बकलोल्ज़ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

तबबनामअब

जो क़ानून गुलामों को चुप कराने के लिए बने थे, उनमें से कई आज भी किताबों में हैं, और रोज़ इस्तेमाल होते हैं। यह किसी एक पार्टी या एक खेमे की बात नहीं है, हर तरफ़ यही हुआ है। ये लेख तब और अब को एक साथ रखते हैं।

तब बनाम अब

पुलिस अधिनियम 1861, और जिसे हम आज़ादी के बाद नहीं बदल पाए

एक थाने का दृश्य है। एक आम नागरिक एक छोटी सी शिकायत लेकर आया है। उसके पड़ोसी ने उसकी ज़मीन पर एक दीवार बढ़ा दी है, या किसी ने उसकी मोटरसाइकिल चुरा ली है, या कोई पुराना झगड़ा है जिसमें उसे डर है कि स्थिति बिगड़ सकती है। वह थाने के दरवाज़े पर पहुंचता है।…

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तब बनाम अब

धारा 144: एक उपनिवेशी हथियार जो आज भी काम कर रहा है

एक शहर है। शाम का समय है। कुछ नागरिक एक पार्क में जमा होने वाले थे, एक छोटी सी सभा के लिए। विषय क़ानूनी था, किसी राजनीतिक दल की रैली नहीं, किसी विवाद की भीड़ नहीं। सिर्फ़ कुछ नागरिक एक मुद्दे पर बात करने के लिए, शायद एक सार्वजनिक स्मरण के लिए, शायद किसी कविता…

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तब बनाम अब

आज़ादी के बाद हमने जो नहीं बदला, यह उसकी सूची है

आज़ादी के दिन को 1947 से जब हमने नापना शुरू किया, तब से आज तक एक बात बार बार कही जाती है। हम औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्त हुए। हम अपने मालिक ख़ुद बने। यह सच है, और यह बड़ी बात है। लेकिन एक और सच भी है, जो उतना नहीं बोला जाता। अंग्रेज़ चले गए।…

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तब बनाम अब

“छोड़ो भी” वाला देश: न्याय जब इतना दूर हो जाए कि लोग मांगना बंद कर दें

हमारे देश में एक छोटा सा वाक्य बहुत बड़ी कहानी कहता है। “छोड़ो भी।” किसी ने आपका सामान चुराया, और आप थाने जाने की सोच रहे हैं। कोई कहता है, छोड़ो भी, थाने में बैठ कर पूरा दिन ख़राब हो जाएगा। किसी ने आपके साथ धोखाधड़ी की, और आप वकील के पास जाने की सोच…

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तब बनाम अब

स्कूल जो सवाल पूछना भुला देता है: हमारी पढ़ाई और हमारा लोकतंत्र

एक छोटा सा प्रयोग कीजिए। अपने आसपास के किसी भी स्कूल जाने वाले बच्चे से, चाहे वह कक्षा पांच में हो या कक्षा बारह में, यह पूछिए कि उसके स्कूल में पिछले हफ्ते किसी एक विषय पर खुली बहस हुई थी या नहीं। किसी ऐसे सवाल पर जिसका कोई एक सही जवाब न हो, बल्कि…

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तब बनाम अब

नेताजी का काफिला और हमारी भीड़ वाली सोच: एक नागरिक के तौर पर खुद से पूछने लायक सवाल

हमारे देश में एक दृश्य बहुत आम हो चुका है। कोई जनप्रतिनिधि अपने इलाके में आता है। पचास, साठ, कभी कभी सौ गाड़ियों का काफिला। हूटर बजते हैं, धूल उड़ती है, सड़क के दोनों तरफ लोग खड़े हो जाते हैं। मोबाइल निकलते हैं, वीडियो बनते हैं, और अगले कुछ घंटों में वही वीडियो व्हाट्सऐप ग्रुप,…

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बात पर पाबंदी, कलम पर कैंची, और सभा पर लाठी: 174 साल तक भारत की आवाज़ कैसे दबाई गई

रात के दो बजे का दृश्य कल्पना कीजिए, 1878 का एक छोटा सा कस्बा। एक छपाई की मशीन एक तंग गली में चल रही है। पीठ पर पसीना है, उंगलियों पर स्याही है, और एक छोटा सा अख़बार छप रहा है। दरवाज़े पर दस्तक होती है। तीन सिपाही अंदर आते हैं। मशीन सील कर दी…

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