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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

राशन कार्ड जो किसी को नहीं खिलाता: एक व्यवस्था जो होते हुए भी नहीं है

महीने का पहला हफ़्ता है। एक महिला अपनी राशन की दुकान पर पहुंची है। हाथ में कार्ड है। पीछे एक बच्चा खड़ा है, थका हुआ।

दुकान खुली है, पर ग्राहक नहीं हैं। काउंटर के पीछे बैठा दुकानदार बिना देखे कहता है, “इस बार स्टॉक नहीं आया। अगले हफ़्ते आना।”

महिला रुकती है। पूछती है, “पिछली बार भी आपने यही कहा था।”

दुकानदार चिढ़कर बोलता है, “क्या करूं, आ नहीं रहा। ऊपर से नहीं भेज रहे। तुम लोग रोज़ रोज़ क्या मचा रही हो।”

महिला कुछ नहीं कहती। बच्चे को लेकर लौट जाती है। उसके पास अब महीने भर के दाल चावल का इंतज़ाम कैसे होगा, यह सवाल पीछे चलता है। उसकी जेब में जो थोड़े पैसे हैं, उससे खुले बाज़ार का गेहूं ख़रीदना, यानी आधा महीना और भूखा रहना।

यह दृश्य देश की हर तीसरी राशन की दुकान पर, हर महीने, किसी न किसी रूप में दोहराया जाता है। और इसमें छुपी हुई एक पूरी कहानी है, जो यह बताती है कि एक व्यवस्था कैसे होते हुए भी नहीं होती।

कार्ड जो है, और कार्ड जो नहीं है

पहले इस बात को समझ लीजिए, क्योंकि यहीं से कहानी शुरू होती है। राशन कार्ड की व्यवस्था में दो तरह की ग़लतियां हैं, और दोनों ही गहरी।

पहली ग़लती, बाहर रखे जाने की। देश के सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद बहुत से लोगों के पास राशन कार्ड है ही नहीं। उनके पास कोई स्थायी पता नहीं है, क्योंकि वे प्रवासी मज़दूर हैं। उनके पास आधार नहीं है, या आधार उनके मौजूदा पते से जुड़ा नहीं है। उनके पास उस सूची में नाम नहीं है जो किसी पुरानी जनगणना से बनी थी, क्योंकि वे उस जनगणना के समय वहां नहीं थे, या क्योंकि कोई दूसरी प्रशासनिक चूक हो गई। इन सबका नतीजा यह है कि जिनको सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उनके पास कार्ड ही नहीं है। उनकी भूख आंकड़ों में नहीं आती।

दूसरी ग़लती, अंदर रहने की। बहुत सारे ऐसे लोगों के पास कार्ड है जो अब उतनी ज़रूरतमंद स्थिति में नहीं हैं। कोई बीस साल पहले कार्ड बना था, परिवार की हालत अब बेहतर है, पर कार्ड वही चल रहा है। कोई एक रिश्ते के बल पर कार्ड बनवा लिया, और अब उसका इस्तेमाल कर रहा है। यह कोई बड़ा अपराध नहीं है, पर यह उस सीमित अनाज को उन तक नहीं पहुंचने देता जिनके लिए यह बनी थी।

ये दोनों ग़लतियां मिलकर एक अजीब स्थिति बनाती हैं। जिसे सबसे ज़्यादा चाहिए, उसके पास कार्ड नहीं। जिसके पास कार्ड है, उसे शायद उतनी ज़रूरत नहीं। यह संख्या के स्तर पर भी समस्या है, और न्याय के स्तर पर भी।

जो मिलना चाहिए, वह जो नहीं मिलता

अब उस कार्ड को देखिए जो किसी के पास सच में है, और जिसका इस्तेमाल वह सच में करता है। उस कार्ड पर लिखा होता है कि महीने में कितना गेहूं मिलेगा, कितना चावल, कितनी चीनी, कितना तेल। यह सरकारी वादा है।

व्यवहार में क्या होता है, यह वादा कई जगहों पर अधूरा रह जाता है।

पहली कमी, मात्रा की। जो लिखा है, अक्सर उससे कम मिलता है। कांटा सही नहीं होता, कांटा छेड़ा हुआ होता है, या दुकानदार सीधा कहता है कि बस इतना है, अगले महीने आ जाना। ग्राहक के पास इस बात की शिकायत करने का कोई आसान रास्ता नहीं है। शिकायत की मेज़ कहां है, फ़ोन नंबर क्या है, यह जानकारी अधिकांश कार्डधारकों को नहीं है।

दूसरी कमी, गुणवत्ता की। जो गेहूं मिलता है, वह कई बार बहुत ख़राब होता है। टूटा हुआ, कीड़े लगा हुआ, या इतना पुराना कि उसमें पीसने पर रोटी ठीक से बनती ही नहीं। चावल भी कई बार वैसा ही। तेल कई जगहों पर मिलावटी होता है। यह गुणवत्ता की कमी कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। इसके पीछे एक पूरी अनदेखी श्रृंखला है, जिसमें कहीं अच्छा अनाज खुले बाज़ार में बेच दिया जाता है, और उसकी जगह यह ख़राब अनाज इस व्यवस्था में पहुंचाया जाता है।

तीसरी कमी, सम्मान की। यह सबसे चुपचाप वाली कमी है, पर शायद सबसे गहरी। एक नागरिक जो अपने ही देश की एक नागरिक सेवा का लाभ लेने आया है, उसे राशन की दुकान पर अक्सर ऐसा महसूस कराया जाता है मानो वह कोई एहसान मांग रहा है। डांट, झुंझलाहट, सवाल जवाब, और एक पूरी “तुम लोग” वाली भाषा। यह सम्मान की कमी हर महीने उस आदमी की आदमीयत पर एक चोट है।

ये तीनों मिलकर वह बनाते हैं जिसे हम कहते हैं, “व्यवस्था है, पर काम नहीं करती।”

क्यों यह व्यवस्था बदलती नहीं

यह सवाल पूछना ज़रूरी है, क्योंकि इसका जवाब बहुत बातों को साफ़ करता है।

सब जानते हैं कि यह व्यवस्था इस तरह नहीं चलनी चाहिए। बहुत से सरकारी रिपोर्टों ने यह कहा है। बहुत सी समितियों ने सिफ़ारिशें दी हैं। बहुत से प्रयोग हुए हैं, कहीं नक़द हस्तांतरण के, कहीं प्रत्यक्ष लाभ के, कहीं जैविक कार्ड के। फिर भी इस बुनियादी ढांचे में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।

इसके तीन कारण हैं।

पहला, इसमें बहुत सारे लोगों का छोटा छोटा हित जुड़ा है। राशन की दुकान का ठेका छोटा सा है, पर वह स्थानीय अर्थव्यवस्था की एक छोटी सी रीढ़ है। एक पूरा परिवार उसी से चलता है। उसके आगे ज़िला स्तर पर, राज्य स्तर पर, ठेकेदार, परिवहन करने वाले, गोदाम चलाने वाले, सबकी रोज़ी रोटी इससे जुड़ी है। इन सबके छोटे छोटे फ़ायदों को मिलाकर एक ऐसी ताक़त बनती है, जो किसी भी बड़े बदलाव को रोकने की कोशिश करती है।

दूसरा, इसमें राजनीतिक नेटवर्क बुना हुआ है। राशन कार्ड के बंटवारे, उसकी समय पर डिलीवरी, उसकी मात्रा, ये सब चीज़ें राज्य स्तर के और स्थानीय स्तर के राजनीतिक नेटवर्क से जुड़ी हैं। एक पूरी ज़मीनी राजनीति इसी पर खड़ी है। इसे बदलने का मतलब है, उस पूरी ज़मीनी राजनीति के समीकरण को बदलना, जो किसी भी सरकार के लिए आसान काम नहीं है।

तीसरा, बदलाव का ख़तरा हमेशा ज़्यादा दिखता है। एक टूटी हुई व्यवस्था को बदलने में, थोड़ी देर के लिए चीज़ें और टूट सकती हैं। इस “थोड़ी देर” का राजनीतिक मूल्य बहुत भारी है। चुनाव हर पांच साल में हैं, और कोई भी सरकार जोखिम लेकर बड़ा बदलाव करने में हिचकती है।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह जड़ता है

यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। यह व्यवस्था जैसे चल रही है, वह किसी की साज़िश नहीं है।

कोई आदेश नहीं निकला कि राशन की दुकानों पर सम्मान कम रखा जाए। कोई बैठक नहीं हुई कि अनाज की गुणवत्ता गिराई जाए। यह सब हुआ हज़ार छोटे छोटे ढीलेपन से, हर एक ढीलापन अपने आप में बड़ा नहीं दिखता।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह व्यवस्था कमोबेश वैसी ही रही है। समस्या किसी की नीयत नहीं है, समस्या उस जड़ता में है जिसने एक पुरानी व्यवस्था को बिना बदले चलने दिया, क्योंकि बदलने का राजनीतिक ख़र्च बहुत बड़ा था, और न बदलने का असर बहुत कमज़ोर आवाज़ों पर पड़ता है।

क्या किया जा सकता है

यह व्यवस्था बड़ी है, और एक नागरिक के हाथ में इसकी पूरी मरम्मत नहीं है। पर कुछ ठोस बातें हैं जो हर वह व्यक्ति कर सकता है, जो इस सच्चाई को पहचानता है।

पहली बात, अपने अधिकार जानिए। कार्ड पर कितना अनाज मिलना चाहिए, वह जानकारी कार्ड पर ही लिखी होती है, और राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वेबसाइट पर भी होती है। अगर आप उस व्यवस्था के नागरिक हैं जो कार्ड का इस्तेमाल करती है, तो हर महीने जो मिले, उसका वज़न ख़ुद कीजिए। मात्रा की कमी हो, तो रसीद मांगिए।

दूसरी बात, शिकायत का रास्ता जानिए। हर राज्य में एक शिकायत हेल्पलाइन है, हर ज़िले में एक शिकायत अधिकारी है। यह जानकारी अक्सर राशन की दुकान पर एक बोर्ड पर लिखी होनी चाहिए, और अक्सर नहीं लिखी होती। पूछिए। अगर बोर्ड नहीं है, तो उसकी मांग कीजिए। शिकायत का रास्ता खुला होना ही व्यवस्था को सीधा रखने का पहला उपाय है।

तीसरी बात, उन लोगों की मदद कीजिए जिनके पास कार्ड नहीं है। आप जिस मोहल्ले में, जिस गांव में रहते हैं, वहां कोई न कोई परिवार है जिसके पास कार्ड नहीं, पर ज़रूरत है। यह अक्सर प्रवासी मज़दूर का परिवार होता है, या कोई दिव्यांग, या कोई बेसहारा बुज़ुर्ग। उन्हें कार्ड कैसे बने, यह जानकारी पहुंचाइए। साथ चलकर ज़िला प्रशासन में आवेदन कीजिए। यह छोटा काम लगता है, पर एक परिवार का कार्ड बनना उस परिवार के लिए हर महीने का खाना है।

चौथी बात, राशन की दुकान पर सम्मान की मांग कीजिए। आप जो ले रहे हैं, वह आपका अधिकार है, कोई एहसान नहीं। दुकानदार की भाषा अगर अपमानजनक हो, तो उसे शांति से बताइए कि यह सेवा है, और सेवा देने वाले का सम्मान देने का दायित्व भी है। यह छोटी सी बात लगती है, पर हर ऐसी छोटी सी बात मिलकर एक माहौल बदलती है।

अंत में

जिस व्यवस्था में कार्ड होते हुए भी भूख जाए, उस व्यवस्था का होना और न होना एक ही है। और जिस व्यवस्था में सबसे ज़रूरतमंद के पास कार्ड ही न हो, वह व्यवस्था अपनी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी से चूक रही है।

यह व्यवस्था पूरी तरह से नहीं बदलेगी जब तक उसके भीतर का राजनीतिक ढांचा नहीं बदलता। पर एक एक मोहल्ले में, एक एक नागरिक की मांग पर, यह व्यवस्था थोड़ी थोड़ी सीधी ज़रूर हो सकती है।

ताली बजाना बंद कीजिए, अपने इलाक़े की राशन की दुकान पर इस महीने जाकर पूछिए, इस सूची में कौन कौन है, और कौन छूट गया है। यह छोटा सा सवाल है, पर इस सवाल के पीछे एक पूरी व्यवस्था खड़ी है, और जिस दिन यह सवाल पर्याप्त लोग पूछेंगे, उस दिन वह व्यवस्था जवाब देने पर मजबूर होगी।

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