हमारे देश में एक दृश्य बहुत आम हो चुका है। कोई जनप्रतिनिधि अपने इलाके में आता है। पचास, साठ, कभी कभी सौ गाड़ियों का काफिला। हूटर बजते हैं, धूल उड़ती है, सड़क के दोनों तरफ लोग खड़े हो जाते हैं। मोबाइल निकलते हैं, वीडियो बनते हैं, और अगले कुछ घंटों में वही वीडियो व्हाट्सऐप ग्रुप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर तैरने लगते हैं। कैप्शन कुछ इस तरह होता है, “आज हमारे क्षेत्र में नेताजी पधारे, दर्शन हो गए।”
यह दृश्य कहीं भी देखा जा सकता है। किसी एक राज्य की बात नहीं है। पूरे देश के छोटे शहरों और गांवों में यह आम है। और इसी दृश्य के अंदर एक बड़ा सवाल छुपा हुआ है, जो हम नागरिकों को खुद से पूछना चाहिए।
जिसे हम चुनकर भेजते हैं, वह राजा कैसे बन जाता है
संविधान की भाषा में जनप्रतिनिधि एक कर्मचारी है। पांच साल के लिए जनता ने उसे एक काम पर रखा है। उसका वेतन, उसकी गाड़ी, उसका दफ्तर, उसकी सुरक्षा, सब कुछ जनता के टैक्स के पैसे से चलता है। तकनीकी रूप से वह हमारे लिए काम करता है, हम उसके लिए नहीं।
लेकिन ज़मीन पर तस्वीर उल्टी है। वह आता है तो लोग दौड़ते हैं। उसकी गाड़ी रुकती है तो भीड़ इकट्ठा होती है।कोई फूल माला लेकर खड़ा है, कोई बस यह दिखाने के लिए कि “मैं वहां था” वीडियो बना रहा है। ऐसा लगता है मानो वह कोई राजा हो जो कृपा करने आया हो, और हम उसकी प्रजा हों जो दर्शन पाने को तरस रहे हों।
यह सोच कहां से आई है। यह संविधान से नहीं आई। यह उस पुराने ढांचे से आई है जब अंग्रेज़ी अधिकारी गांव में आते थे और लोग सिर झुकाकर खड़े हो जाते थे, क्योंकि उनके हाथ में ज़मीन का रिकॉर्ड था, मुकदमे का फैसला था, राशन का परचा था। आज़ादी मिले पचहत्तर साल से ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन गांव और कस्बे की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वह आदत नहीं गई। बस वर्दी बदल गई है। पहले अंग्रेज़ अफसर थे, अब अपने ही चुने हुए लोग हैं, लेकिन भीड़ का व्यवहार लगभग वैसा ही है।
लोग पागल क्यों हो जाते हैं
इसके पीछे तीन सीधी बातें हैं, और इन्हें समझना ज़रूरी है।
पहली बात, ताकत के पास खड़े होने का अहसास खुद ताकत जैसा लगता है। एक नौजवान जो अपनी ज़िंदगी में अभी तक कुछ बड़ा हासिल नहीं कर पाया, जब वह काफिले के पास खड़ा होकर वीडियो बनाता है और उसे शेयर करता है, तो उसके दोस्तों के बीच उसकी एक छोटी सी पहचान बन जाती है। “देखो, यह वहां था।” यह एक सामाजिक मुद्रा है, छोटी ज़रूर है, लेकिन है।
दूसरी बात, उम्मीद का हिसाब। बहुत से लोग आंख बंद करके भक्ति नहीं कर रहे होते। वे एक तरह का हिसाब लगा रहे होते हैं। अगर मैं भीड़ में रहूंगा, अगर मेरा चेहरा दिखेगा, अगर कभी ज़रूरत पड़ी तो शायद मेरी सुनी जाएगी। यह उस व्यवस्था में समझदारी भरा बर्ताव है जहां कागज़ी अधिकार से ज़्यादा निजी पहचान काम आती है। व्यवस्था ने ही लोगों को सिखाया है कि नागरिकता से ज़्यादा वफादारी फल देती है।
तीसरी बात, मनोरंजन और पहचान। हमारे यहां बड़े शहरों के बाहर राजनीति सबसे बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम है। काफिला, भाषण, नारे, झंडे, यह सब मिलकर एक तरह का त्योहार बन जाता है। जो ऊर्जा बाकी जगह संगीत समारोह या खेल मैदान में दिखती है, वह हमारे यहां रैली में दिखती है। फर्क यह है कि संगीत समारोह खत्म होने के बाद गायक अपने रास्ते जाता है। नेता उसी भीड़ की ऊर्जा को अपना जनादेश बताकर सत्ता का दावा करता है, और भीड़ अपना मनोरंजन करके वापस उसी टूटी सड़क पर लौट जाती है।
जो सवाल कभी नहीं पूछे जाते
यह वह हिस्सा है जो सबसे ज़्यादा परेशान करना चाहिए। लोग दो घंटे काफिले की एक झलक के लिए खड़े रह सकते हैं, लेकिन दो घंटे यह पढ़ने के लिए नहीं देंगे कि उनके जनप्रतिनिधि ने पिछले पांच साल में क्या किया।
देश में कई स्वतंत्र संस्थाएं हैं जो हर विधायक और सांसद की पूरी जानकारी रखती हैं। उनकी घोषित संपत्ति, उनके खिलाफ दर्ज मामले, सदन में उनकी हाजिरी, उन्होंने कौन से सवाल पूछे, कौन से बिल पर क्या वोट दिया, यह सारी जानकारी सार्वजनिक है। लेकिन इलाके में मुश्किल से कोई इसे देखता है।
इसके कारण भी हैं। जानकारी अंग्रेज़ी या किताबी हिंदी में है, उस भाषा में नहीं जो लोग रोज़ बोलते हैं। यह वेबसाइटों पर है, उन व्हाट्सऐप ग्रुपों में नहीं जहां असली राजनीतिक बातचीत होती है। और एक गहरी बात भी है। अपने ही जनप्रतिनिधि के बारे में सवाल पूछना, अपनी ही जाति, अपने ही गांव, अपनी ही पहचान के साथ धोखा जैसा लगने लगता है। दूसरे पक्ष के बारे में सवाल पूछना आसान है। अपने पक्ष की जांच करना मुश्किल। और यह बात किसी एक पार्टी या एक खेमे की नहीं है। हर तरफ यही हो रहा है।
जहां व्यवस्था काम करती है, वहां नेता छोटा हो जाता है
एक बात गौर करने लायक है। देश के जिन हिस्सों में बुनियादी सुविधाएं ठीक ठाक काम करती हैं, जहां राशन कार्ड बिना सिफारिश के मिल जाता है, जहां अस्पताल में बिस्तर पाने के लिए किसी का फोन नहीं लगवाना पड़ता, जहां बिजली अपने आप आती है, वहां जनप्रतिनिधि का रोज़मर्रा का रोब अपने आप कम हो जाता है। लोग उसे काम करवाने वाला नहीं, बल्कि एक कर्मचारी समझते हैं।
जहां व्यवस्था कमज़ोर है, वहां नेता बड़ा दिखता है। क्योंकि बीच की जो खाली जगह है, सरकारी काम और नागरिक के बीच, उसे वही भरता है। और जितनी बड़ी वह खाली जगह होती है, उतना बड़ा वह दिखने लगता है। यह नेता की महानता नहीं है। यह व्यवस्था की कमज़ोरी है।
इसका मतलब यह भी है कि जिस इलाके के लोग जितना ज़्यादा काफिले पर पागल होते हैं, उस इलाके में बुनियादी सुविधाएं उतनी ही कमज़ोर होने की संभावना है। दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
असली बदलाव कैसा दिखेगा
बदलाव की उम्मीद नाटकीय नहीं है। धीमी है। कुछ चीज़ें पहले से हो रही हैं। महिला स्वयं सहायता समूह कई जगह सीधे काम करवा रहे हैं, बीच के दलाल को हटाकर। पंचायती राज संस्थाएं, जहां ठीक से चलती हैं, वहां छोटे फैसले गांव के अंदर हो जाते हैं। सूचना का अधिकार ने आम आदमी को कागज़ी ताकत दी है, हालांकि उसका इस्तेमाल अभी कम है। स्थानीय पत्रकारिता, चाहे वह यूट्यूब पर हो या अखबार में, कई जगह जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में आए उछाल पर सवाल उठा रही है।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव खुद नागरिक के मन में होना है। उस दिन असली फर्क पड़ेगा जब काफिले का वीडियो बनाकर भेजने वाला नौजवान कैप्शन में यह नहीं लिखेगा कि “दर्शन हो गए”। वह यह लिखेगा कि “इन पांच साल में हमारे इलाके के लिए इन्होंने क्या किया, यह सूची देखिए।”
जिस दिन गांव की चाय की दुकान पर बैठे लोग किसी जनप्रतिनिधि का नाम सुनकर पहले यह नहीं पूछेंगे कि वह किस जाति का है या किस पार्टी का है, बल्कि यह पूछेंगे कि उसकी हाज़िरी कितनी रही और उसके इलाके में स्कूल में शिक्षक हैं या नहीं, उस दिन कुछ बदलेगा।
यह बदलाव एक रात में नहीं आएगा। लेकिन इसकी शुरुआत हर बार वहीं से होती है, जब एक नागरिक यह तय करता है कि वह भीड़ का हिस्सा बनकर वीडियो बनाने के बजाय अपने जनप्रतिनिधि का काम का हिसाब मांगेगा।
अंत में
लोकतंत्र सिर्फ हर पांच साल में वोट डालने का नाम नहीं है। यह बीच के पांच साल में सवाल पूछने का भी नाम है। काफिले के सामने झुकना, चाहे वह जिस भी रंग का झंडा लेकर आए, यह नागरिक का काम नहीं है। नागरिक का काम है हिसाब मांगना। शांति से, कानून के दायरे में, लेकिन लगातार।
जब तक हम काफिले देखकर पागल होते रहेंगे और काम का हिसाब नहीं मांगेंगे, तब तक चुनी हुई सरकारें भी राजा जैसा बर्ताव करती रहेंगी। यह उनकी गलती से ज़्यादा हमारी आदत की बात है। और अच्छी बात यह है कि आदतें बदली जा सकती हैं।
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