एक छोटे क़स्बे की चाय की दुकान को याद कीजिए। पच्चीस साल पहले की।
सुबह के सात बजे हैं। दुकान पर लकड़ी की मेज़ है, उस पर एक छोटा सा हिंदी अख़बार रखा है, चार पन्ने का, उसी क़स्बे से छपा। पहले पन्ने पर ख़बर है कि सरकारी स्कूल की दीवार पिछले महीने से टूटी पड़ी है। दूसरे पन्ने पर एक नाम है, उस ठेकेदार का जिसे सड़क बनाने का काम मिला था, और जिसने आधी सड़क बनाकर छोड़ दी। तीसरे पन्ने पर पंचायत के बजट का ब्यौरा है। चौथे पन्ने पर एक छोटा सा कॉलम है, जिसमें इस बार बताया गया है कि नगर परिषद की पिछली बैठक में कौन कौन आया था, और किसने क्या कहा।
चाय वाले से लेकर, रिक्शा खींचने वाला, स्कूल का मास्टर, और सेवानिवृत्त डाक बाबू, सब उस अख़बार को पलट कर देख लेते हैं। शाम तक पूरा क़स्बा जान चुका होता है कि ठेकेदार का नाम क्या है, और उसकी जवाबदेही किसके पास है।
अब उसी चाय की दुकान को आज देखिए। मेज़ पर अख़बार नहीं है। एक मोबाइल फ़ोन है, जिस पर एक राष्ट्रीय चैनल का ख़बरिया कार्यक्रम चल रहा है, ज़ोर से। बीच बीच में एक व्हाट्सऐप का पैगाम बजता है, जिसमें किसी राज्य की किसी घटना का छोटा सा वीडियो है। यह सब उसी क़स्बे के बाहर का है। क़स्बे के अंदर क्या हुआ है, यह आज वहां बैठा कोई भी आदमी ठीक से नहीं बता सकता।
स्थानीय अख़बार के मरने की कहानी यही है। और यह कहानी जितनी छोटी लगती है, उतनी छोटी नहीं है।
जो पुराने अख़बार में था, और जो आज नहीं है
बीस तीस साल पहले देश के लगभग हर ज़िले में कुछ छोटे हिंदी अख़बार थे। चार पन्ने, छह पन्ने, कभी कभी इससे भी छोटे। बाहर से देखने में मामूली थे, पर उनका असली काम बहुत बुनियादी था।
वह काम यह था, कि स्थानीय सत्ता पर एक रोज़ की निगाह रखी जाए। नगर परिषद की बैठक में क्या हुआ। ज़िला परिषद का बजट कहां गया। फलां स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं। फलां सड़क का ठेका किसने लिया, और कब तक उसे पूरा होना था। फलां अस्पताल में दवा क्यों नहीं आ रही। ये छोटे छोटे सवाल, हर हफ़्ते, हर महीने, छोटे छोटे अक्षरों में छप जाते थे। और इस छपाई का सबसे बड़ा नतीजा यह था कि स्थानीय अधिकारी और प्रतिनिधि जानते थे, कोई देख रहा है।
जब पता हो कि कोई रोज़ देख रहा है, तब आदमी और संस्था दोनों थोड़े सीधे रहते हैं। यह पूर्ण रूप से ईमानदारी नहीं देता, पर बहुत ज़्यादा बेपरवाही पर ज़रूर रोक लगाता है।
आज वही स्थानीय परत लगभग ख़ाली है। अधिकांश छोटे शहर के अख़बार या तो बंद हो चुके हैं, या किसी बड़ी राष्ट्रीय श्रृंखला में मिल गए हैं, जहां स्थानीय पृष्ठ नाम के लिए हैं, और जिसमें ख़बर के बजाय राज्य या राष्ट्रीय स्तर की चीज़ें भर दी जाती हैं। ज़िला परिषद की बैठक की ख़बर अब किसी पन्ने पर नहीं है, क्योंकि उसे लिखने और छापने वाला अब वहां है ही नहीं।
जो भर गया उस जगह में
पर सूचना तो आज भी आती है। पहले से ज़्यादा आती है। फ़र्क़ यह है कि कहां से आती है, और किस तरह की होती है।
पहले स्थानीय अख़बार जो जगह भरता था, वह जगह आज तीन चीज़ों ने भर ली है। पहली, राष्ट्रीय टीवी चैनल, जो दिन भर देश की बड़ी बहसों में डूबे रहते हैं, पर आपके मोहल्ले की सड़क पर एक शब्द नहीं बोलते। दूसरी, सोशल मीडिया के व्हाट्सऐप समूह, जहां पैगाम तेज़ी से फैलते हैं, पर उनकी सच्चाई की कोई जांच नहीं होती। तीसरी, स्थानीय यूट्यूब चैनल, जो कभी कभी बहुत अच्छे होते हैं, पर अक्सर एक व्यक्ति का छोटा सा दिखावा होते हैं, जिनके पास न संगठन है, न जांच की क्षमता।
इन तीनों में एक चीज़ साझा है। इनमें से कोई भी ठेकेदार का नाम छाप कर एक हफ़्ते तक उस पर खबरें नहीं लिख सकता। कोई भी ज़िला परिषद की बैठक के मिनट निकाल कर उन्हें पाठक के सामने नहीं रख सकता। कोई भी एक स्कूल की दीवार की एक ख़बर को इतना नहीं उठा सकता कि अधिकारी जवाब देने पर मजबूर हो।
जो पहले कलम और संगठन का काम था, अब वह व्यक्तिगत और बिखरा हुआ है। और बिखरी हुई आवाज़ें असरदार नहीं होतीं।
जब स्थानीय पत्रकारिता मरती है, क्या मरता है
यहां इस बात को पूरी गहराई से समझना ज़रूरी है, क्योंकि स्थानीय पत्रकारिता के मरने का असर बहुत साधारण लगते हुए भी बहुत बड़ा है।
पहली बात, स्थानीय सत्ता बेलगाम हो जाती है। जब पंचायत की बैठक की ख़बर कहीं नहीं छपती, तो सरपंच, उपसरपंच, और सचिव यह जानते हैं कि उनके फ़ैसले बाहर के किसी भी काग़ज़ पर दर्ज नहीं हो रहे। यह जानकारी ख़ुद एक तरह की आज़ादी है, जो सत्ता को मनमानी की तरफ़ धकेलती है।
दूसरी बात, नागरिक का राजनीतिक अनुभव सिकुड़ जाता है। पहले एक छोटे क़स्बे का नागरिक रोज़ अख़बार में अपने प्रतिनिधि का नाम पढ़ता था, उसके फ़ैसले देखता था, उसकी ग़लतियां पढ़ता था। आज वह राष्ट्रीय राजनीति में डूबा है, और अपने वार्ड के पार्षद का नाम तक नहीं जानता। राजनीतिक भागीदारी की पहली सीढ़ी, यानी स्थानीय जानकारी, ख़त्म हो जाती है, और तब ऊपर की हर सीढ़ी भी कमज़ोर पड़ जाती है।
तीसरी बात, ग़लत सूचना के लिए ज़मीन तैयार हो जाती है। जब लोगों के पास भरोसेमंद स्थानीय स्रोत नहीं होते, तो वे जो भी सामने आया, उसे पकड़ लेते हैं। एक वीडियो, एक पैगाम, एक यूट्यूब का दावा। इसकी सच्चाई जांचने का कोई ढांचा अब उनके पास नहीं है।
चौथी बात, हर बड़ी बहस छोटी ज़मीन से कट जाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, ये सब बातें जब तक एक मोहल्ले के स्तर पर नहीं उठतीं, तब तक राज्य या देश के स्तर पर भी ठीक से नहीं हल होतीं। स्थानीय पत्रकारिता वह कड़ी थी जो छोटी ज़मीन की बात बड़े मंच तक पहुंचाती थी। वह कड़ी अब टूट चुकी है।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह बाज़ार है
यह जो हुआ है, यह किसी ने जान बूझकर नहीं किया।
स्थानीय अख़बार इसलिए नहीं मरे कि किसी ने उन्हें मारने का फ़ैसला किया। वे इसलिए मरे क्योंकि उनकी आर्थिकी टूट गई। विज्ञापन का बाज़ार बदल गया, बड़े बड़े आनलाइन मंच आ गए, छोटे स्थानीय व्यवसाय अब अपना पैसा वहां ख़र्च करते हैं जहां ज़्यादा लोग देखते हैं। एक छोटा अख़बार जो साठ सत्तर साल से चल रहा था, उसके पास इस नए बाज़ार में टिकने का तरीक़ा नहीं था। बड़ी श्रृंखलाओं ने उसे ख़रीद लिया, और ख़रीदने के बाद धीरे धीरे उसकी स्थानीयता ख़त्म कर दी।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह बाज़ार वैसा ही चला है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस बाज़ार के ढांचे में है जो ख़बर को एक उत्पाद की तरह देखता है, और जिस उत्पाद की मांग कम हो, उसे बंद करता जाता है। और स्थानीय ख़बर, जो थोड़े लोगों के लिए ज़रूरी होती है पर बहुत लोगों के लिए नहीं, सबसे पहले उसी कमी की चपेट में आती है।
प्लेटो बहुत पहले कह गया था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि नागरिक मूड और बयानबाज़ी के पीछे चलने लगे, और तथ्य पर ठहरना भूल जाए। उन्होंने यह दो हज़ार पांच सौ साल पहले कहा था, जब अख़बार थे ही नहीं। पर उनकी बात आज पहले से ज़्यादा सच है। जब ठहरने वाली ख़बर का साधन ही ग़ायब हो जाए, तो मूड के पीछे दौड़ना नागरिक का स्वभाव बन जाता है।
क्या किया जा सकता है
यह समस्या बड़ी है, और एक नागरिक के हाथ में इसका पूरा हल नहीं है। पर कुछ ठोस बातें हैं जो हर वह व्यक्ति कर सकता है, जो इस सच्चाई को पहचानता है।
पहली बात, अपने इलाक़े के किसी एक छोटे पत्रकार को खोजिए और उसे आर्थिक रूप से सहारा दीजिए। आज बहुत से ईमानदार पत्रकार स्वतंत्र रूप से अपने यूट्यूब चैनल, न्यूज़लेटर, या वेबसाइट चलाते हैं। उनकी सदस्यता लीजिए। पच्चीस रुपये महीने या सौ रुपये महीने, जो भी ठीक लगे। यह बहुत छोटी रक़म है, पर यह उस व्यक्ति को टिकने का आधार देती है, और टिकने वाला पत्रकार ही असली पत्रकारिता कर पाता है।
दूसरी बात, स्थानीय ख़बर को साझा कीजिए, राष्ट्रीय बहसों से ज़्यादा। जब आपके मोहल्ले में सड़क टूटी है, या स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, या वार्ड का बजट किसके पास है, यह बात अपने जान पहचान के लोगों तक पहुंचाइए। राष्ट्रीय बहस आपके जान पहचान के लोग बिना आपके भी सुन लेंगे, स्थानीय जानकारी आप ही पहुंचा सकते हैं।
तीसरी बात, अपने जनप्रतिनिधि से स्थानीय सवाल पूछिए, बड़े सिद्धांत के सवाल नहीं। आपकी सड़क का ठेकेदार कौन है। आपके स्कूल में कितने शिक्षक हैं। आपके वार्ड का सालाना बजट कितना है। ये जानकारियां सार्वजनिक हैं, पर अधिकतर नागरिक इन्हें नहीं मांगते। मांगना शुरू कीजिए। और जो जवाब मिले, उसे अपने आस पास के लोगों से बांटिए।
चौथी बात, स्थानीय बैठकों में जाइए। नगर परिषद, ज़िला परिषद, वार्ड सभा, ये बैठकें खुली होती हैं। आप जा सकते हैं, सुन सकते हैं। बीस लोग भी अगर लगातार जाने लगें, तो बैठक का स्वभाव बदलने लगता है। यह छोटा सा क़दम लगता है, पर एक मरी हुई परत को थोड़ा सा जीवित करने का यह सबसे सीधा तरीक़ा है।
अंत में
एक मोहल्ला जिसका अख़बार न हो, वह मोहल्ला अंधेरे में रहता है, चाहे उसकी सड़कों पर कितनी भी बत्तियां जल रही हों। उस अंधेरे में सरकार आसानी से बेपरवाह हो जाती है, ठेकेदार आसानी से लापरवाह, और नागरिक आसानी से दूर का देखने वाला, पास का अनजान।
जो पत्रकारिता मर गई, उसे ठीक उसी रूप में वापस लाना शायद संभव न हो। पर उसके पीछे जो काम था, यानी स्थानीय सत्ता पर रोज़ की निगाह, वह काम किसी भी रूप में ज़रूरी है। चाहे वह एक न्यूज़लेटर हो, एक स्थानीय यूट्यूब चैनल हो, एक नागरिक समूह हो, या एक छोटी सी ब्लॉग सूची हो, कोई न कोई आंख वहां होनी ही चाहिए।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने मोहल्ले के बारे में सवाल पूछना शुरू कीजिए। अपने वार्ड के पार्षद का नाम याद कीजिए। पिछली बैठक में क्या हुआ, यह जानिए। यह छोटी बात लगती है, पर लोकतंत्र अपने सबसे छोटे स्तर पर ही जीता और मरता है।