एक नौजवान है। उम्र क़रीब बाईस। एक ईंट के भट्टे पर काम करता है, सुबह से रात तक। पत्नी भी वहीं है, ईंट थापती है। दो छोटे बच्चे हैं, जो आसपास खेलते हैं, और कभी कभी ईंट उठाते हैं।
दो साल पहले इस परिवार को एक ठेकेदार ने अपने गांव से लाया था। एक अग्रिम राशि दी थी, पच्चीस हज़ार रुपये। कहा था, “साल भर काम करना, बाक़ी ठीक से दूंगा।” परिवार ने वह पैसा गांव में अपने एक पुराने क़र्ज़ चुकाने में लगाया, और भट्टे आ गए।
अब दो साल हो गए। इन दो सालों में परिवार ने जो काम किया, उसका हिसाब ठेकेदार के पास है। ठेकेदार कहता है कि पच्चीस हज़ार की अग्रिम राशि अभी पूरी चुकी नहीं है, क्योंकि बीच में परिवार ने खाने का सामान लिया, दवा का पैसा लिया, बच्चे की किताब का पैसा लिया, इन सब का जोड़ अभी क़र्ज़ में जुड़ा हुआ है। हिसाब किताब वही रखता है, और जब भी देखो, क़र्ज़ कभी कम नहीं होता।
अब यह परिवार चाहे तो भी जा नहीं सकता। ठेकेदार कहता है कि अगर जाओगे, तो पहले पूरा क़र्ज़ चुकाओ। और चुकाने का कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि मज़दूरी का हिसाब ख़ुद ठेकेदार के पास है।
यह कोई पुराने समय की कहानी नहीं है। यह आज की है। हमारे इसी देश में, इसी समय में, यह कहानी लाखों लोगों की है। और इस कहानी का नाम है, बंधुआ मज़दूरी।
क़ानून ने जो ख़त्म किया, और जो ख़त्म नहीं हुआ
क़ानूनी रूप से, बंधुआ मज़दूरी देश में 1976 से ख़त्म है। उसी साल बंधुआ मज़दूरी (उन्मूलन) अधिनियम बना, जिसने इस प्रथा को एक दंडनीय अपराध बनाया। बंधुआ मज़दूर को आज़ाद कराने, उसका पुनर्वास करने, उसे एक ख़ास राशि की मदद देने, यह सब इस क़ानून में लिखा है।
क़ानून जब बनता है, तो लगता है कि वह चीज़ ख़त्म हो गई। पर बंधुआ मज़दूरी के बारे में सच यह है कि उसका पुराना रूप शायद कम हुआ है, पर उसके नए रूप पैदा हो गए हैं। बेड़ी ख़त्म हो गई, पर पकड़ ख़त्म नहीं हुई। बस उस पकड़ का नाम बदल गया।
आज की पकड़ का नाम है, क़र्ज़।
आज की बेड़ी, जो दिखती नहीं
आधुनिक बंधुआ मज़दूरी तीन मुख्य रूपों में दिखती है। हर रूप अलग है, पर तीनों की बुनियाद में एक ही चीज़ है, एक ऐसा क़र्ज़ जो कभी ख़त्म नहीं होता, और जिसके कारण मज़दूर अपनी मर्ज़ी से जा नहीं सकता।
पहला रूप, अग्रिम राशि के सहारे। ईंट के भट्टे, खेती के काम, मछली पकड़ने के काम, इन सब में ठेकेदार अग्रिम राशि देकर मज़दूरों को लाते हैं। यह राशि अक्सर एक ज़रूरतमंद परिवार के लिए किसी पुराने क़र्ज़ चुकाने का रास्ता होती है, या किसी बीमारी के इलाज का सहारा, या किसी विवाह का ख़र्च। उस समय तो लेना समझ में आता है। पर एक बार वह ले लिया, तो जब तक चुक न जाए, मज़दूर बंधा रहता है। और हिसाब ठेकेदार के पास है, मज़दूर के पास नहीं। यह असमानता ही बंधन है।
दूसरा रूप, दस्तावेज़ रोक लेना। बहुत से प्रवासी मज़दूरों के साथ यह होता है। काम पर पहुंचते ही ठेकेदार उनका आधार कार्ड, मनरेगा कार्ड, बैंक का काग़ज़, सब अपने पास रख लेता है। कहता है, “सुरक्षित रखा हूं, काम पूरा होने पर वापस।” अब मज़दूर के पास अपनी पहचान का कोई सबूत नहीं है। न वह कहीं और काम पर जा सकता है, न कोई सरकारी मदद पा सकता है, न ट्रेन में टिकट ले सकता है। पकड़ बेड़ी की नहीं है, पर पकड़ बहुत मज़बूत है।
तीसरा रूप, पीढ़ी से पीढ़ी की पकड़। यह सबसे चुपचाप वाला है, और इसीलिए सबसे गहरा। एक परिवार का जो क़र्ज़ था, वह उसका बेटा भी चुकाता है, फिर पोता भी। ठेकेदार के काग़ज़ों में जोड़ चलते रहते हैं, और परिवार के साथ चलते रहते हैं। एक पीढ़ी जिसने यह क़र्ज़ नहीं लिया, उसे भी उसी क़र्ज़ के लिए काम करना पड़ता है, क्योंकि वह उसी परिवार में पैदा हुआ। यह पुराने ज़माने की उस ग़ुलामी का सबसे क़रीबी आधुनिक रूप है, जिसे क़ानूनी रूप से हम बहुत पहले ख़त्म कर चुके।
यह सिर्फ़ श्रम का मामला नहीं, नागरिकता का मामला है
यहां एक ज़रूरी बात कहनी है, जो अक्सर छूट जाती है।
बंधुआ मज़दूरी सिर्फ़ श्रम क़ानून का उल्लंघन नहीं है। यह उससे कहीं बड़ा है। यह नागरिकता की बुनियाद का उल्लंघन है।
अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि एक नागरिक की पहचान इस से होती है कि वह राज्य के निर्णय में हिस्सा ले सकता है, और अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले ख़ुद कर सकता है। यह दो शर्तें मूल हैं। जिसका श्रम किसी और के हाथ में हो, जो जा नहीं सकता, जो ना नहीं कह सकता, वह नागरिक नहीं हो सकता। वह जैविक रूप से नागरिक है, पर असली रूप में नहीं है।
अब अगर एक देश में लाखों लोग इस स्थिति में हों, तो उस देश का यह दावा कि वह सबसे बड़ा लोकतंत्र है, अधूरा रह जाता है। लोकतंत्र वोट की संख्या से नहीं नापा जाता, वह उन शर्तों से नापा जाता है जिनके भीतर एक नागरिक रहता है। और जिसकी बुनियादी आज़ादी एक ठेकेदार के काग़ज़ पर तय हो रही हो, उसकी आज़ादी अभी पूरी नहीं हुई।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह आर्थिक ढांचा है
यह बात समझ लेनी ज़रूरी है। जो ठेकेदार यह काम कर रहे हैं, वे कोई असाधारण बुरे लोग नहीं हैं। यह कोई संगठित अपराधी गिरोह नहीं है। यह हमारे यहां की आर्थिकी का एक हिस्सा है, जो ग़रीबी, असुरक्षा, और कानूनी अनुपस्थिति के बीच में फलता फूलता है।
अग्रिम राशि की ज़रूरत क्यों पड़ती है, क्योंकि एक परिवार के पास बचत नहीं है, बीमा नहीं है, और संकट में सरकारी मदद का कोई भरोसा नहीं है। दस्तावेज़ रोक क्यों लिया जाता है, क्योंकि व्यवस्था की निगरानी कमज़ोर है, और मज़दूर के पास इस अन्याय की शिकायत करने का कोई आसान रास्ता नहीं है। पीढ़ी से पीढ़ी का क़र्ज़ क्यों चलता है, क्योंकि न क़र्ज़ का हिसाब किताब लिखित है, न वह ब्याज की दर पर निगरानी है, न उसे चुनौती देने की कोई आसान क़ानूनी प्रक्रिया है।
ये तीनों कमियां मिलकर वह माहौल बनाती हैं जिसमें यह प्रथा ज़िंदा रहती है। यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह प्रथा कमोबेश वैसी ही चली है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस आर्थिक ढांचे की कमज़ोरी में है जो सबसे कमज़ोर नागरिक की रक्षा कर ही नहीं पाता।
जो आपको शायद बंधुआ लगता ही नहीं
यह बात भी ज़रूरी है, क्योंकि बंधुआ मज़दूरी कई बार वहां भी है जहां हम पहचानते नहीं। एक घरेलू सहायिका जिसका पासपोर्ट या आधार उसकी मालकिन ने रख लिया है, जिसे जब चाहे जाने नहीं दिया जाता, और जिसकी मज़दूरी का असली हिसाब उसके पास नहीं है, वह तकनीकी रूप से बंधुआ है। एक नाबालिग जिसके माता पिता ने किसी कारख़ाने वाले से एक अग्रिम राशि ली है, और उसके बदले बच्चे को काम पर लगाया है, वह भी बंधुआ है। एक खेत मज़दूर जो किसी ज़मीनदार से क़र्ज़ लेकर पीढ़ियों से उसी ज़मीन पर बंधा है, वह भी बंधुआ है।
मतलब, यह प्रथा सिर्फ़ ईंट के भट्टों या दूर के खदानों तक सीमित नहीं है। यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी है, बस उसका रूप ऐसा है कि हम पहचान नहीं पाते, या पहचान कर भी अनदेखा करना सीख गए हैं।
क्या किया जा सकता है
बंधुआ मज़दूरी की पहचान और मुक्ति का काम मुख्य रूप से प्रशासन का है, और यह बहुत बड़ा काम है, जो एक नागरिक के हाथ में पूरा नहीं है। पर कुछ बातें हर वह व्यक्ति कर सकता है, जो इस सच्चाई को पहचानता है।
पहली बात, यह जानिए कि बंधुआ मज़दूरी का क़ानून है, और मुक्ति का अधिकार है। बंधुआ मज़दूरी (उन्मूलन) अधिनियम 1976 के अनुसार, अगर कोई इंसान क़र्ज़ की वजह से अपनी मर्ज़ी से काम छोड़ नहीं सकता, तो वह बंधुआ है, और उसकी मुक्ति प्रशासन का दायित्व है। मुक्त बंधुआ मज़दूर को मुक्ति प्रमाण पत्र मिलता है, और एक तय राशि का पुनर्वास अनुदान भी। यह जानकारी आज ज़्यादातर लोगों को नहीं है, और यही पहली पकड़ है जो हम तोड़ सकते हैं।
दूसरी बात, अगर आपके आसपास कोई ऐसा परिवार है जो आपको लगता है इस स्थिति में है, उसके लिए एक स्थानीय श्रम विभाग या ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर से संपर्क कीजिए। आप ख़ुद शायद कुछ न कर पाएं, पर इस मामले को सही जगह पहुंचाना ख़ुद एक काम है।
तीसरी बात, अपने ज़िले में कितने बंधुआ मज़दूर पहचाने गए हैं, और कितनों को पुनर्वासित किया गया है, यह आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए। मांगिए। यह सूचना अधिकार से मिल सकती है। अगर इस आंकड़े पर निरंतर पूछताछ चले, तो प्रशासन को इस पर ध्यान देना मजबूरी बन जाती है।
चौथी बात, उन उद्योगों के बारे में जागरूक रहिए जहां यह प्रथा सबसे ज़्यादा है। ईंट के भट्टे, खेती में लंबे ठेके, मछली का व्यापार, घरेलू काम का कुछ हिस्सा, ये जोखिम वाले क्षेत्र हैं। जब आप कोई सामान ख़रीदते हैं, या कोई सेवा लेते हैं, तो एक छोटा सा सवाल पूछिए कि इसका मूल कहां है। यह सवाल हर बार जवाब नहीं देगा, पर पूछने की आदत ख़ुद एक नागरिक संस्कार है।
अंत में
ग़ुलामी का नाम बदला है, उसका रूप बदला है, पर उसका सबसे गहरा संकेत वही है, एक इंसान जो काम तो करता है, पर जा नहीं सकता। जब तक एक भी ऐसा इंसान हमारे यहां है, तब तक हम पूरी तरह से उस लोकतंत्र तक नहीं पहुंचे जिसका हम दावा करते हैं।
यह बात बड़ी लगती है, पर इसका रास्ता बहुत छोटे क़दमों से शुरू होता है। एक जागरूक नागरिक, एक मांगा हुआ आंकड़ा, एक रिपोर्ट की गई मामला, एक मुक्त किया गया परिवार। यही वह क़दम हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी मिलकर एक प्रथा को सच में ख़त्म करते हैं।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने ज़िले के बारे में पूछना शुरू कीजिए। पिछले साल यहां कितने बंधुआ मज़दूर मुक्त किए गए। अगर शून्य है, तो क्यों। अगर है, तो उन्हें पुनर्वास मिला या नहीं। यह छोटे से सवाल हैं, पर एक पूरी पुरानी प्रथा का जवाब इन्हीं से शुरू होगा।