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ताली बजाना बंद करो, सोचना शुरू करो।

दो भारत: एक जो निकल सकता है, और एक जो नहीं

एक ही शहर में, एक ही सुबह, दो बच्चे जागते हैं।

पहले बच्चे के घर में आरओ का साफ़ पानी है। नाश्ते के बाद एक स्कूल वैन आती है, उसे लेकर एक निजी स्कूल जाती है। शाम को ट्यूशन है। बीमार पड़ा तो माता पिता के पास स्वास्थ्य बीमा है, फ़ोन पर एक डॉक्टर बुक हो जाता है। बड़ा होकर वह शायद कॉलेज पास के शहर में करेगा, और उसके बाद शायद विदेश में किसी और देश की कंपनी में काम करेगा। उसका भविष्य उसके आसपास के टूटे हुए सरकारी ढांचे पर निर्भर नहीं है। उसके पास एक रास्ता है जो वहां से निकल जाता है।

दूसरे बच्चे के घर में पानी का एक नल है, जो हफ़्ते में तीन दिन एक घंटा पानी देता है। वह सरकारी स्कूल पैदल जाता है, जहां शिक्षक अधूरे हैं, और किताबें अधूरी। बीमार पड़ा तो सरकारी अस्पताल जाता है, जहां लाइन लंबी है, और दवा का भरोसा नहीं। बड़ा होकर वह वहीं रहेगा, उसी व्यवस्था के भीतर, जिसे पहला बच्चा बहुत पहले छोड़ चुका होगा।

दोनों एक देश के नागरिक हैं। पर दोनों दो देशों में जीते हैं। और इन दोनों देशों के बीच का असली फ़र्क़ पैसा नहीं है, यह बात ज़रूरी है, क्योंकि “अमीर बनाम ग़रीब” वाली बहस सब कुछ नहीं बताती। असली फ़र्क़ है, निकल जाने का विकल्प। एक के पास है, दूसरे के पास नहीं।

चार चीज़ें जो एक भारत के पास हैं

जो भारत निकल सकता है, उसके पास चार चीज़ें होती हैं, अक्सर मिलकर। हर एक अकेली थोड़ी बहुत मदद करती है, पर चारों मिलकर एक पूरा एस्केप-रास्ता बनाती हैं।

पहली, अंग्रेज़ी। एक भाषा जो दुनिया के बहुत सारे दरवाज़े खोल देती है। नौकरी के दरवाज़े, पढ़ाई के दरवाज़े, और सबसे अहम, यह समझने का दरवाज़ा कि कौन सी व्यवस्था कैसे काम करती है। दूसरे भारत के पास यह भाषा अक्सर नहीं होती, और इसलिए बहुत सी मेज़ें उसके लिए बंद रहती हैं।

दूसरी, बचत। हर महीने थोड़ा थोड़ा बचा हुआ पैसा, थोड़ी सी जमा पूंजी, थोड़ा सा हाथ का सहारा। यह बचत संकट में निजी विकल्प चुनने की ताक़त देती है। निजी स्कूल, निजी अस्पताल, निजी सुरक्षा। दूसरे भारत में बचत होती ही नहीं, और जो होती है, वह एक ही बीमारी में चली जाती है।

तीसरी, सम्पर्क। परिचितों का जाल, जो ज़रूरत पड़ने पर काम आता है। एक रिश्तेदार जो उस दफ़्तर में है। एक दोस्त जो वकील है। एक पड़ोसी जो किसी बड़े आदमी को जानता है। यह जाल हर मुश्किल पर एक छोटा रास्ता खोल देता है। दूसरे भारत में यह जाल नहीं होता। उसके लिए हर खिड़की लाइन में लग कर ही खुलती है।

चौथी, और सबसे ताक़तवर, बाहर निकलने का रास्ता। विदेश में पढ़ने का विकल्प, विदेश में काम का विकल्प, एनआरआई रिश्तेदार जो ज़रूरत पड़ने पर बुला सकते हैं। यह जानना कि अगर सब कुछ बहुत ख़राब हो जाए, तो भी एक दूसरा रास्ता है। दूसरे भारत के पास यह रास्ता नहीं होता। उसके लिए यही देश पूरी ज़िंदगी का दायरा है।

ये चार चीज़ें मिलकर एक “एक्ज़िट टिकट” बनाती हैं। जिसके पास टिकट है, उसके लिए हर टूटी हुई व्यवस्था से निकलने का रास्ता है। जिसके पास नहीं, वह उसी व्यवस्था के भीतर पूरी ज़िंदगी बिताता है।

निकलने की एक पूरी सूची

अब उन व्यवस्थाओं को देखिए जिनसे एक भारत निकलकर निजी विकल्प चुन लेता है, और दूसरा वहीं रह जाता है।

सरकारी स्कूल कमज़ोर है, तो पहला निजी स्कूल चुनता है, अंग्रेज़ी माध्यम, ट्यूशन के साथ। दूसरा वहीं पढ़ता है, या पढ़ाई छोड़ देता है।

सरकारी अस्पताल भरोसेमंद नहीं, तो पहला निजी अस्पताल जाता है, स्वास्थ्य बीमा सहारा देता है। दूसरा सरकारी अस्पताल की लाइन में खड़ा है, या इलाज नहीं करवाता।

मोहल्ले की सुरक्षा कमज़ोर है, तो पहला गेटेड कॉलोनी में रहता है, सिक्योरिटी गार्ड और कैमरे। दूसरा खुले मोहल्ले में है, जहां शाम के बाद सड़कें सुरक्षित नहीं लगतीं।

पानी पीने लायक़ नहीं, तो पहला आरओ लगाता है, या बोतलबंद ख़रीदता है। दूसरा वही पानी पीता है जो आता है।

बिजली कटती है, तो पहला इन्वर्टर लगाता है, या जनरेटर। दूसरा अंधेरे में बैठता है, फ़ोन की टॉर्च में पढ़ाई करता है।

अदालत में सालों लगेंगे, तो पहला वकील लगाता है, या बाहर बाहर ही फ़ैसला करवा लेता है। दूसरा सालों इंतज़ार करता है।

देश में काम नहीं मिल रहा, तो पहला विदेश जाता है। दूसरा वहीं तैयारी करता रहता है, या मज़दूरी पर निकल जाता है।

हर एक उदाहरण में एक ही ढांचा है। एक भारत ने उस सरकारी व्यवस्था को छोड़ा, एक बाज़ार से ख़रीदा हुआ निजी विकल्प चुना, और आगे बढ़ गया। दूसरा भारत वहीं रहा, जहां वह व्यवस्था है। और जो व्यवस्था छोड़ी गई, वह बेहतर नहीं हुई, क्योंकि बेहतर बनाने के लिए जो आवाज़ चाहिए थी, वह आवाज़ अब उस व्यवस्था से जुड़ी नहीं है।

जब आवाज़ निकल जाती है, सुधार रुक जाता है

यहां इस लेख का सबसे ज़रूरी हिस्सा आता है। यह वह बात है जो “अमीर बनाम ग़रीब” वाली पुरानी बहस नहीं समझा पाती।

कोई भी सार्वजनिक व्यवस्था तभी सुधरती है जब उसके भीतर के लोग सुधार की मांग करते हैं। यह माता पिता जो स्कूल की बैठक में जाते हैं और सवाल पूछते हैं। यह मरीज़ जो अस्पताल से जवाब मांगता है। यह नागरिक जो थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने पर अड़ता है, और अड़ ही जाता है। ये छोटे छोटे दबाव मिलकर व्यवस्था को थोड़ा सीधा रखते हैं।

पर अगर इन व्यवस्थाओं में पैसा और भाषा वाले लोग बचे ही नहीं, तो दबाव बनाने वाला कौन रहा। जो आवाज़ें इन व्यवस्थाओं को सीधी रख सकती थीं, वे आवाज़ें निजी विकल्पों के साथ बाहर निकल गईं। अब अंदर वही बचे, जिनके पास आवाज़ छोटी है, संगठन सीमित है, और रोज़ की लड़ाई इतनी थका देती है कि व्यवस्था सुधारने की मांग करने का समय ही नहीं बचता।

नतीजा यह है कि सरकारी स्कूल और कमज़ोर हो जाता है, सरकारी अस्पताल और भरा रहता है, सरकारी सेवाएं और टूटती जाती हैं। और हर बार जब वह व्यवस्था और टूटती है, और लोग एक भारत में चले जाते हैं, तो दूसरे भारत के पास उतना ही कम बचता है।

यह किसी की साज़िश नहीं, यह ढांचा है

यह बात साफ़ कर देना ज़रूरी है। यह जो हुआ है, यह किसी ने तय करके नहीं किया।

कोई बैठक नहीं हुई जिसमें कहा गया हो कि सरकारी सेवाएं ख़त्म करते हैं। कोई आदेश नहीं निकला कि एक वर्ग को निजी विकल्पों में धकेल दिया जाए। यह हुआ हज़ार छोटे छोटे फ़ैसलों से, जिनमें से हर एक तर्कसंगत लगता था। एक माता पिता का अपने बच्चे को निजी स्कूल में डालना समझदारी है, क्योंकि सरकारी स्कूल अच्छा नहीं चल रहा। एक परिवार का निजी अस्पताल जाना मजबूरी है। एक नौजवान का विदेश चले जाना उसकी समझदारी है। हर अकेले फ़ैसले में कोई दोष नहीं। पर सब मिलकर एक पूरा देश दो हिस्सों में बांट देते हैं।

यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। दशकों से, हर सरकार के अधीन, यही पैटर्न चलता रहा है। समस्या किसी की नीयत में नहीं है। समस्या उस सोच में है जो सार्वजनिक व्यवस्था को “जिसके लिए कोई और रास्ता नहीं, उसके लिए” मानती है, और इसलिए धीरे धीरे उसे सबसे कमज़ोरों के हवाले छोड़ देती है।

अरस्तू ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि किसी स्वस्थ राज्य की रीढ़ उसका मज़बूत मध्यवर्ग होता है, इसलिए नहीं कि वह नैतिक रूप से सबसे अच्छा है, बल्कि इसलिए कि वह सबसे ऊंचे और सबसे नीचे के बीच एक साझा हित रखता है। पर जब मध्यवर्ग ख़ुद बाहर निकल जाए, तो वह साझा हित टूट जाता है, और राज्य की रीढ़ कमज़ोर पड़ जाती है। दो भारत का होना केवल असमानता की समस्या नहीं है, यह उस साझे हित के टूट जाने की समस्या है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है।

क्या किया जा सकता है

जवाब आसान नहीं है, क्योंकि निजी विकल्प चुनना अक्सर मजबूरी होती है, समझदारी होती है, और अपने परिवार के लिए सबसे ज़िम्मेदार फ़ैसला होता है। यह लेख आपको आपके बच्चे को सरकारी स्कूल भेजने को नहीं कह रहा, अगर उसका भविष्य उससे जुड़ा है। पर कुछ बातें ज़रूर हैं जो हर वह नागरिक कर सकता है, जो दो भारत वाली इस सच्चाई को पहचानता है।

पहली बात, एक सरकारी व्यवस्था चुनिए जिसका इस्तेमाल आप करते रह सकते हैं। मोहल्ले की लाइब्रेरी हो, सरकारी पार्क हो, सार्वजनिक परिवहन हो, सरकारी अस्पताल हो छोटे कामों के लिए, कुछ भी, पर उससे जुड़े रहिए। एक नागरिक जो एक भी सरकारी व्यवस्था का इस्तेमाल नहीं करता, वह उस व्यवस्था के बारे में सवाल पूछने का हक़ धीरे धीरे खो देता है।

दूसरी बात, सार्वजनिक व्यवस्थाओं में निवेश की मांग कीजिए, भले ही आप उन पर निर्भर न हों। यह सिर्फ़ नैतिकता का सवाल नहीं है, यह आपके अपने हित का सवाल है। एक देश जिसमें दो भारत बहुत अलग हो जाएं, वह देश आपके बच्चों के लिए भी सुरक्षित नहीं रहेगा, चाहे आपके बच्चे किसी भी टिकट के साथ क्यों न जी रहे हों।

तीसरी बात, “विकास” को अपनी सुविधा से नहीं, साझे हित से नापिए। अगली बार जब कोई नई परियोजना आपके इलाक़े में आए, यह पूछिए कि उसमें वह दूसरा भारत कहां है। सिर्फ़ अपनी सुविधा देखकर समर्थन या विरोध मत कीजिए। यह असहज सवाल है, पर असहज सवाल ही असली सवाल होते हैं।

अंत में

दो भारत किसी एक की समस्या नहीं है। यह दोनों भारत की समस्या है, बस अलग रूप में।

जो भारत निकल सकता है, उसे यह लगता है कि वह सुरक्षित है, पर वह नहीं है। एक देश जो भीतर से इतना बंटा हो कि उसके आधे नागरिक दूसरे आधे की ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी न रखें, वह देश लंबे समय तक स्थिर नहीं रहता। आज जो टिकट है, कल वह नहीं भी हो सकता।

जो भारत नहीं निकल सकता, वह जानता है कि उसके पास विकल्प नहीं है, पर अक्सर यह नहीं जानता कि जो टूटा हुआ है, वह क्यों टूटा हुआ है। और जब यह समझ नहीं आती, तब सुधार की मांग भी ठीक से नहीं उठती।

ताली बजाना बंद कीजिए, साझा व्यवस्थाओं की मांग शुरू कीजिए। एक देश में दो देश तब बनते हैं जब आधे नागरिक टूटी हुई व्यवस्था से निकल सकते हैं, और बाक़ी आधे उसी में फंसे रह जाते हैं। एक देश तब फिर से एक होगा, जिस दिन निकलने वाले रुककर पूछेंगे, कि जो रह गए, उनके लिए हम क्या कर रहे हैं।

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