एक गांव में एक आदमी है। उम्र क़रीब चालीस। खेत में काम करता है, घर आता है, रोटी खाता है, सो जाता है। बाहर से देखने में सब ठीक है।
पर पिछले छह महीने से उसने अपनी पत्नी से ठीक से बात नहीं की है। दो साल से वह किसी काम पर हंसा नहीं है। कई बार रात में वह उठ कर खाली कमरे में बैठ जाता है, और कुछ भी नहीं करता, बस बैठा रहता है। उसकी पत्नी देखती है, समझती कुछ नहीं। उसकी मां ने एक बार कहा था, “लड़का बेकार में परेशान रहता है, बहुत सोचता है।”
यह बेकार में परेशान रहना, और बहुत सोचना। यह हमारे यहां वह सबसे आम वाक्य है जिसमें मानसिक तकलीफ़ छुप जाती है।
देश के लाखों गांवों में, लाखों ऐसे लोग हैं, जिनके भीतर एक तकलीफ़ चल रही है, पर जिसकी कोई पहचान नहीं है, कोई नाम नहीं है, और सबसे बुरा, कोई इलाज नहीं है। यह लेख उसी अदृश्य तकलीफ़ के बारे में है।
जो आंकड़ों में नहीं दिखता
मानसिक स्वास्थ्य की जब बात होती है, तो हम अक्सर शहरों की बात करते हैं। चिकित्सक, चिकित्सालय, चिकित्सा बीमा, थेरेपी का सत्र, फ़ोन ऐप, यह सब शहरों की भाषा है। गांव की इस बहस में कहीं जगह नहीं है।
पर अगर देखा जाए, तो मानसिक तकलीफ़ का बोझ गांवों में शायद उतना ही है, अगर ज़्यादा नहीं। ग़रीबी, क़र्ज़, फ़सल की चिंता, पलायन से बिछड़े परिवार, अकेलापन, ये सब वहां ज़्यादा हैं, कम नहीं। पर इन तकलीफ़ों को मानसिक स्वास्थ्य की समस्या के रूप में पहचाना नहीं जाता, इसलिए वे आंकड़ों में दर्ज नहीं होतीं।
इसका सबसे साफ़ संकेत यह है कि हमारे यहां ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति लाख आबादी पर कितने मनोचिकित्सक हैं, यह संख्या आज भी विश्व औसत से बहुत नीचे है। शहरों में जो थोड़े मनोचिकित्सक हैं, उनमें से अधिकांश बड़े महानगरों में हैं। एक गांव से उन तक पहुंचने में दूरी, पैसा, और समय, तीनों का बंदोबस्त करना होता है, जो अक्सर संभव नहीं है।
जो आंकड़ों में नहीं दिखता, उस पर नीति नहीं बनती। और जिस पर नीति नहीं बनती, उसका बजट नहीं आता। और जिसका बजट नहीं आता, उसकी सेवा खड़ी नहीं होती। यह एक दुष्चक्र है, जो खुलने का नाम नहीं ले रहा।
तीन कारण जो गांव में मानसिक तकलीफ़ बढ़ाते हैं
ग्रामीण मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को समझने के लिए तीन कारणों को साथ देखना ज़रूरी है। हर एक अकेले छोटा लगता है, पर तीनों मिलकर एक बड़ा बोझ बनाते हैं।
पहला, ग़रीबी और अनिश्चितता। लगातार आर्थिक तनाव शरीर पर नहीं, मन पर भी पड़ता है। एक किसान जिसकी फ़सल हर साल मौसम पर निर्भर है, एक मज़दूर जिसकी दिहाड़ी हर हफ़्ते नहीं मिलती, एक छोटा दुकानदार जिसके पास अगले महीने का भरोसा नहीं, इन सबकी रोज़मर्रा एक तनाव में जीती है। यह तनाव कुछ साल चलने के बाद चिरकालिक थकान, चिंता, और कई बार अवसाद में बदलता है।
दूसरा, अकेलापन और बदलते परिवार। एक बार था जब गांव में संयुक्त परिवार बड़े होते थे, घर भरे रहते थे, और बातचीत कभी ख़त्म नहीं होती थी। आज पलायन ने यह दृश्य बदल दिया है। बहुत से गांवों में जवान लोग शहर चले गए हैं। पीछे रह जाते हैं बुज़ुर्ग, महिलाएं, और बच्चे। इस बदले हुए परिवार में बातचीत के अवसर पहले जैसे नहीं हैं। बूढ़े दिन भर अकेले रहते हैं, औरतें ज़िम्मेदारियों के बोझ में अकेली होती हैं, और जो लोग शहर गए हैं, वे भी एक अलग तरह के अकेलेपन में जीते हैं। मानसिक स्वास्थ्य का सबसे बुनियादी सहारा बातचीत है, और यही सहारा सबसे चुपचाप ख़त्म हो रहा है।
तीसरा, सेवा का बुनियादी अभाव। गांव से पास के क़स्बे में जाने वाला अस्पताल अक्सर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होता है, जहां शायद एक डॉक्टर हो, जो हफ़्ते में दो दिन आता हो। उस केंद्र में मानसिक स्वास्थ्य का कोई प्रावधान नहीं होता। अगर किसी को सच में मनोचिकित्सक चाहिए, तो उसे ज़िला अस्पताल जाना होता है, जो शायद चालीस पचास किलोमीटर दूर है। पूरा दिन लग जाता है, यात्रा का ख़र्च, खाने का ख़र्च, और सबसे ऊपर वह सामाजिक नज़र जो कहती है कि क्यों जा रहा है। यह सब मिलकर ज़्यादातर लोगों को इलाज से रोक देता है।
बात क्यों नहीं हो पाती
मानसिक तकलीफ़ की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसके बारे में बात नहीं हो पाती। शहरों में यह बात अब थोड़ी थोड़ी हो रही है, पर गांवों में अभी भी एक गहरी चुप्पी है। उस चुप्पी के पीछे कुछ साफ़ कारण हैं।
पहला, भाषा का अभाव। हमारी रोज़मर्रा की हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में “अवसाद”, “चिंता विकार”, “मनोवैज्ञानिक उपचार” जैसे शब्द आम नहीं हैं। जो शब्द हैं, उनमें “पागल”, “दिमाग़ ख़राब”, “अजीब हो गया है” जैसी कलंकात्मक भाषा है। जिस तकलीफ़ का नाम ही उपहास वाला हो, उसके बारे में बात कौन करेगा।
दूसरा, सामाजिक नज़र। एक गांव में जहां सब एक दूसरे को जानते हैं, मानसिक चिकित्सक के पास जाना यानी आधे गांव को बता देना। यह “बता देने” का डर अक्सर इलाज से बड़ा होता है।
तीसरा, धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या। बहुत बार मानसिक तकलीफ़ को बुरी नज़र, ऊपरी हवा, या किसी और आध्यात्मिक चीज़ का असर माना जाता है। तब पहली कोशिश तांत्रिक, ओझा, या ताबीज़ की होती है। यह सोच ग़लत है यह कहना आसान है, पर जब किसी समाज में सालों से यही व्याख्या चलती आई हो, तो उसे रातों रात नहीं बदला जा सकता।
यह किसी की लापरवाही नहीं, यह उपेक्षा है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है। ग्रामीण मानसिक स्वास्थ्य की दशा यह है, इसके पीछे कोई एक व्यक्ति, एक सरकार, या एक नीति नहीं है।
यह हमारे यहां की एक पुरानी आदत का नतीजा है। शारीरिक स्वास्थ्य पर हम ख़र्च तो करते हैं, पर देश के सकल घरेलू उत्पाद का बहुत छोटा हिस्सा। उस छोटे हिस्से में मानसिक स्वास्थ्य का हिस्सा और छोटा है। और उस और छोटे हिस्से में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जो बचा रह जाता है, वह लगभग ना के बराबर है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। हर सरकार के अधीन यह उपेक्षा कमोबेश वैसी ही रही है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस प्राथमिकता में है जो मानसिक स्वास्थ्य को एक “विलासिता” मानती है, “ज़रूरी सेवा” नहीं। और जब तक यह प्राथमिकता नहीं बदलेगी, तब तक चाहे कितनी भी जागरूकता बढ़ जाए, बुनियादी सेवा खड़ी नहीं हो पाएगी।
क्या किया जा सकता है
यह जवाब का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, क्योंकि इस लेख का मक़सद बात बढ़ाना नहीं, थोड़ा सा रास्ता दिखाना है। अगर आप गांव में रहते हैं, या आपके परिवार में कोई गांव में है, या आप गांव से जुड़े किसी समूह का हिस्सा हैं, तो यह बातें ध्यान में रखिए।
पहली बात, और सबसे ज़रूरी। परिवार में किसी की चुप्पी, उदासी, या बेकार में परेशान रहने को नज़रअंदाज़ मत कीजिए। उससे बैठकर बात कीजिए, बिना ताना मारे, बिना उपदेश दिए, बिना यह कहे कि “ज़्यादा सोचता है”। सिर्फ़ सुनिए। यह छोटी सी बात बहुत बड़ी होती है। दुनिया भर के सबूत कहते हैं कि अधिकांश मामलों में, परिवार और दोस्तों की सहानुभूतिपूर्ण बातचीत मानसिक तकलीफ़ के पहले इलाज का सबसे बड़ा हिस्सा होती है।
दूसरी बात, अगर तकलीफ़ बढ़ती दिखे, तो पेशेवर मदद लेने में देर मत कीजिए। भारत सरकार ने एक टेलीफ़ोन हेल्पलाइन शुरू की है, जो बीस से ज़्यादा भाषाओं में, मुफ़्त, और दिन रात उपलब्ध है। उसका नंबर 14416 है। यह जानकारी आज देश के बहुत कम लोगों को है, और इसे पहुंचाना ख़ुद एक नागरिक कर्तव्य है। अपने गांव के, अपने मोहल्ले के, अपनी पंचायत के लोगों को यह नंबर बताइए।
तीसरी बात, मानसिक तकलीफ़ को बीमारी मानिए, चरित्र की कमज़ोरी नहीं। यह कमज़ोरी का संकेत नहीं है, यह एक चिकित्सीय स्थिति है, जैसे मधुमेह या रक्तचाप। और जैसे मधुमेह का इलाज दवा और देखभाल से होता है, वैसे ही मानसिक तकलीफ़ का इलाज भी होता है। बस यह इलाज शुरू तभी होता है जब हम बीमारी का नाम लेने को तैयार हों।
चौथी बात, अपने इलाक़े की आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का उपयोग कीजिए। ये दोनों स्त्रियां हर गांव में एक तरह की पहली स्वास्थ्य कड़ी हैं। वे प्रशिक्षित नहीं हैं मानसिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ की तरह, पर वे आपके परिवार को ध्यान से देख सकती हैं, और ज़रूरत पड़ने पर ज़िले के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में मदद कर सकती हैं। बहुत से राज्यों ने पिछले कुछ सालों में आशा कार्यकर्ताओं को बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य की पहचान का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। यह छोटी सी पहल है, पर गांव में सबसे पहली पकड़ अक्सर इन्हीं हाथों से होती है।
पांचवीं बात, अपने ज़िले के सरकारी अस्पताल से मानसिक स्वास्थ्य सेवा के बारे में पूछिए। ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत अधिकांश ज़िलों में सेवा होनी चाहिए। कितने लोग आते हैं, कितना बजट है, कितने मनोचिकित्सक हैं, यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। पूछिए। मांगिए। यह सवाल जिस दिन पर्याप्त नागरिक पूछेंगे, उस दिन सेवा खड़ी होगी।
अंत में
देश का गांव अक्सर देश की उन तस्वीरों में होता है जो हम सब को सबसे अच्छी लगती हैं। हरे खेत, मिट्टी का घर, साझा परिवार। यह तस्वीर सुंदर है, और यह सच भी है। पर इस तस्वीर के पीछे एक और सच है, जो उतना ख़ूबसूरत नहीं है। एक चुप्पी, एक थकान, एक भीतर ही भीतर खाई जाती हुई ज़िंदगी।
इस चुप्पी का इलाज दवा से नहीं, सिर्फ़ बातचीत से शुरू होता है। और बातचीत का पहला क़दम पहचान है, कि यह तकलीफ़ असली है, इसका नाम है, और इसका इलाज है।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपने परिवार से ठीक से पूछना शुरू कीजिए। पिछले महीने वह कैसा था, कैसी थी, ठीक से। और अगर जवाब में कोई एक झुंझलाहट, कोई एक चुप्पी, या कोई एक थकान सुनाई दे, तो उस पर ठहरिए। एक बीमार मन को सबसे पहले एक सुनने वाला कान चाहिए, और वह कान आपके पास है। शुरुआत वहीं से होगी।