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नेताजी का काफिला और हमारी भीड़ वाली सोच: एक नागरिक के तौर पर खुद से पूछने लायक सवाल
हमारे देश में एक दृश्य बहुत आम हो चुका है। कोई जनप्रतिनिधि अपने इलाके में आता है। पचास, साठ, कभी कभी सौ गाड़ियों का काफिला। हूटर बजते हैं, धूल उड़ती…
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बात पर पाबंदी, कलम पर कैंची, और सभा पर लाठी: 174 साल तक भारत की आवाज़ कैसे दबाई गई
रात के दो बजे का दृश्य कल्पना कीजिए, 1878 का एक छोटा सा कस्बा। एक छपाई की मशीन एक तंग गली में चल रही है। पीठ पर पसीना है, उंगलियों…