सुबह छह बजे। अंकल ने पारिवारिक ग्रुप में एक मैसेज भेजा है। शुरू में लिखा है “बहुत ज़रूरी जानकारी।” फिर एक चौंकाने वाली बात। नीचे लिखा है “इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को भेजें।”
आपने पढ़ा। एक पल को रुके। फिर सोचा, अंकल ने भेजा है, ग़लत तो नहीं भेजेंगे। बात भी सच लग रही है। आपने भी दो तीन ग्रुप में आगे भेज दिया।
दिन के अंत तक वह मैसेज दस लाख लोगों तक पहुंच चुका है। शाम तक पता चलता है कि वह झूठ था। लेकिन तब तक उन दस लाख लोगों की राय बदल चुकी है।
यह कहानी एक नहीं, सैकड़ों बार हो चुकी है, हर महीने, हर हफ्ते, हर रोज़।
और इसमें कोई एक पार्टी, एक विचारधारा, एक धर्म, एक समुदाय का दोष नहीं है। यह बीमारी सब तरफ़ बराबर फैली है।
क्यों WhatsApp पर आई बात सच लगती है
इसके पीछे कुछ बहुत मानवीय कारण हैं। ये समझना ज़रूरी है, क्योंकि बीमारी का पता चले बिना इलाज नहीं होता।
पहला कारण, भेजने वाला परिचित होता है। ट्विटर पर किसी अनजान खाते से आई बात पर हम संदेह कर सकते हैं। लेकिन ताऊजी ने भेजी, सच होगी। पुराने स्कूल के दोस्त ने भेजी, झूठ क्यों बोलेगा। यह विश्वास परिचित से होकर आता है, संदेश के मूल स्रोत से नहीं।
दूसरा कारण, जो हमारी राय से मेल खाए, वह जल्दी सच लगता है। मनोवैज्ञानिक इसे “पुष्टि पूर्वाग्रह” कहते हैं। अगर आप पहले से किसी बात पर यक़ीन रखते हैं, तो उसी बात की पुष्टि करने वाला कोई भी मैसेज आपको तुरंत सच लगेगा। उसकी सच्चाई जांचने की ज़रूरत नहीं महसूस होती।
तीसरा कारण, तस्वीर के साथ आया मैसेज ज़्यादा सच लगता है। हमारा दिमाग़ तस्वीर को सबूत मानता है। लेकिन आज की दुनिया में तस्वीर बहुत आसानी से बदली जा सकती है। एक पुरानी तस्वीर, ग़लत समय और जगह के साथ, एक नया झूठ बना देती है।
चौथा कारण, मैसेज छोटा हो तो जल्दी सच लगता है। पूरा संदर्भ, दोनों पक्ष, बारीक़ी, यह सब लंबे लेख में होता है। WhatsApp पर तीन लाइन में बात कह दी जाती है। दिमाग़ इसे जल्दी निगल लेता है, क्योंकि चबाने के लिए कुछ है ही नहीं।
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण कारण, अगर मैं इसे आगे नहीं भेजता, तो शायद कुछ बुरा हो जाएगा। यह डर का छोटा सा रूप है। मैसेज के अंत में लिखा होता है “अगर आप देशभक्त हैं तो आगे भेजें” या “अगर आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो ज़रूर पढ़ें।” यह भावनात्मक दबाव बहुत असरदार होता है।
पांच क़दम, अगली बार के लिए
अगली बार जब WhatsApp पर “ज़रूरी जानकारी” आए, इन पांच क़दमों का इस्तेमाल कीजिए। पूरा प्रक्रिया दो मिनट से कम लेती है।
क़दम 1: मूल स्रोत खोजिए
मैसेज में कोई दावा है। उस दावे का असली स्रोत क्या है। कौन सी ख़बर एजेंसी ने यह कहा। कौन सी सरकारी संस्था ने यह जारी किया। कौन सा अखबार ने यह छापा। अगर मैसेज में स्रोत नहीं लिखा, या स्रोत सिर्फ़ “एक न्यूज़ चैनल” है, तो यह संदिग्ध है। असली ख़बर का स्रोत हमेशा नाम के साथ आता है।
क़दम 2: तस्वीर को उलटी तरह से खोजिए
मैसेज में तस्वीर है? गूगल पर “रिवर्स इमेज सर्च” करना सीख लीजिए। बहुत आसान है। उस तस्वीर को अपलोड कीजिए, गूगल बताएगा कि वही तस्वीर पहले कहां कहां इस्तेमाल हो चुकी है। कई बार पाएंगे कि पांच साल पुरानी तस्वीर है, अलग देश की है, अलग संदर्भ की है।
क़दम 3: कम से कम दो स्रोत मिलाइए
एक ही ख़बर अगर सच है, तो वह कम से कम दो स्वतंत्र स्रोतों में मिलेगी। एक अंग्रेज़ी अख़बार, एक हिंदी अख़बार, एक टीवी चैनल, कोई भी संयोजन। अगर ख़बर सिर्फ़ एक जगह है, या सिर्फ़ WhatsApp पर है, तो उस पर यक़ीन करने का कोई आधार नहीं।
क़दम 4: तारीख़ देखिए
ज़्यादातर झूठ पुरानी ख़बरों को नया दिखाकर फैलते हैं। मैसेज में जो दावा है, उसकी तारीख़ क्या है। क्या यह दो साल पुरानी ख़बर है जो आज दोबारा फैलाई जा रही है। कई बार पाते हैं कि घटना तो हुई थी, लेकिन सालों पहले, और अब किसी ने उसे आज की बताकर भेज दिया है।
क़दम 5: फ़ैक्ट चेक वेबसाइटों पर देखिए
देश में कई स्वतंत्र फ़ैक्ट चेक संस्थाएं हैं जो रोज़ ऐसे संदेशों की जांच करती हैं। पांच मिनट में आप जान सकते हैं कि जो मैसेज आपके पास आया है, उसकी सच्चाई पर पहले से किसी ने काम किया है या नहीं।
जो अंकल को कहना है, और जैसे कहना है
यह सबसे मुश्किल हिस्सा है।
जब आप किसी रिश्तेदार को बताते हैं कि उन्होंने जो भेजा वह झूठ था, तो प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। ताऊजी या भाई साहब को लगता है कि आप उन्हें मूर्ख कह रहे हैं। आपका रिश्ता ख़राब होता है, और अगली बार वे और ज़्यादा झूठा सामान भेजते हैं।
इसका इलाज है। आप ज्ञान नहीं बांटिए। आप सिर्फ़ एक स्क्रीनशॉट या लिंक भेजिए। फ़ैक्ट चेक वेबसाइट का। बिना कोई टिप्पणी के। “ताऊजी जी, यह देखिए, यह इसके बारे में लिखा है।” इतना ही।
बहस मत कीजिए। सिर्फ़ जानकारी रखिए। कुछ लोग समझेंगे, कुछ नहीं। जो समझेंगे, अगली बार सोचेंगे। जो नहीं समझेंगे, उन पर समय बर्बाद मत कीजिए।
और सबसे मुश्किल, ख़ुद के बारे में
यह सब सुनकर लगता है कि बेवक़ूफ़ बाकी सब हैं। मैं तो समझदार हूं।
लेकिन ईमानदारी से सोचिए। पिछले महीने में आपने कौन सा मैसेज आगे भेजा था? क्या आपने उसे जांचा था? क्या उसमें कोई दावा था जिसकी आपने स्रोत खोजने की कोशिश की थी?
ज़्यादातर लोगों का जवाब “नहीं” होगा। और यही असली समस्या है। दूसरों के बेवक़ूफ़ बनने की चिंता करना आसान है। ख़ुद के बेवक़ूफ़ बनने को पहचानना मुश्किल।
WhatsApp पर आगे भेजने से पहले एक पल रुक जाइए। दो मिनट जांचिए। अगर सच है, तो भेजिए। अगर नहीं, तो हटा दीजिए। यह छोटी सी आदत हज़ारों झूठों को रोक सकती है।
लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ़ चुनाव के दिन वोट देने से नहीं होती। यह WhatsApp पर मैसेज भेजने से पहले दो मिनट रुकने से भी होती है।
ताली बजाना बंद कीजिए, सोचना शुरू कीजिए।