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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

आपके सबसे करीब वाली सरकार, जिसे आप जानते ही नहीं

हमारे देश में सरकार का नाम सुनते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग़ में दो चीज़ें आती हैं। दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार, और राज्य की राजधानी में बैठी राज्य सरकार। टीवी पर बहस इन्हीं दोनों की होती है। व्हाट्सऐप पर गुस्सा इन्हीं दोनों पर निकाला जाता है। चुनाव की चर्चा इन्हीं दोनों के इर्द गिर्द घूमती है।

लेकिन एक तीसरी सरकार भी है। यह सरकार आपके मोहल्ले की सड़क, आपके इलाके के नल, आपके बच्चे के सरकारी स्कूल, आपके पास के सरकारी अस्पताल, आपके मुहल्ले की सफाई, आपकी कॉलोनी के स्ट्रीट लाइट, और आपके आसपास के सार्वजनिक स्थानों की देखभाल करती है। यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जो भी सरकारी काम आपको दिखता है, उसमें से ज़्यादातर इसी सरकार का काम है।

यह तीसरी सरकार है आपकी ग्राम पंचायत, या आपका नगर पालिका या नगर निगम। संविधान की भाषा में इसे “स्थानीय स्वशासन” कहा जाता है, यानी अपनी जगह का अपना शासन। यह वह सरकार है जो आपके सबसे करीब है, जिस पर आपकी सबसे ज़्यादा पकड़ हो सकती है, और दुर्भाग्य से वही सरकार है जिसके बारे में हम सबसे कम जानते हैं।

अरस्तू ने जो कहा था, और जो हमने भुला दिया

ढाई हज़ार साल पहले अरस्तू ने जब आदर्श राज्य की कल्पना की, तो उन्होंने एक सीधी बात कही। उन्होंने कहा कि राज्य का आकार ऐसा होना चाहिए कि उसके नागरिक एक दूसरे को पहचानते हों, और जो उन पर शासन करते हैं, वे भी उनकी पहुंच में हों। उनका कहना था कि जब शासक और शासित के बीच इतनी दूरी हो जाए कि एक दूसरे को न पहचानें, तो शासन अच्छा नहीं रह सकता। निर्णय वहां होने चाहिए जहां उनके नतीजे झेले जाते हैं।

अरस्तू को आज के विशाल राष्ट्र राज्यों के बारे में पता नहीं था। लेकिन उनकी बात आज भी उतनी ही सच है। एक अरब चालीस करोड़ के देश में अगर हर फैसला दिल्ली से होगा, तो वह फैसला उस गांव की हकीकत से बहुत दूर होगा जहां वह लागू होना है। इसी सच्चाई को पहचानते हुए हमारे संविधान ने स्थानीय स्वशासन का ढांचा रखा था।

1992 में संविधान में दो बड़े संशोधन हुए, 73वां और 74वां। इन्होंने पंचायती राज और नगर पालिका व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया। तीन स्तर तय किए गए। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या ब्लॉक पंचायत, और ज़िला परिषद। शहरों के लिए नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद, और नगर निगम। हर पांच साल में चुनाव अनिवार्य। महिलाओं और कमज़ोर वर्गों के लिए आरक्षण। योजना बनाने, कर लगाने, और कई विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार।

कागज़ पर यह दुनिया की सबसे अच्छी स्थानीय शासन व्यवस्थाओं में से एक है। ज़मीन पर यह दुनिया की सबसे कम इस्तेमाल की गई व्यवस्थाओं में से एक है।

जो कागज़ पर है, और जो ज़मीन पर है

संविधान की 11वीं अनुसूची में 29 विषय हैं जो पंचायतों को सौंपे जा सकते हैं। 12वीं अनुसूची में 18 विषय हैं जो नगर पालिकाओं को सौंपे जा सकते हैं। कृषि, सिंचाई, गरीबी उन्मूलन, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कें, पीने का पानी, स्वच्छता, बाज़ार, सार्वजनिक संपत्ति, यह सब इन सूचियों में हैं।

लेकिन इन विषयों को असल में पंचायतों और नगर पालिकाओं को सौंपना राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया। और यहीं पर पूरी कहानी बदल जाती है। ज़्यादातर राज्यों ने इन विषयों को आधे अधूरे मन से सौंपा। नाम पर अधिकार दे दिया, लेकिन उस अधिकार के साथ ज़रूरी पैसा, ज़रूरी कर्मचारी, और ज़रूरी आज़ादी नहीं दी।

नतीजा यह है कि आज ज़्यादातर ग्राम पंचायतें अपने बजट का बड़ा हिस्सा ऊपर से आने वाली राशि पर निर्भर हैं। नगर निगमों की हालत थोड़ी बेहतर है क्योंकि वहां संपत्ति कर का अपना स्रोत होता है, लेकिन वहां भी राज्य सरकार की पकड़ बहुत मज़बूत बनी रहती है। एक मेयर के पास नाम का पद होता है, लेकिन फैसले लेने का असली अधिकार अक्सर राज्य द्वारा नियुक्त नगर आयुक्त के पास होता है। एक सरपंच के पास गांव की मुहर ज़रूर होती है, लेकिन कई कामों के लिए उसे ब्लॉक स्तर के अधिकारी की मंज़ूरी चाहिए।

यह वैसा ही है जैसे किसी कर्मचारी को मैनेजर का नाम तो दे दिया जाए, लेकिन उसे न बजट दिया जाए, न टीम पर अधिकार, न फैसले लेने की आज़ादी, और फिर उससे कहा जाए कि नतीजे लेकर आओ। फिर जब नतीजे नहीं आते, तो कहा जाता है, देखो, ये पंचायतें काम नहीं करतीं।

क्यों राज्य सरकारें अधिकार नहीं देतीं

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, और इसका जवाब बहुत सीधा है।

राजनीतिक ताक़त एक सीमित चीज़ है। अगर एक ग्राम पंचायत के पास अपने गांव की सड़कें, स्कूल, और पानी पर असली अधिकार होगा, तो उस गांव के सरपंच की ताक़त बढ़ेगी। और जब हज़ारों गांवों के सरपंचों की ताक़त बढ़ेगी, तो राज्य के विधायक की ताक़त उसी अनुपात में घटेगी।

विधायक अपने इलाके में जिस “विकास निधि” से सड़कें बनवाता है, अगर वह निधि सीधे पंचायत के पास होगी, तो विधायक के पास देने को क्या रहेगा। अगर ग्रामीण स्तर पर असली ताक़त पंचायत के पास होगी, तो विधायक के दफ्तर के बाहर सिफारिश के लिए लगने वाली लंबी कतार किसके लिए लगेगी।

इसलिए राज्य के स्तर पर हर पार्टी, हर राज्य में, स्थानीय स्वशासन को मज़बूत करने में देरी करती है। यह किसी एक खेमे का दोष नहीं है। यह सत्ता की संरचना का दोष है। कोई भी सत्ताधारी अपनी ताक़त नीचे की तरफ नहीं बहाना चाहता, जब तक उसे मजबूर न किया जाए।

मजबूर कौन कर सकता है। सिर्फ नागरिक, अगर वे जागरूक हों।

नागरिक की चुप्पी, यहां सबसे महंगी पड़ती है

राष्ट्रीय राजनीति में आपका वोट करोड़ों में से एक है। राज्य की राजनीति में आपका वोट लाखों में से एक है। लेकिन स्थानीय निकाय के चुनाव में आपका वोट कुछ हज़ार में से एक होता है, और कई ग्राम पंचायतों में तो कुछ सौ में से एक।

यानी आपके वोट का असली वज़न यहीं सबसे ज़्यादा है। आपकी आवाज़ की सबसे ज़्यादा सुनवाई यहीं हो सकती है। आपके सवाल का जवाब देने वाला व्यक्ति यहीं आपके सबसे करीब रहता है। और फिर भी, सबसे कम भागीदारी इन्हीं चुनावों में होती है।

स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान प्रतिशत अक्सर लोकसभा या विधानसभा चुनावों से काफी कम होता है। मध्यवर्गीय इलाकों में तो हालत और ख़राब है। ज़्यादातर लोग यह बताने में संकोच नहीं करते कि उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में किसे वोट दिया था, लेकिन अगर पूछा जाए कि उनके वार्ड का पार्षद कौन है, तो जवाब “पता नहीं” होता है।

ग्राम सभा का तो ज़िक्र ही छोड़िए। संविधान कहता है कि हर गांव की एक ग्राम सभा होगी, जिसमें उस गांव के सारे वयस्क मतदाता सदस्य होंगे। यह ग्राम सभा गांव की सबसे ऊंची संस्था है। उसकी बैठक में बजट पर चर्चा हो सकती है, योजनाओं की समीक्षा हो सकती है, अधिकारियों से सवाल पूछे जा सकते हैं। लेकिन ज़्यादातर गांवों में ग्राम सभा की बैठक नाम मात्र को होती है। हाजरी रजिस्टर में दस्तख़त ले लिए जाते हैं, कागज़ पर बैठक हो जाती है, असल चर्चा कभी नहीं होती।

यह ब्रिटिश राज नहीं रोक रहा। यह दिल्ली की केंद्र सरकार नहीं रोक रही। यह आप और हम मिलकर नहीं कर रहे, हालांकि कानून हमें पूरी अनुमति देता है।

जहां स्थानीय शासन काम करता है, वहां क्या होता है

देश में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहां पंचायत या नगर पालिका असल में काम करती है। केरल का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जहां स्थानीय निकायों को बजट और निर्णय में ज़्यादा अधिकार दिए गए हैं। कुछ राज्यों में महिला स्वयं सहायता समूहों ने स्थानीय शासन में सक्रिय भागीदारी का रास्ता बनाया है। कुछ शहरों में नागरिक समूहों ने आरटीआई और सूचना अधिकार का इस्तेमाल करके अपने नगर निगम को जवाबदेह बनाने में कुछ हद तक सफलता पाई है।

इन सभी जगहों में एक बात समान है। नागरिक सक्रिय हैं। वे बैठकों में जाते हैं, बजट पर सवाल पूछते हैं, स्थानीय मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, और सबसे ज़रूरी, अगले चुनाव में अपने स्थानीय प्रतिनिधि का काम का हिसाब रखते हैं।

जहां नागरिक सोता है, वहां स्थानीय निकाय भी सोता है। जहां नागरिक जागता है, वहां वह जागता है। यह जादू नहीं है, यह संरचना है।

आज ही उठाने लायक छोटे क़दम

अगर आप यह लेख पढ़कर सोच रहे हैं कि शुरुआत कैसे की जाए, तो कुछ क़दम बहुत सीधे हैं।

पहला, अपने वार्ड के पार्षद या अपनी ग्राम पंचायत के सरपंच का नाम पता कीजिए। यह जानकारी नगर निगम या ज़िला पंचायत की वेबसाइट पर है, और लोगों से पूछने पर भी मिल जाती है। बस इतना जान लेना कि कौन प्रतिनिधि है, पहला क़दम है।

दूसरा, उनकी आख़िरी पांच साल की हाज़िरी और बैठकों का रिकॉर्ड देखने की कोशिश कीजिए। कई जगहों पर यह सार्वजनिक है, कई जगहों पर सूचना के अधिकार से माँगना पड़ता है। आरटीआई का आवेदन दस रुपये में हो जाता है, और कानूनन तीस दिन में जवाब आना ज़रूरी है।

तीसरा, अगली नगर निगम या ग्राम सभा की बैठक की तारीख़ पता कीजिए, और अगर संभव हो तो जाइए। पहली बार में आप शायद कुछ न बोलें, सिर्फ देखें। यह भी ठीक है। आप यह देखेंगे कि बहुत कम लोग आते हैं, और यह देखकर ही आपको समझ आएगा कि आपकी एक उपस्थिति भी कितना फर्क डाल सकती है।

चौथा, अगले स्थानीय चुनाव से पहले अपने इलाके के उम्मीदवारों के बारे में बुनियादी जानकारी इकट्ठा कीजिए। उनकी पिछली पारी का काम, उनकी घोषित संपत्ति, उनके खिलाफ कोई मामला, यह सब सार्वजनिक है। पच्चीस मिनट का काम है।

पांचवां, अपने मोहल्ले या कॉलोनी के व्हाट्सऐप ग्रुप में सिर्फ शिकायत मत भेजिए। एक छोटी सी आदत डालिए। हर महीने एक बार अपने पार्षद या सरपंच का नाम लिखकर पूछिए कि इस महीने उनके इलाके में क्या हुआ। यह छोटा सा सवाल भी, अगर लगातार पूछा जाए, तो धीरे धीरे पूरे ग्रुप की सोच बदलता है।

अंत में

लोकतंत्र के बारे में हमारी समझ अक्सर सबसे ऊपर से शुरू होती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, बड़ी पार्टियां, बड़े मुद्दे। लेकिन लोकतंत्र असल में सबसे नीचे से बनता है। उस सरकार से जिसका दफ्तर आपके घर से पंद्रह मिनट की दूरी पर है। उस प्रतिनिधि से जिसे आप सड़क पर मिल सकते हैं। उस बैठक से जिसमें जाने के लिए कोई पास नहीं चाहिए, सिर्फ समय और इच्छा चाहिए।

अरस्तू ने कहा था कि असली लोकतंत्र वहीं संभव है जहां शासक और शासित एक दूसरे को पहचानते हों। भारत में यह संभावना सिर्फ एक जगह बची है। आपकी ग्राम पंचायत में, आपके नगर निगम में, आपके वार्ड में।

संविधान ने यह दरवाज़ा 1992 में हमारे लिए खोला था। तब से तैंतीस साल बीत चुके हैं, और इस दरवाज़े से अंदर जाने वाले लोग बहुत कम हैं। राज्य सरकारें इसे चौड़ा करने में आना कानी करेंगी, यह तय है। उन्हें मजबूर करना नागरिक का काम है, और यह काम कहीं और से नहीं हो सकता।

अगली बार जब आप किसी सरकार से शिकायत करें, तो एक बार रुक कर सोचिए। क्या यह शिकायत उस सरकार के सामने है जो आपके सबसे करीब है, या उस सरकार के सामने जो आपसे सबसे दूर है। जो सबसे करीब है, उससे शिकायत करना सबसे आसान भी है और सबसे असरदार भी। बस उसे खोजना है।

खोजना मुश्किल नहीं है। बस अब तक हम खोजते ही नहीं थे।

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