुत दूर है, उससे रोज़ का पानी ढोकर शौचालय में डालना थका देने वाला है।

सेप्टिक टैंक की सफ़ाई एक अलग समस्या है। ज़्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में, यह सेवा या तो उपलब्ध नहीं है, या बहुत महंगी है, या उसमें जो लोग लगते हैं, उनके साथ एक पुरानी अमानवीय प्रथा जुड़ी है, जिसे अब क़ानूनी रूप से मानवीय बनाने की कोशिश हो रही है, पर ज़मीन पर बदलाव अधूरा है। नतीजा यह है कि जब टैंक भर जाता है, तो परिवार के पास खाली कराने का स्पष्ट रास्ता नहीं रहता, और शौचालय ख़ाली पड़ने लगता है।

यानी, स्वच्छता एक पूरा ढांचा मांगती है, सिर्फ़ इमारत नहीं। और हमारी योजनाओं में अक्सर इमारत पर ज़ोर रहा है, बाक़ी पर बहुत कम।

जो आदत बदलनी सबसे मुश्किल है

तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण है, आदत।

जो पीढ़ियां खुले में शौच की आदत में जी हैं, उनके लिए एक छोटे बंद कमरे में बैठना अजीब लगता है, अप्राकृतिक लगता है, और कई बार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी लगता है। यह सोच ग़लत नहीं है उनके अनुभव के हिसाब से, क्योंकि एक गंदा शौचालय जिसमें बदबू हो, हवा न हो, और सफ़ाई न हो, वह सच में अप्रिय अनुभव होता है।

आदत बदलने के लिए सिर्फ़ इमारत काफ़ी नहीं है। उसके साथ एक लंबा संवाद चाहिए, जिसमें स्वास्थ्य, गरिमा, और महिलाओं की सुरक्षा की बात हो। यह बात किसी आदेश से नहीं समझायी जा सकती, यह बात रोज़ की बातचीत से, उदाहरण से, और स्थानीय स्तर के नेतृत्व से बनती है।

यहां महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बहुत से अध्ययनों में पाया गया है कि जिन परिवारों की महिलाओं ने शौचालय के उपयोग पर ज़ोर दिया, वहां उपयोग की दर ज़्यादा है। महिलाओं के लिए खुले में शौच केवल असुविधा नहीं है, यह सुरक्षा का सीधा प्रश्न है, और मासिक स्वास्थ्य प्रबंधन का भी। पर जब घर के निर्णय पुरुषों के हाथ में हों, और शौचालय की देखभाल पर ख़र्च करना उनकी प्राथमिकता न हो, तब महिलाओं की मांग दब जाती है।

यहां एक और बात कहनी ज़रूरी है, जिस पर अक्सर बात नहीं होती। महिलाओं के लिए मासिक धर्म का प्रबंधन एक स्वच्छता का गहरा प्रश्न है, और इसके लिए एक काम करता हुआ शौचालय अनिवार्य है, जिसमें पानी हो, गोपनीयता हो, और सुरक्षित निपटान का प्रावधान हो। एक शौचालय जो इन तीनों में से किसी पर भी अधूरा हो, वह महिलाओं के लिए वही असुविधा बना देता है जो खुले में जाने में होती है, बस अलग रूप में। बहुत से ग्रामीण स्कूलों में लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक मुख्य कारण यही है, और बहुत से घरों में किशोरियों की बीमारियों का छुपा हुआ कारण भी यही है। शौचालय की बात महिलाओं की बात के बिना अधूरी है, और महिलाओं की भागीदारी के बिना उसकी डिज़ाइन भी अधूरी रहेगी।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह डिज़ाइन की कमी है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। शौचालय बने हैं और इस्तेमाल नहीं हो रहे, यह कोई व्यक्तिगत बेईमानी नहीं है।

यह उस योजना डिज़ाइन का स्वाभाविक नतीजा है जिसने मात्रा को प्राथमिकता दी, गुणवत्ता को नहीं। एक ज़िले का प्रशासन जिसकी सफलता का पैमाना यह है कि कितने शौचालय बने, उसके लिए शौचालय बनवाना ज़्यादा प्राथमिक होगा, यह सुनिश्चित करना नहीं कि वे चल भी रहे हैं। एक ठेकेदार जिसकी कमाई निर्माण से है, उसके लिए रखरखाव की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। एक राज्य सरकार जिसकी रिपोर्ट कार्ड में “खुले में शौच मुक्त” लिखना है, उसके लिए असली उपयोग की जांच का प्रोत्साहन कम है।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। यह डिज़ाइन की एक पूरी प्रवृत्ति है जो ज़मीनी पर अल्पकालिक उपलब्धियों को दीर्घकालिक परिवर्तन से ज़्यादा महत्व देती है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस मापने के तरीक़े में है जो असली उपयोग को नहीं गिनता।

क्या किया जा सकता है

यह समस्या बड़ी है, और इसका पूरा हल कई स्तरों पर है। पर कुछ ठोस बातें एक नागरिक के तौर पर ज़रूर हैं।

पहली बात, अपने इलाक़े का असली सर्वेक्षण कीजिए। अगर आप गांव में रहते हैं, या अक्सर जाते हैं, तो देखिए कि बने हुए शौचालयों में कितने सच में इस्तेमाल हो रहे हैं। इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा अक्सर नहीं होता, क्योंकि सरकार सिर्फ़ निर्माण गिनती है। एक छोटा सा नागरिक सर्वेक्षण भी बहुत कुछ बता सकता है।

दूसरी बात, पानी की उपलब्धता पर ध्यान दीजिए। शौचालय के लिए पानी एक अनिवार्य संसाधन है, और इसकी मांग अपने पंचायत, नगर निगम, या जल विभाग से ज़ोर देकर कीजिए। बिना पानी के शौचालय एक ख़ाली ईंट का ढांचा है।

तीसरी बात, सेप्टिक टैंक की सफ़ाई की व्यवस्था पर बात कीजिए। यह काम जो लोग करते हैं, उनके स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा एक संवैधानिक प्राथमिकता है, और साथ ही यह सेवा ख़ुद अनिवार्य है। आपके ज़िले में यह व्यवस्था है या नहीं, यह पूछिए।

चौथी बात, अपने परिवार और पड़ोस में, ख़ासकर पुरानी पीढ़ी से, शौचालय के नियमित उपयोग पर शांतिपूर्ण बातचीत कीजिए। यह काम कोई सरकार नहीं कर सकती, यह केवल समुदाय कर सकता है। और इस बातचीत में महिलाओं की आवाज़ को सबसे ऊपर रखिए, क्योंकि उन पर असर सबसे ज़्यादा है।

पांचवीं बात, स्कूलों के शौचालयों पर ध्यान दीजिए, जो अक्सर सबसे बुरी हालत में होते हैं। आपके गांव के स्कूल में जो शौचालय बने हैं, उनमें पानी आता है या नहीं, दरवाज़ा सुरक्षित है या नहीं, यह पूछिए। एक स्कूल का काम करता शौचालय हर लड़की के स्कूल बने रहने का सबसे ठोस आधार है।

अंत में

स्वच्छता का असली पैमाना एक रिबन कटा हुआ शौचालय नहीं है। असली पैमाना वह सुबह है जब एक आदमी जो दशकों से खेत जाता था, अब अपने घर के पीछे जाता है, और वह जाना नियमित हो जाता है।

जब तक यह बदलाव नहीं होता, तब तक हमारे आंकड़े और हमारी ज़मीन के बीच एक चुपचाप वाली दूरी रहेगी। और इस दूरी की क़ीमत बच्चों के दस्त में, महिलाओं की असुरक्षा में, और एक पीढ़ी की कमज़ोर सेहत में चुकाई जाएगी।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े के बने हुए शौचालयों के असली उपयोग का सर्वेक्षण शुरू कीजिए। कितने बने। कितने इस्तेमाल हो रहे हैं। कितने ख़ाली पड़े हैं। और जो ख़ाली पड़े हैं, उनका कारण क्या है, पानी, टैंक, या आदत। यह छोटा सा सर्वेक्षण है, पर इसमें एक पूरी स्वच्छता नीति की सच्चाई छुपी है। और जिस दिन यह सच्चाई पर्याप्त लोगों के सामने होगी, उस दिन निर्माण से उपयोग की तरफ़ नीति की दिशा बदलनी शुरू होगी।

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