एक गांव की पंचायत भवन में एक बैठक चल रही है। मेज़ के पीछे सरपंच की कुर्सी पर एक महिला बैठी हैं, साड़ी से सिर ढका हुआ। उनके पीछे एक आदमी खड़ा है, उनका पति। बैठक की कार्यवाही में जो भी सवाल आता है, जवाब वह आदमी देता है। फ़ाइलें वह पलटता है। फ़ैसले वह सुनाता है। महिला के सामने एक रजिस्टर रखा है, जिस पर बारी बारी कई हस्ताक्षर लेने हैं। वह चुपचाप हर पन्ने पर अपना नाम लिखती जाती हैं, या अंगूठा लगाती जाती हैं, क्योंकि लिख नहीं पातीं।
कमरे से बाहर लिखा है, “ग्राम पंचायत भवन, सरपंच, श्रीमती फलां देवी।” तस्वीर भी उन्हीं की है।
यह एक छोटा सा दृश्य है, और देश के बहुत सारे गांवों में बहुत सारी पंचायतों में कमोबेश यही चल रहा है। इसे “सरपंच पति” कहा जाता है, और यह उस आरक्षण का सबसे चर्चित किनारा है जिसने तीस साल पहले लाखों महिलाओं को पंचायत की मेज़ तक पहुंचाया था।
यह कहानी न तो आरक्षण की हार है, न उसकी जीत। यह आधा रास्ता है। और इस आधे रास्ते को ईमानदारी से देखे बिना न तो पूरी कहानी समझ आएगी, न आगे का रास्ता।
आरक्षण ने जो किया
पहले यह कहना ज़रूरी है, क्योंकि अक्सर “सरपंच पति” वाली बात आते ही पूरे आरक्षण को कमज़ोर कर देने वाली बहस शुरू हो जाती है। यह ईमानदार बहस नहीं है।
तीस साल पहले, पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने से पहले, एक बहुत सीधा सच यह था। लाखों गांवों में, गांव की किसी भी सार्वजनिक मेज़ पर एक भी महिला नहीं बैठती थी। बैठक होती थी, फ़ैसले होते थे, बजट बंटता था, और महिला नागरिक का इन सब में कोई दृश्य भूमिका नहीं होती थी, चाहे उसकी अदृश्य भागीदारी कितनी भी हो।
आरक्षण ने यह बदल दिया। एक तिहाई सीटें, और कई राज्यों में आधी सीटें, महिलाओं के लिए रखी गईं। मतलब, हर गांव में, हर पंचायत में, एक मेज़ ऐसी अब है जिसके पीछे महिला बैठती है। यह छोटी बात नहीं थी। यह एक पीढ़ी का बदलाव था।
और इस बदलाव का असर सिर्फ़ संख्या का नहीं था। बहुत सी जगहों पर, आरक्षण ने सच में काम किया। एक महिला जो पहले बैठक में अदृश्य थी, अब फ़ाइल पकड़ रही है, हस्ताक्षर कर रही है, और कभी कभी फ़ैसले भी बदलवा रही है। उसके पास सीखने की प्रक्रिया रही, कभी अधूरी, कभी पूरी। उसके बच्चे, ख़ासकर बेटियां, उसे देख कर बड़ी हुईं। उसकी पड़ोसी महिलाएं उसके पास आना सीख गईं। यह एक धीमा बदलाव था, और बहुत सी जगहों पर यह बदलाव असली था।
आरक्षण ने जो नहीं किया
पर बहुत सी जगहों पर वह बदलाव अधूरा रहा, और उस अधूरेपन का सबसे साफ़ चेहरा “सरपंच पति” है।
इसमें होता क्या है। एक पंचायत में महिला के लिए सीट आरक्षित हो जाती है। चुनाव में किसकी पत्नी, किसकी बहू, या किसकी विधवा को खड़ा किया जाए, यह तय करने का काम अक्सर परिवार और गांव के पुरुष नेता करते हैं। महिला को कभी पूछा भी नहीं जाता कि वह यह चाहती है या नहीं। उसे एक रात बता दिया जाता है कि कल नामांकन करना है।
चुनाव हो जाता है। महिला सरपंच बन जाती है, काग़ज़ पर। पर बैठक में जाने का काम कई जगहों पर पति या ससुर करता है। फ़ैसले लेने का काम पुरुष करता है। पंचायत सचिव हस्ताक्षर लेने जब आता है, तो ज़्यादातर महिलाओं की अनुपस्थिति में पति से बात करता है। महिला के नाम के नीचे एक पुरुष की पूरी सत्ता चलती है।
यह क्यों होता है, इसे एक “धोखे” के रूप में देखना ग़लती है। पति या ससुर किसी मास्टरमाइंड की भूमिका में नहीं हैं। यह जो हो रहा है, यह उस पूरे समाज के ढांचे का नतीजा है, जिसमें यह आरक्षण लागू हुआ।
यह “धोखा” नहीं है, यह संरचना का अधूरापन है
ध्यान से देखिए। एक महिला को आरक्षित सीट दे दी गई। पर उसके पास कई चीज़ें नहीं हैं, जो उस सीट के साथ ज़रूरी थीं।
पहली, साक्षरता। बहुत सी आरक्षित सरपंचों ने स्कूल नहीं देखा। उन्हें फ़ाइल पढ़नी नहीं आती। रजिस्टर पढ़ना नहीं आता। बजट का काग़ज़ देखना नहीं आता। ऐसे में फ़ैसला करने वाला कोई और होगा, यह तय है।
दूसरी, गति। कई गांवों में महिला का अकेले पंचायत भवन तक जाना अब भी आसान नहीं है। दूरी हो, पारिवारिक रोक हो, सामाजिक नज़र हो, ये सब मिलकर उसकी मेज़ तक की रोज़ की पहुंच रोकते हैं। जो आदमी रोज़ नहीं आ सकता, उसकी कुर्सी पर असली ताक़त धीरे धीरे वह व्यक्ति ले लेता है, जो रोज़ आ सकता है।
तीसरी, प्रशिक्षण। एक नई सरपंच को यह कैसे पता हो कि उसकी ज़िम्मेदारी क्या है, कौन सी फ़ाइल कब आती है, कौन सी अनुदान राशि किस मद के लिए है। इसकी ट्रेनिंग देने का काम राज्य का है। पर यह ट्रेनिंग अक्सर एक दिन की औपचारिकता होती है, या नहीं भी होती है। बिना प्रशिक्षण के एक नई सरपंच को व्यवस्था की भाषा समझ ही नहीं आती, और जिसे भाषा न समझ आए, वह अपनी कुर्सी पर असरदार नहीं हो सकता।
चौथी, स्वतंत्र पहचान। आरक्षण ने सीट दी, पर उस सीट पर बैठने वाली अक्सर किसी पुरुष की पत्नी, बहू या मां के रूप में ही जानी जाती है। उसका अपना नाम कम पुकारा जाता है। और जिसकी पहचान अपने नाम से कम और किसी और के नाम से ज़्यादा जुड़ी हो, उसकी सत्ता भी उसी नाम के साथ खिसकती है।
ये चार चीज़ें मिलकर वह माहौल बनाती हैं जिसमें “सरपंच पति” का जन्म होता है। समस्या किसी एक आदमी या औरत के स्वभाव में नहीं है। समस्या उन परिस्थितियों में है जो आरक्षण के साथ ज़रूरी थीं, पर नहीं दी गईं।
जो सच में बदला, उससे क्या सीखें
अब उन कहानियों की तरफ़ आइए जहां आरक्षण सच में चला।
देश के अलग अलग कोनों में, पिछले तीस सालों में, हज़ारों महिलाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने उस आरक्षित सीट को अपना बनाया। शुरू में शायद उन्हें भी किसी ने खड़ा किया था, पर समय के साथ उन्होंने अपनी आवाज़ निकाली। उन्होंने स्कूल में मध्याह्न भोजन सही करवाया। उन्होंने आंगनवाड़ी में ठेकेदार के साथ झगड़ा किया। उन्होंने पानी की टंकी मरम्मत करवाई। उन्होंने पंचायत के बजट का हिसाब मांगा।
इन कहानियों में एक बात साझा है। हर ऐसी महिला के पीछे कोई न कोई सहारा था। कोई एक स्वयंसेवी संगठन था जिसने उसे प्रशिक्षित किया। कोई एक स्थानीय शिक्षक था जिसने उसे फ़ाइल पढ़ना सिखाया। कोई एक महिला समूह था जो उसके साथ रोज़ बैठा। कोई एक अधिकारी था जिसने उसे “मैडम” कहकर बुलाया, और उसके पति को बैठक से बाहर भेज दिया।
मतलब, जहां वह संरचना दी गई जिसकी बात ऊपर हुई, वहां आरक्षण ने काम किया। जहां सिर्फ़ सीट दी गई और बाक़ी सब छोड़ दिया गया, वहां “सरपंच पति” बन गया।
यह किसी की साज़िश नहीं, यह अधूरापन है
यह बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है, क्योंकि “सरपंच पति” वाली कहानी का इस्तेमाल अक्सर इस तरह किया जाता है मानो यह आरक्षण की विफलता हो।
यह विफलता नहीं है। यह आरक्षण के साथ चाहिए थी जो संरचना, वह संरचना नहीं देने की विफलता है। आरक्षण आधी कहानी थी। पूरी कहानी थी, आरक्षण और साथ में शिक्षा, और साथ में प्रशिक्षण, और साथ में स्वतंत्र पहचान का माहौल। आधी कहानी देकर पूरी ज़िम्मेदारी मांगना अपने आप में एक तरह का अन्याय है।
यह किसी एक सरकार, एक दौर या एक दल की बात नहीं है। पिछले तीस सालों में कई सरकारें आईं, और लगभग सबने आरक्षण का स्वागत किया, पर उसके साथ का पूरा बंदोबस्त किसी ने ठीक से नहीं किया। समस्या किसी की नीयत में नहीं है, समस्या उस सोच में है जो यह मानती है कि एक क़ानूनी क़दम अपने आप में बदलाव ले आएगा, बिना उसके पीछे की पूरी सामाजिक बुनाई बदले।
क्या किया जा सकता है
अगर आपके आसपास कोई पंचायत है, तो कुछ बातें ज़रूर हैं जो की जा सकती हैं।
पहली बात, अपनी पंचायत की महिला सरपंच का नाम जानिए, उनके पति या ससुर का नहीं। उन्हें “मैडम” कहकर बुलाइए। उनसे सीधे बात कीजिए। यह छोटी सी बात लगती है, पर हर ऐसी बात मिलकर उस माहौल को बदलती है जिसमें स्वतंत्र पहचान बनती या टूटती है।
दूसरी बात, अगर आपके इलाक़े में कोई समूह महिला सरपंचों को प्रशिक्षित कर रहा है, उसे सहारा दीजिए। समय से, पैसे से, या सिर्फ़ अपनी मौजूदगी से। बहुत से अच्छे संगठन हैं जो इस काम में सालों से लगे हैं, और अक्सर बहुत कम संसाधन में काम कर रहे हैं।
तीसरी बात, पंचायत की बैठक में जाइए, अगर आप उस गांव के या आसपास के नागरिक हैं। यह बैठक खुली होती है। आप जा सकते हैं, सुन सकते हैं। बीस लोग नियमित रूप से जाने लगें, तो वह माहौल बदलना शुरू होता है जिसमें असली सरपंच पीछे बैठती है, और दूसरा कोई आगे खड़ा होता है।
चौथी बात, राज्य से प्रशिक्षण की मांग कीजिए। पंचायत राज मंत्रालय और राज्य सरकारें दोनों के पास निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण का बजट होता है। यह बजट कितना है, कहां ख़र्च हुआ, कितनी महिलाओं तक पहुंचा, यह जानकारी सार्वजनिक है। इसे मांगिए। यह सवाल आपके इलाक़े में आरक्षण को अधूरा या पूरा करने का असली काम है।
अंत में
आरक्षण आधी कहानी है। पूरी कहानी तब होगी जब आरक्षित कुर्सी पर बैठने वाली के पास वह सब हो, जो उस कुर्सी की क़ीमत मांगती है। साक्षरता, प्रशिक्षण, समर्थन, और सबसे ज़रूरी, अपनी पहचान का अहसास।
यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती, क्योंकि सामाजिक बदलाव कभी क़ानून से अकेले नहीं हुआ है। पर सरकार के बिना भी नहीं होगा। यह काम नागरिकों का भी है, परिवारों का भी, समूहों का भी।
“सरपंच पति” को देखकर आरक्षण को कमज़ोर मत कीजिए। यह वह दृश्य है जो हमें यह याद दिलाता है कि क़ानूनी क़दम अकेले काफ़ी नहीं हैं। उन्हें पूरा करने के लिए सामाजिक संरचना का बाक़ी हिस्सा भी साथ चलना होता है।
ताली बजाना बंद कीजिए, अपनी पंचायत की महिला सरपंच का नाम पूछना शुरू कीजिए। उनसे बात कीजिए। यह एक छोटा सा क़दम है, पर हर बड़ा बदलाव इन्हीं छोटे क़दमों से बनता है।